प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
मनोनिन्दा मनोनिन्दा हसति कदाचिद्रौति भ्रान्तं सदशदिशो भ्रमति । हृष्टं कदापि रुष्टं शिष्टं दुष्टं च निन्दति स्तौति ॥५१॥ कमपि द्वेष्टि सरोषं ह्यात्मानं श्लाघते कदाचिदपि । चित्तं पिशाचमभवद्राक्षस्या तृष्णया व्याप्तम् ॥५२॥ इस तृष्णा-राक्षसीके अधीन होकर यह चित्त पिशाचरूप हो गया है । कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी भ्रान्त-सा होकर दशों दिशाओंमें घूमने लगता है । [ इसी प्रकार ] कभी हर्षित होता है और कभी रुष्ट हो जाता है । [ विवेकहीन हो जानेके कारण ] यह भद्र पुरुषोंकी निन्दा करता है और दुष्टोंकी स्तुति तथा कभी तो किसीसे रोषपूर्वक द्वेष करने लगता है और कभी अपनी प्रशंसा करने लगता है । दम्भाभिमानलोभैः कामक्रोधोरुमत्सरैश्चेतः । आकृष्यते समन्ताच्छ्वभिरिव पतितास्थिकं मार्गे ॥५३॥ मार्गमें पड़ी हुई हड्डीको जिस प्रकार कुत्ते अपनी-अपनी ओर खींचते हैं उसी प्रकार यह चित्त दम्भ, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध और मत्सरादिसे चारों ओरसे खींचा जा रहा है । तस्माच्छुद्धविरागो मनोऽभिलषितं त्यजेदर्थम् । तदनभिलषितं कुर्यान्निर्व्यापारं ततो भवति ॥५४॥ १५
प्रबोधसुधाकर अतः शुद्ध वैराग्यका आश्रय लेकर जो पदार्थ मनको रुचिकर हों उन्हें त्याग दे और जो बात उसे रुचिकर न हो वही करे, इससे चित्त निष्क्रिय हो जाता है। विषयनिग्रह संसृतिपारावारे ह्यगाधविषयोदकेन सम्पूर्णे । नृशरीरमम्बुतरणं कर्मसमीरैरितस्ततश्चलति ॥५५॥ अगाध विषय-जलसे भरे हुए इस संसार-समुद्रमें नर-देहरूप एक नौका है, जो कर्म-वायुसे प्रेरित होकर इधर-उधर डगमगाती फिरती है। छिद्रैर्नवभिरुपेतं जीवो नौकापतिर्महानलसः । छिद्राणामनिरोधाज्जलपरिपूर्णं पतत्यधः सततम्॥५६॥ यह नौका [ इन्द्रिय-गोलकरूप ] नौ छिद्रोंसे युक्त है, इसका स्वामी जीव अत्यन्त आलसी है। छिद्रोंके न रोकनेसे उसमें [ विषय- रूप ] जल भर जाता है और वह निरन्तर डूबती रहती है। छिद्राणां तु निरोधात्सुखेन पारं परं याति । तस्मादिन्द्रियनिग्रहमृते न कश्चित्तरत्यनृतम् ॥५७॥ इन छिद्रोंके रोक देनेसे यह सुखपूर्वक संसार-सागरके उस पार पहुँच सकती है, इसलिये इन्द्रिय-निग्रहके बिना इस मिथ्या प्रपञ्चको कोई पार नहीं कर सकता। १६
विषयनिग्रह
विषयनिग्रह पश्यति परस्य युवतिं सकाममपि तन्मनोरथं कुरुते । ज्ञात्वैव तदप्राप्तिं व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ॥५८॥ पुरुष परस्त्रीको कामवश देखता है और उसकी प्राप्तिकी कामना भी करता है । यद्यपि यह जानता है कि उसका मिलना सर्वथा असम्भव है तथापि [ उसकी कामना करके ] वह व्यर्थ घोर पापका भागी बन जाता हैं । पिशुनैः प्रकाममुदितां परस्य निन्दां शृणोति कर्णाभ्याम् तेन परः किं म्रियते व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ५६ मनुष्य अपने कानोंसे चुगलखोरोंद्वारा मनमानी कही हुई परायी निन्दा सुनता रहता हैं; इससे क्या वह पुरुष [ जिसकी निन्दा की जाती है ] मर जाता है ? [ उसका तो कुछ भी नहीं बिगड़ता ] उलटे निन्दा सुननेवाला ही, घोर पापका भागी बन जाता है । अनृतं परापवादं रसना वदति प्रतिक्षणं तेन । परहानिर्लब्धिः का व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ६० जिह्वा क्षण-क्षणमें दूसरे पुरुषोंकी निन्दा और मिथ्याभाषण किया करती है, इससे दूसरोंकी क्या हानि अथवा [ अपना क्या ] लाभ हो सकता है ? वह निन्दक पुरुष व्यर्थ ही महापापका भागी हो जाता है । १७ २
विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेषसमयेन यत्सुखं भवति ।
प्रबोधसुधाकर विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेषसमयेन यत्सुखं भवति । विषये नष्टे दुःखं यावज्जीवं च तत्तयोर्मध्ये ॥६१॥ हेयमुपादेयं वा प्रविचार्य सुनिश्चितं तस्मात् । अल्पसुखस्य त्यागादनल्पदुःखं जहाति सुधीः ॥६२॥ विषय और इन्द्रियोंका संयोग होनेपर पुरुषको पलभरके लिये जो सुख होता है, विषयके नष्ट होनेपर वही यावज्जीवन दुःखरूप हो जाता है; अतः इन दोनोंमें त्याज्य और ग्राह्यका भलीभाँति विचार करके यह निश्चय हुआ कि यदि बुद्धिमान् पुरुष अल्प सुखकी वासना छोड़ दे तो वह बड़े भारी दुःखका अन्त कर देता है । धीवरदत्तमहामिषमश्नन्वैसारिणो म्रियते । तद्वद्विषयान्भुञ्जन्कालाकृष्टो नरः पतति ॥६३॥ धीवरद्वारा काँटेमें लगाकर डाले हुए थोड़े-से मांसको खानेसे मछलीको प्राण-त्याग करना पड़ता है, इसी प्रकार विषयोंका सेवन करता हुआ पुरुष कालके जालमें पड़कर नष्ट हो जाता है । उरगग्रस्तार्धतनुर्भैकोऽश्नातीह मक्षिकाः शतशः । एवं गतायुरपि सन्विषयान्समुपार्जयत्यन्धः ॥६४॥ सर्पके द्वारा आधा निगल लिये जानेपर भी मेंढक सैकड़ों मक्खियोंको खाता रहता है, इसी प्रकार तृष्णान्ध पुरुष अवस्थाके ढल जानेपर भी विषय-सेवन करता ही रहता है । १८
मनोनिग्रह मनोनिग्रह स्वीयोद्गमतोयवहा सागरमुपयाति नीचमार्गेण । सा स्वीयोद्गम एव स्थिरा सती किं न याति वार्धित्त्वम् ६५ अपने उद्गम-स्थान (निकासकी जगह) से निकलकर नीचे मार्गसे बहनेवाली नदी समुद्रमें जा मिलती है, वह यदि उद्गम स्थानपर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती ? एवं मनः स्वहेतुं विचारयत्सुस्थिरं भवेदन्तः । न बहिर्वोदेति तदा किं नात्मत्वं स्वयं याति ॥६६॥ इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारणका विचार करता हुआ अपने आपमें ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयोंमें न जाय तो क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा ? वर्षास्वम्भःप्रचयात्कूपे गुरुनिर्झरे पयः क्षारम् । ग्रीष्मेणैव तु शुष्के माधुर्यं भजति तत्राम्भः ॥६७॥ कुओं और बड़े-बड़े झरनोंमें वर्षाऋतुमें अधिक जल इकट्ठा हो जानेसे वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतुमें सूखकर अल्प परिमाणमें रह जानेपर उनका जल मीठा हो जाता है ! तद्वद्विषयोद्रिक्तं तमःप्रधानं मनः कलुषम् । तस्मिन्विरागशुष्के शनकैराविर्भवेत्सत्त्वम् ॥६८॥ १९
प्रबोधसुधाकर उसी प्रकार विषय-वासनाओंसे भरा हुआ चित्त तमोगुणी और पापमय होता है, वैराग्यद्वारा उसीके सूख जानेपर उसमें धीरे-धीरे सत्त्वगुणका आविर्भाव हो जाता है । यं विषयमभिलषित्वा धावति बाह्येन्द्रियद्वारा । तस्याप्राप्तौ खिद्यति तथा यथा स्वं गतं किञ्चित्॥६९॥ जिस विषयकी अभिलाषासे यह चित्त किसी बाह्येन्द्रिय- द्वारा दौड़ता है उसके न मिलनेपर ऐसा दुखी होता है मानो इसका कुछ खो गया हो ! नगनगरदुर्गदुर्गमसरितः परितः परिभ्रमच्चेतः । यदि नो लभते विषयं यन्त्रितमिव खिन्नतां याति ॥७०॥ अपने अभीष्ट विषयकी खोजमें पर्वत, नगर, दुर्ग और दुर्गम नदियोंमें सब ओर भटकता हुआ चित्त यदि उस विषयको नहीं पाता तो विवश-सा होकर खिन्न हो जाता है । तुम्बीफलं जलान्तर्बलादधः क्षिप्तमप्युपैत्यूर्ध्वम् । तद्वन्मनः स्वरूपे निहितं यत्नाद्बहिर्याति ॥७१॥ तूँबेको बड़े वेगसे भी जलमें फेंका जाय तो भी वह तुरन्त जलके ऊपर ही आ जाता है, इसी प्रकार अपने स्वरूपमें यत्न- पूर्वक लगानेपर भी चित्त पुनः-पुनः बाहर निकल जाता है । २०
मनोनिग्रह इह वा पूर्वभवे वा स्वकर्मणैवार्जितं फलं यद्यत् । शुभमशुभं वा तत्तद्भोगोऽप्यप्रार्थितो भवति ॥७२॥ इस जन्मके अथवा पूर्वजन्मके कर्मोंसे उपार्जित जैसे-जैसे शुभ अथवा अशुभ फल होने होते हैं, उनके भोग भी बिना माँगे उपस्थित हो जाते हैं । चेतःपशुमशुभपथं प्रधावमानं निराकर्तुम् । वैराग्यमेकमुचितं गलकाष्ठं निर्मितं धात्रा ॥७३॥ कुमार्गकी ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशुको रोकनेके लिये विधाताने एकमात्र वैराग्यको ही गलेका उचित काष्ठ बनाया । निद्रावसरे यत्सुखमेतत्किं विषयजं यस्मात् । न हि चेन्द्रियप्रदेशावस्थानं चेतसो निद्रा ॥७४॥ निद्राके समय जो सुख होता है क्या वह विषयजन्य होता है ? [ कदापि नहीं ] क्योंकि चित्तका इन्द्रिय-गोलकोंमें न रहना ही तो निद्रा है । अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः । बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतद्भ्रूसंश्र तथा॥७५॥ सर्वेन्द्रियावरोधाद्योगशतैर्निर्गमं वीक्ष्य । शान्तं तिष्ठति चेतो निरुद्यमत्वं तदा याति ॥७६॥ २१
प्रबोधसुधाकर बिना द्वारके ऊँचे परकोटेवाले घरमें बंद किया हुआ सिंह बाहर निकलनेके बहुत-से प्रयत्न करनेपर अन्तमें थककर लम्बे-लम्बे श्वास लेता हुआ जैसे पड़ रहता है, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियोंके रोक देनेपर सैकड़ों उपायोंसे भी बाहर निकलना असम्भव जानकर चित्त शान्त होकर स्थिर हो जाता है और फिर धूम-धाम नहीं करता । प्राणस्पन्दनिरोधात्सत्सङ्गाद्वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥७७॥ प्राण-स्पन्दनके रोक देनेसे, सत्संगसे, वासनाओंके त्यागसे और भगवच्चरणारविन्दोंकी भक्तिसे मन धीरे-धीरे अपने वेगको छोड़ देता है । वैराग्य परगृहगृहिणीपुत्रद्रविणानामागमे विनाशे वा । प्रथितौ हर्षविषादौ किं वा स्यातां क्षणं स्थातुः ॥७८॥ दूसरेके गृह, स्त्री, पुत्र और धनादिके आने-जानेसे होनेवाले हर्ष या विषाद क्या वहाँ क्षणभर ठहरनेवाले पुरुषको हो सकते हैं ? दैवात्स्थितं गतं वा यं कञ्चिद्विषयमीड्यमल्पं वा । नो तुष्यन्न च सीदन्वीक्ष्य गृहेष्वतिथिवन्निवसेत् । ७९ । २२
वैराग्य इसी प्रकार मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि घरमें अतिथिके समान रहे; किसी भी स्तुत्य अथवा तुच्छ विषयको दैववश स्थित अथवा गया हुआ देखकर न तो सन्तुष्ट ही हो और न दुःख ही माने । ममताभिमानशून्यो विषयेषु पराङ्मुखः पुरुषः । तिष्ठन्नपि निजसदने न बाध्यते कर्मभिः क्वापि ॥८०॥ अपनेपनके अभिमानसे शून्य तथा विषयोंसे विमुख रहने- वाला पुरुष अपने घरमें रहता हुआ भी कर्मोंसे कभी बाधित नहीं होता । कुत्राप्यरण्यदेशे सुनीलतृणवालुकोपचिते । शीतलतरुतलभूमौ सुखं शयानस्य पुरुषस्य ॥८१॥ तरवः पत्रफलाढ्याः सुगन्धशीतानिलाः परितः । कलकूजितवरविहगाः सरितो मित्राणि किं न स्युः॥८२॥ हरी-भरी घास और सुकोमल श्वेत वालुकासे ढँके हुए किसी वन्य-प्रदेशमें वृक्षकी शीतल छायामें सुखपूर्वक सोते हुए पुरुषके फल-दलसे युक्त वृक्ष, मन्द सुगन्ध शीतल वायु, सब ओर सुन्दर कलरव करते हुए पक्षी और नदियाँ भी क्या मित्र नहीं बन जाते ? [ अर्थात् क्या इन सबमे उसका चित्त नहीं बहल जाता ? ] वैराग्यभाग्यभाजः प्रसन्नमनसो निराशस्य । अप्रार्थितफलभोक्तुः पुंसो जन्मनि कृतार्थतेह स्यात् ॥ २३
प्रबोधसुधाकर संसारमें वैराग्यरूपी सौभाग्यके पात्र, प्रसन्नचित्त, विषयाशा- हीन और यथा-प्राप्त प्रारब्ध-फल भोगनेवाले पुरुषको इसी जन्ममें कृतार्थता प्राप्त हो जाती है। द्रव्यं पाणितलाच्च्युतं यदि भवेत्क्वापि प्रमादात्तदा शोकायाथ तदर्पितं श्रुतवते तोषाय च श्रेयसे । स्वातन्त्र्याद्विषयाः प्रयान्ति यदमी शोकाय ते स्युश्चिरं सन्त्यक्ताः स्वयमेव चेत्सुखमयं निःश्रेयसं तन्वते ॥८४॥ जिस प्रकार असावधानतावश हाथसे गिरा हुआ पदार्थ तो शोकका कारण होता है, किन्तु यदि उसे किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान कर दिया जाय तो वही सन्तोष और शुभ गतिका देने- वाला हो जाता है, उसी प्रकार यदि विषय अपने-आप छूटते हैं तब तो बहुत दिनोंतक खटकते रहते हैं; किन्तु यदि उन्हें अपनी इच्छासे छोड़ा जाय तो वे सुख और कल्याणके देनेवाले हो जाते हैं। विस्मृत्यात्मनिवासमुत्कटभवाटव्यां चिरं पर्यट- न्सन्तापत्रयदीर्घदावदहनज्वालावलीव्याकुलः । वल्गन्फल्गुषु सुप्रदीप्तनयनश्चेतःकुरङ्गो बला- दाशापाशवशीकृतोऽपि विषयव्याघ्रैर्मृषा हन्यते॥८५॥ अपने निवासस्थानको भूलकर चिरकालतक इस भयङ्कर संसार-वनमें भटकता और तापत्रयरूपी प्रचण्ड दावानलकी ज्वाला- २४
आत्मसिद्धि मालाओंसे व्याकुल होकर तुच्छ विषयोंके लिये उछलता-कूदता यह चमकीली आँखोंवाला चित्तरूपी हरिण आशा-पाशमें पड़ा हुआ ही विषयरूपी व्याघ्रोंद्वारा बेमौत मारा जाता है । आत्मसिद्धि उत्पन्नेऽपि विरागे विना प्रबोधं सुखं न स्यात्। स भवेद्गुरूपदेशात्तस्माद्गुरुमाश्रयेत्प्रथमम् ॥८६॥ वैराग्य हो जानेपर भी बिना बोधके आनन्दकी प्राप्ति नहीं होती, बोध गुरुके उपदेशसे ही होता है, अतः सबसे पहले गुरु- देवकी शरणमें जाय । यद्यपि जलधेरुदकं यद्यपि वा प्रेरकोऽनिलस्तत्र । तदपि पिपासाकुलितः प्रतीक्षते चातको मेघम् ॥८७॥ यद्यपि [मेघमें रहनेवाला] समुद्रका जल सामने भरा पड़ा है, और उसे ऊपर उड़ानेवाला प्रेरक वायु भी वहाँ है परन्तु प्याससे तड़पता हुआ चातक मेघकी ही प्रतीक्षा करता है [इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र विराजमान है तथापि जिज्ञासुको उसका ज्ञान गुरुके द्वारा ही होता है ] । त्रेधा प्रतीतिरुक्ता शास्त्राद्गुरुतस्तथात्मनस्तत्र । शास्त्रप्रतीतिरादौ यद्वन्मुखतः गुरोऽस्तीति ॥८८॥
प्रबोधसुधाकर आत्माकी प्रतीति शास्त्र, गुरु और अपना अन्तःकरण इन तीन साधनोंसे होती बतलायी जाती है। उनमें प्रथम प्रतीति शास्त्रद्वारा होती है, जैसे पहले लोगोंसे सुनकर यह ज्ञान होता है कि 'गुड़ मीठा होता है'। अग्रे गुरुप्रतीतिर्दूराद्गुडदर्शनं यद्वत् । आत्मप्रतीतिरस्माद्गुडभक्षणजं सुखं यद्वत् ॥८९॥ तदुपरान्त गुड़को दूरसे देख लेनेके समान दूसरी प्रतीति गुरुद्वारा होती है और उससे गुड़भक्षणजनित सुखके समान आत्माकी [ साक्षात् ] प्रतीति होती है । रसगन्धरूपशब्दस्पर्शा अन्ये पदार्थाश्च । कस्मादनुभूयन्ते नो देहान्नेन्द्रियग्रामात् ॥९०॥ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तथा अन्यान्य पदार्थ किसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं ? देह या इन्द्रियोंद्वारा तो इनका अनुभव हो नहीं सकता । मृतदेहेन्द्रियवर्गो यतो न जानाति दाहजं दुःखम् । प्राणश्चेन्निद्रायां तस्करबाधां स किं वेत्ति ॥९१॥ क्योंकि मरे हुए प्राणीके देह और इन्द्रियाँ दाह-जन्य दुःख- का अनुभव नहीं करते । यदि कहा जाय कि प्राण ही इनका अनुभव करता है, तो सो जानेपर क्या उसे चोर आदिसे होनेवाली हानिका ज्ञान होता है ? २६
आत्मसिद्धि मनसो यदि वा विषयस्तद्युगपत्किं न जानाति । तस्य पराधीनत्वाद्यतः प्रमादस्य कस्त्राता ॥६३॥ यदि इन्हें मनका विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही अनुभव क्यों नहीं कर लेता ? वास्तवमें वह तो पराधीन है क्योंकि यदि उसे स्वतन्त्र माना जाय तो उसको प्रमादसे कौन बचा सकता था ? गाढध्वान्तगृहान्ततः क्षितितले दीपं निधायोज्ज्वलं पञ्चच्छिद्रमधोमुखं हि कलशं तस्योपरि स्थापयेत् । तद्वाह्ये परितोऽनुरन्ध्रममलां वीणां च कस्तूरिकां सद्रत्नं व्यजनं न्यसेच्च कलशाच्छिद्राध्वनिर्गच्छता ॥ तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा । किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥६४॥ एक गाढ़ अन्धकारमय घरके भीतर पृथ्वीपर एक स्फुट- प्रकाशमय दीपक रक्खे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला घड़ा नीचेको मुख करके स्थापित करे । उसके बाहर प्रत्येक छिद्रके सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तूरी, रत्न और पङ्खा रक्खे । २७
प्रबोधसुधाकर अब उस कलशके छिद्रोंसे बाहर निकलनेवाले तेजके अंशोंसे जो उन विविध पदार्थोंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है ? छिद्रोंसे, कलशसे, मृत्तिकासे, पात्रसे, तैलसे या बत्तीसे ? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होनेके कारण इनमेंसे किसीसे भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थोंके ज्ञानमें तो एकमात्र दीपकका प्रकाश ही शरण ( कारण ) है, इसी प्रकार शरीरमें भी प्रत्येक ज्ञानका आधार आत्मा ही है ।
मायासिद्धि
चिन्मात्रः परमात्मा ह्यपश्यदात्मानमात्मतया । अभवत्सोऽहंनामा तस्मादासीद्भिदो मूलम् ॥६५॥ चिन्मात्र परमात्माने ही प्रथम अपने आपको आपरूपसे देखा । तब उसका नाम 'अहंकार' हुआ । उसीसे भेदकी नींव पड़ी । द्वैधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै । तस्मादयमाकाशः स्त्रियैव परिपूर्यते सततम् ॥६६॥ सेयमपीक्षाञ्चक्रे ततो मनुष्या अजायन्त । इत्युपनिषदः प्राहुर्बृहदारण्यके याज्ञवल्क्योक्त्या ॥६७॥ बृहदारण्यक शाखामें याज्ञवल्क्यकी उक्तिद्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नीका आविर्भाव हो जाता है । तब यह २८
मायासिद्धि आकाश ( आकाशके समान शून्यप्राय पुरुष ) सर्वदा स्त्रीके द्वारा ही पूर्ण होता है । उस स्त्रीने ईक्षण किया और तब उससे मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । * चिरमानन्दानुभवात्सुषुप्तिरिव काप्यवस्थाभूत् । परमात्मनस्तु तस्मात्स्वप्नवदेवोत्थिता माया ॥६८॥ चिरकालीन आनन्दका अनुभव करते-करते परमात्माकी सुषुप्तिके समान कोई अवस्था हो गयी थी । उसीसे स्वप्नके समान मायाका आविर्भाव हुआ । सदसद्विलक्षणासौ परमात्मसदाश्रयानादिः । सा च गुणत्रयरूपा सूते सचराचरं विश्वम् ॥६९॥ यह माया सत् और असत्से विलक्षण है, अनादि है और सदैव परमात्माके आश्रय रहनेवाली है । यह त्रिगुणात्मिका माया ही चराचर जगत्को उत्पन्न करती है ।
- इस श्लोकमें भगवान् शङ्कराचार्यने बृहदारण्यक उपनिषद्की इस श्रुतिका अभिप्राय ही अभिव्यक्त किया है— स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् । स हैतावानास यथा स्त्रीपुमा ँ सौ संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्य- स्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ता ँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ( बृह० १ । ४ । ३ ) २९
प्रबोधसुधाकर माया तावददृश्या दृश्यं कार्यं कथं जनयेत् । तन्तुभिरदृश्यरूपैः पटोऽत्र दृश्यः कथं भवति ॥१००॥ यदि कहें कि माया तो अव्यक्त है वह इस व्यक्त प्रपञ्चको कैसे उत्पन्न कर सकती है ? तो यह बताओ कि अदृश्यरूप सूक्ष्म तन्तुओंसे दृश्य ( स्थूल ) पट कैसे उत्पन्न हो जाता है ? स्वप्ने सुरतानुभवाच्छुक्रद्रावो यथा शुभे वसने । अनृतं रतं प्रबोधे वसनोपहतिर्भवेत्सत्या ॥१०१॥ स्वप्ने पुरुषः सत्यो योषिदसत्या तयोर्युतिश्च मृषा । शुक्रद्रावः सत्यस्तद्वत्प्रकृतेऽपि सम्भवति ॥१०२॥ स्वप्नमें स्त्री-सम्भोगका अनुभव होनेसे जिस प्रकार शुद्ध वस्त्रमें ही वीर्यपात हो जाता है [ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृतिसे व्यक्त जगत् हो जाता है ] जग जानेपर स्वप्नका रमण तो मिथ्या हो जाता है, किन्तु उससे वस्त्र सचमुच बिगड़ जाता है; स्वप्नावस्थामें भी पुरुष तो सत्य ही होता है किन्तु स्त्री असत्य और उन दोनोंका संयोग भी मिथ्या ही होता है, फिर भी वीर्यपात सत्य ही हो जाता है । इसी प्रकार प्रस्तुत विषय ( अदृश्य मायासे दृश्य प्रपञ्चके उत्पन्न होने ) में भी हो सकता है । एवमदृश्या माया तत्कार्यं जगदिदं दृश्यम् । माया तावदियं स्याद्या स्वविनाशेन हर्षदा भवति॥१०३॥ ३०
मायासिद्धि इसी प्रकार माया तो अदृश्य है किन्तु उसका कार्य यह जगत् दृश्यरूप है, और माया तो यही है कि वह अपने नाशसे ही आनन्द देनेवाली होती है। रजनीवातिदुरन्ता न लक्ष्यतेऽत्र स्वभावोऽस्याः। सौदामनीव नश्यति मुनिभिः सम्प्रेक्ष्यमाणैव ॥१०४॥ यह अन्धकारमयी रात्रिके समान दुरन्त है, इसके स्वभावका कुछ पता ही नहीं चलता; क्योंकि मुनिजनोंद्वारा विचारपूर्वक देखी जाते ही यह बिजलीके समान तुरन्त नष्ट हो जाती है। माया ब्रह्मोपगताविद्या जीवाश्रया प्रोक्ता। चिद्चिद्ग्रन्थिश्चेतस्तदक्षयं ज्ञेयमामोक्षात् ॥१०५॥ यह ब्रह्मके अधीन होनेसे 'माया' और जीवके आश्रित होनेसे 'अविद्या' कही जाती है। यह जड और चेतनकी ग्रन्थि ही 'चित्त' है। इसे जबतक मोक्ष न हो, अक्षय ही जानना चाहिये। घटमठकुड्यैरावृतमाकाशं तत्तदाह्वयं भवति। तद्वदविद्यावृतमिह चैतन्यं जीव इत्युक्तः ॥१०६॥ घट, मठ और भित्ति आदि उपाधियोंसे आवृत आकाश भी घटाकाश, मठाकाश आदि तदनुकूल नामवाला हो जाता है, उसी प्रकार अविद्यासे आवृत शुद्ध, चेतन ही जीव कहलाता है। ३१
प्रबोधसुधाकर ननु कथमावरणं स्यादज्ञानं ब्रह्मणो विशुद्धस्य । सूर्यस्येव तमिस्रं रात्रिभवं स्वप्रकाशस्य ॥१०७॥ शंका-अज्ञान विशुद्ध ब्रह्मका आवरण किस प्रकार कर सकता है ? रात्रिका अन्धकार भी क्या स्वयंप्रकाश सूर्यको ढक सकता है ? दिनकरकिरणोत्पन्नैर्मेघैराच्छाद्यते यथा सूर्यः । न खलु दिनस्य दिनत्वं तैर्विकृतं सान्द्रसङ्घातैः॥१०८॥ अज्ञानेन तथात्मा शुद्धोऽपि च्छाद्यते सुचिरम् । न परन्तु लोकसिद्धा प्राणिषु तच्चेतनाशक्तिः ॥१०९॥ समाधान-जिस प्रकार सूर्य अपनी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए मेघोंसे ढक जाता है किन्तु उस मेघ-समूहसे दिनके दिनत्वमें कोई विकार नहीं होता, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा भी चिरकालतक अज्ञानसे आवृत तो रहता है, परन्तु प्राणियोंमें जो लोक-प्रसिद्ध चेतनाशक्ति है उसका आच्छादन नहीं होता । लिङ्गदेहादि-निरूपण स्थूलशरीरस्यान्तर्लिङ्गशरीरं च तस्यान्तः । कारणमस्याप्यन्तस्ततो महाकारणं तुर्यम् ॥११०॥ स्थूल शरीरके भीतर लिङ्गदेह है, उसके भीतर कारणशरीर है और उसके भी भीतर महाकारण नामक तुरीय आत्मा है । ३२
लिङ्गदेहादि-निरूपण स्थूलं निरूपितं प्रागधुना सूक्ष्मादितो ब्रूमः । अंगुष्ठमात्रः पुरुषः श्रुतिरिति यत्प्राह तत्सूक्ष्मम् ॥१११॥ स्थूल शरीरका तो पहले निरूपण हो चुका, अब सूक्ष्मादिका वर्णन करते हैं । जिसको श्रुतिने 'अंगुष्ठमात्र पुरुष' कहा है वही यह सूक्ष्म शरीर है । सूक्ष्माणि महाभूतान्यसवः पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चैव । षोडशमन्तःकरणं तत्सङ्घातो हि लिङ्गतनुः ॥११२॥ पाँच सूक्ष्म महाभूत, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और सोलहवाँ अन्तःकरण-इन तत्त्वोंके समूहका नाम ही 'सूक्ष्म शरीर' है । तत्कारणं स्मृतं यत्तस्यान्तर्वासनाजालम् । तस्य प्रवृत्तिहेतुर्बुद्ध्याश्रयमत्र तुर्यं स्यात् ॥११३॥ उस लिंगदेहके अन्दर जो वासनाओंका समूह है वही 'कारण-शरीर' कहलाता है । उसकी भी प्रवृत्तियोंके कारण और बुद्धिके आश्रयको 'तुर्य' ( महाकारण ) समझना चाहिये । तत्सारभूतबुद्धौ यत्प्रतिफलितं तु शुद्धचैतन्यम् । जीवः स उक्त आद्यैर्योऽहमिति स्फूर्तिकृद्वपुषि ॥११४॥ ३३ २
प्रबोधसुधाकर लिंगदेहकी साररूपा बुद्धिमें प्रतिबिम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसीको पूर्वाचार्योंने जीव कहा है, जिसके कारण शरीरमें 'मैं' इस प्रकारकी स्फूर्ति होती है । चलतरतरङ्गसङ्गात्प्रतिविम्बं भास्करस्य च चलं स्यात् । अस्ति तथा चञ्चलता चैतन्ये चित्तचाञ्चल्यात् ॥११५॥ जिस प्रकार अति चञ्चल तरंगोंके कारण सूर्यका प्रतिबिम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्तकी चञ्चलतासे चैतन्यमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । नन्वर्कप्रतिविम्बः सलिलादिषु यः स चावभासयति । किमितरपदार्थनिवहं प्रतिविम्बोऽप्यात्मनस्तद्वत् ११६ शंका-जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब तो अन्यान्य पदार्थोंको प्रकाशित करता है, क्या आत्म-प्रतिबिम्ब भी उसीके समान दूसरे पदार्थोंको प्रकाशित किया करता है ? प्रतिफलितं यत्तेजः सवितुः कांस्यादिपात्रेषु । तदनुप्रविष्टमन्तर्गृहमन्यार्थान्प्रकाशयति ॥११७॥ चित्प्रतिविम्बस्तद्वद्बुद्धिषु यो जीवतां प्राप्तः। नेत्रादीन्द्रियमार्गैर्बहिरर्थान् सोऽवभासयति ॥११८॥ ३४