प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनोलय नादाभ्यन्तरवर्ति ज्योतिर्यद्वर्त्तते हि चिरम् । तत्र मनो लीनं चेन्न पुनः संसारबन्धाय ॥१४८॥ नादके भीतर रहनेवाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकालतक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता । परमानन्दानुभवात्सुचिरं नादानुसन्धानात् । श्रेष्ठश्चित्तलयोऽयं सत्स्वन्यलयेष्वनेकेषु ॥१४९॥ यद्यपि लयके और भी अनेक उपाय हैं तथापि जो चित्तलय दीर्घ कालतक नादानुसन्धान करते हुए परमानन्दका अनुभव होनेसे प्राप्त होता है वह सर्वोत्तम है ।
मनोलय
संसारतापतप्तं नानायोनिभ्रमात्परिश्रान्तम् । लब्ध्वा परमानन्दं न चलति चेतः कदा क्वापि ॥१५०॥ संसार-तापसे सन्तप्त और नाना योनियोंमें आने-जानेसे श्रान्त ( थका ) हुआ चित्त परमानन्दको प्राप्त करके फिर कभी चञ्चल नहीं होता । अद्वैतानन्दभरात्किमिदं कोऽहं च कस्याहम् । इति मन्थरतां यातं यदा तदा मूर्च्छितं चेतः ॥१५१॥ ४३