भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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प्रबोधसुधाकर नादानुसन्धान यावत्क्षणं क्षणार्धं स्वरूपपरिचिन्तनं क्रियते । तावद्दक्षिणकर्णे त्वनाहतः श्रूयते शब्दः ॥१४४॥ जब एक क्षण अथवा आधे क्षणके लिये भी स्वरूपका चिन्तन किया जाता है तब सीधे कानमें अनाहत-शब्द सुनायी देता है । सिद्ध्यारम्भस्थिरताविश्रमविश्वासबीजशुद्धीनाम् । उपलक्षणं हि मनसः परमं नादानुसन्धानम् ॥१४५॥ नादानुसन्धान मनके लिये सिद्धिके आरम्भ, स्थिरता, विश्राम, विश्वास और वीर्य-शुद्धिका बतलानेवाला परम चिह्न है । भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहतनादे मनः क्षणं रमते । किं पुनरनाहतेऽस्मिन्मधुमधुरेऽखण्डिते स्वच्छे ॥१४६॥ मन तो भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदिके आघातजन्य नादों- में भी एक क्षणके लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नादकी तो बात ही क्या है ? चित्तं विषयोपरमाद्यथा यथा याति नैश्चल्यम् । वेणोरिव दीर्घतरस्तथा तथा श्रूयते नादः ॥१४७॥ विषयोंसे उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरीके शब्दके समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है । ४२