प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोध जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टाका भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहनेपर ऐसा नहीं होता। एकस्मिन्दृङ्मात्रे त्रेधा द्रष्ट्रादिकं हि समुदेति । त्रिविधे तस्मिँल्लीने दृङ्मात्रं शिष्यते पश्चात् ॥१५६॥ एक दृङ्मात्रमें ही द्रष्टा आदि त्रिपुटीका उदय होता है, उस त्रिपुटीका लय हो जानेपर पीछे केवल दृङ्मात्र ही रह जाता है। दर्पणतः प्राक्पश्चादस्ति मुखं प्रतिमुखं तदाभाति । आदर्शेऽपि च नष्टे मुखमस्ति मुखे तथैवात्मा॥१५७॥ दर्पणसे पूर्व और उसके पीछे भी मुख होता है तभी उसमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण यदि टूट जाय तब भी मुख तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, इसी प्रकार आत्मा उपाधिके नष्ट हो जानेपर भी रहता ही है। प्रबोध माधुर्यं गुडपिण्डे यत्तत्तस्यांशकेऽणुमात्रेऽपि । एवं न पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥१५८॥ गुड़के पिण्डमें जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कणमें भी होती है, इस प्रकार गुड़त्व और मधुरत्वमें कोई भेद नहीं है। ४५