प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर अद्वैतानन्दके उद्वेगसे जब 'यह क्या है ? मैं कौन हूँ ! और किसका हूँ ?' ऐसी जिज्ञासासे चित्त सुस्त पड़ जाता है तो [ अन्तमें ] वह मूच्छित हो जाता है । चिरतरमात्मानुभवादात्माकारं प्रजायते चेतः। सरिदिव सागरयाता समुद्रभावं प्रयात्युच्चैः ॥१५२॥ चिरकालतक आत्मानुभव करते रहनेसे चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्रको जानेवाली नदी अन्तमें पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है । आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं नापेक्षते पुनर्विषयान् । क्षीरादुद्धृतमाज्यं यथा पुनः क्षीरतां न यातीह ॥१५३॥ आत्मस्वरूपमें लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयोंकी इच्छा नहीं करता, जैसे दूधमेंसे निकाला हुआ घी फिर दुग्धभावको प्राप्त नहीं हो सकता । दृष्टौ द्रष्टरि दृश्ये यदनुस्यूतं च भानमात्रं स्यात् । तत्रोपक्षीर्णं चेच्चित्तं तन्मूर्च्छितं भवति ॥१५४॥ दृष्टि, द्रष्टा और दृश्यमें जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्च्छित हो जाता है । याति स्वसम्मुखत्वं दृङ्मात्रं वा यदा तदा भवति । दृश्यद्रष्टृविभेदो ह्यसम्मुखेऽस्मिन् तद्भवति ॥१५५॥ ४४