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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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अनन्त प्रेमार्णव

ॐ पुष्पाञ्जलि माटी-मिस जिन मातु बिस्व मुखमें दिखरायौ । लुक-छिप माखन खाय मोद ब्रज-बधुन बढ़ायौ ॥ ग्वाल-करनको कौर छीनि जिन रुचि-रुचि खायौ । बनि रसिकन-सिरताज मदन-मद धूरि मिलायौ ॥ जो लीला-रस विस्तार-हित निरगुन प्रगटे सगुन ह्वै । उन ललित-ललन नँदनँदनके पद-पदुमन यह सुमन है ॥ —अनुवादक

(इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है, केवल भगवान श्रीकृष्ण का चित्र है।)

विषय-सूची

श्रीहरिः विषय-सूची विषय पृष्ठ-संख्या १-देह-निन्दा ... ... १ २-विषय-निन्दा ... ... ८ ३-मनोनिन्दा ... ... १५ ४-विषयनिग्रह ... ... १६ ५-मनोनिग्रह ... ... १९ ६-वैराग्य ... ... २२ ७-आत्मसिद्धि ... ... २५ ८-मायासिद्धि ... ... २८ ९-लिंगदेहादि-निरूपण ... ... ३२ १०-अद्वैत ... ... ३५ ११-कर्तृत्व-भोक्तृत्व ... ... ३९ १२-स्वप्रकाशता ... ... ४० १३-नादानुसन्धान ... ... ४२ १४-मनोलय ... ... ४३ १५-प्रबोध ... ... ४५ १६-द्विधाभक्ति ... ... ४८ १७-ध्यानविधि ... ... ५२ १८-सगुण-निर्गुणकी एकता ... ... ५५ १९-अनुग्रह ... ... ६४

[चित्र: बालकृष्ण]

ॐ श्रीपरमात्मने नमः प्रबोधसुधाकर देह-निन्दा नित्यानन्दैकरसं सच्चिन्मात्रं स्वयंज्योतिः । पुरुषोत्तममजमीशं वन्दे श्रीयादवाधीशम् ॥ १ ॥ नित्य एकरस आनन्दस्वरूप, सच्चिन्मात्र, स्वयंप्रकाश, पुरुषोत्तम, अजन्मा और ईश्वर, यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्रकी वन्दना करता हूँ। यं वर्णयितुं साक्षाच्छ्रुतिरपि मूकेव मौनमाचरति । सोऽस्माकं मनुजानां किं वाचां गोचरो भवति ॥ २ ॥ जिनका साक्षात् ( विधि-मुखसे ) वर्णन करनेमें श्रुति भी मूकके समान मौन हो जाती हैं, वे ( भगवान् ) क्या हम मनुष्यों- की वाणीके विषय हो सकते हैं ? यद्यप्येवं विदितं तथापि परिभाषितो भवेदेव । अध्यात्मशास्त्रसारैर्हरिचिन्तनकीर्तनाभ्यासैः ॥ ३ ॥ १

प्रबोधसुधाकर यद्यपि भगवान् ऐसे हैं तथापि अध्यात्मशास्त्रोंके सारोंसे तथा हरि-चिन्तन और कीर्तनाभ्यासादिसे उनका कथन किया ही जाता है। कॢप्तैर्बहुभिरुपायैरभ्यासज्ञानभक्त्याद्यैः । पुंसो विना विरागं मुक्तेरधिकारिता न स्यात् ॥ ४ ॥ सम्पादन किये हुए अभ्यास, ज्ञान और भक्ति आदि नाना उपायोंसे भी बिना वैराग्यके मनुष्यको मुक्तिका अधिकार नहीं होता। वैराग्यमात्मबोधो भक्तिश्चेति त्रयं गदितम् । मुक्तेः साधनमादौ तत्र विरागो वितृष्णता प्रोक्ता ॥ ५ ॥ वैराग्य, आत्मज्ञान और भक्ति—मुक्तिके ये तीन साधन बतलाये गये हैं, इनमें तृष्णाहीनतारूप वैराग्य ही प्रथम है। सा चाहंममताभ्यां प्रच्छन्ना सर्वदेहेषु । तत्राहंता देहे ममता भार्यादिविषयेषु ॥ ६ ॥ वह वितृष्णता समस्त देहधारियोंके भीतर अहंता और ममतासे छिपी हुई है। उनमेंसे अहंता देहमें होती है और ममता स्त्री-धन आदि विषयोंमें हुआ करती है। देहः किमात्मकोऽयं कः सम्बन्धोऽस्य वा विषयैः। एवं विचार्यमाणेऽहंताममते निवर्तेते ॥ ७ ॥ 'यह देह किससे बना है और इसका विषयोंसे क्या सम्बन्ध २

देह-निन्दा है ?' ऐसा विचार करते रहनेसे अहंता और ममता निवृत्त हो जाती हैं । स्त्रीपुंसोः संयोगात्सम्पाते शुक्रशोणितयोः । प्रविशञ्जीवः शनकैः स्वकर्मणा देहमाधत्ते ॥ ८ ॥ स्त्री और पुरुषके संयोगसे रज और वीर्यका मेल होनेपर जीव अपने कर्मानुसार गर्भमें प्रवेश करके धीरे-धीरे देह धारण करता है । मातृगुरूदरदर्यां कफमूत्रपुरीषपूर्णायाम् । जठराग्निज्वालाभिर्नवमासं पच्यते जन्तुः ॥ ९ ॥ फिर नौ मासतक मल-मूत्र और कफादिसे पूर्ण माताकी कोखरूप बड़ी भारी कन्दरामें पड़ा हुआ यह जीव जठरानलकी ज्वालाओंसे जला करता है । दैवात्प्रसूतिसमये शिशुस्तिरश्चीनतां यदा याति । शस्त्रैर्विखण्ड्य स तदा बहिरिहनिष्कास्यतेऽतिबलात् ॥ प्रसवके समय यदि दैववश बालक टेढ़ा हो जाता है तो उसे शस्त्रोंसे काट-काटकर अति बलपूर्वक बाहर निकाला जाता है । अथवा यन्त्रच्छिद्रायदा तु निःसार्यते प्रबलैः । प्रसवसमीरैश्च तदा यः क्लेशः सोऽप्यनिर्वाच्यः॥११॥ अथवा यदि ठीक-ठीक प्रसव भी हुआ तो जिस समय वह ३

प्रबोधसुधाकर प्रबल प्रसूतिवायुके द्वारा संकुचित योनिछिद्रसे बाहर निकाला जाता है उस समयका क्लेश भी अकथनीय होता है। आधिव्याधिवियोगात्मीयविपत्कलहदीर्घदारिद्र्यैः । जन्मानन्तरमपि यः क्लेशः किं शक्यते वक्तुम् ॥१२॥ जन्मके अनन्तर भी आधि, व्याधि, वियोग, स्वजनोंकी विपत्ति, कलह और बहुत समयतक रहनेवाली दरिद्रता आदिसे जितना दुःख उठाना पड़ता है क्या उसका वर्णन किया जा सकता है ? नरपशुविहङ्गतिर्यग्योनीनां चतुरशीतिलक्षाणाम्। कर्मनिबद्धो जीवः परिभ्रमन्यातना भुङ्क्ते ॥१३॥ कर्मबन्धनसे बँधा हुआ जीव मनुष्य, पशु, पक्षी और तिर्यगादि चौरासी लाख योनियोंमें भ्रमता हुआ नाना प्रकारकी विपत्तियाँ झेलता है। चरमस्तत्र नृदेहस्तत्रोन्मान्वयोत्पत्तिः । स्वकुलाचारविचारः श्रुतिप्रचारश्च तत्रापि ॥१४॥ आत्मानात्मविवेको नो देहस्य च विनाशिताज्ञानम् । एवं सति स्वमायुः प्राज्ञैरपि नीयते मिथ्या ॥१५॥ उन सब योनियोंमें मनुष्य-देह सर्वश्रेष्ठ है; उस नरदेहमें भी उच्च कुलमें जन्म, अपने कुटुम्बके आचार-विचार तथा श्रुतिज्ञानको ४

देह-निन्दा पाकर भी जिनको आत्मा और अनात्माका विवेक तथा देहकी विनाशशीलताका ज्ञान नहीं हुआ वे भले ही बड़े बुद्धिमान् हों, ऐसी स्थितिमें उनकी आयु व्यर्थ ही जाती है । आयुः क्षणलवमात्रं न लभ्यते हेमकोटिभिः क्वापि । तच्चेद्गच्छति सर्वं मृषा ततः काधिका हानिः ॥१६॥ क्षण और पलभरकी आयु भी करोड़ों सुवर्ण-मुद्राओंके बदलेमें कभी नहीं मिल सकती । यदि ऐसी अमूल्य आयु व्यर्थ ही चली गयी तो इससे बढ़कर और क्या हानि होगी ? नरदेहातिक्रमणात्प्राप्तौ पश्चादिदेहानाम् । स्वतनोरप्यज्ञाने परमार्थस्यात्र का वार्ता ॥१७॥ नर-देहके नष्ट हो जानेपर यदि पशु आदिकी योनि मिली तो उसमें तो भलीभाँति अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रहती, परमार्थकी तो बात ही क्या है ? सततं प्रवाह्यमानैर्वृषभैरश्वैः खरैर्गजैर्महिषैः । हा कष्टं क्षुत्क्षामैः श्रान्तैर्नो शक्यते वक्तुम् ॥१८॥ हा ! वे क्षुधाक्षीण और थके होनेपर भी निरन्तर बोझा ढोनेवाले बैल, घोड़े, गधे, हाथी और भैंसे अपना कष्ट कुछ भी नहीं कह सकते । ५

प्रबोधसुधाकर रुधिरत्रिधातुमज्जामेदोमांसास्थिसंहतिर्देहः । स बहिस्त्वचा पिनद्धस्तस्मान्नो भक्ष्यते काकैः ॥१९॥ यह शरीर रुधिर, त्रिधातु (वात, पित्त, कफ), मज्जा, मेद, मांस और हड्डियोंका समूह है; बाहरसे यह त्वचासे मँढा हुआ है इसलिये इसे कौए भी नहीं खाते। नासाग्राद्वदनाद्वा कफं मलं पायुतो विसृजन् । स्वयमेवैति जुगुप्सामन्तः प्रसृतं च नो वेत्ति ॥२०॥ नासिकासे अथवा मुखसे कफको और गुदासे मलको त्याग करते समय मनुष्य स्वयं भी घृणा करता है तथापि इन्हें अपने शरीरके भीतर भरे हुए नहीं जानता। पथि पतितमस्थि दृष्ट्वा स्पर्शभयादन्यमार्गतो याति । नो पश्यति निजदेहं चास्थिसहस्रावृतं परितः ॥२१॥ मार्गमें पड़ी हुई हड्डीको देखकर वह उससे छू जानेके डरसे दूसरे मार्गसे निकल जाता है, परन्तु सब ओर हजारों हड्डियोंसे भरे हुए अपने शरीरको नहीं देखता ! केशावधि नखराग्रादिदमन्तः पूतिगन्धसम्पूर्णम् । बहिरपि चागरुचन्दनकर्पूराद्यैर्विलेपयति ॥२२॥ नखसे लेकर शिखापर्यन्त यह सारा शरीर दुर्गन्धसे भरा ६

देह-निन्दा हुआ है, फिर भी मनुष्य बाहरसे इसपर अगरु, चन्दन और कर्पूर आदिका लेप करता है ! यत्नादस्य पिधत्ते स्वाभाविकदोषसङ्घातम् । औपाधिकगुणनिवहं प्रकाशयञ्छ्लाघते मूढः ॥२३॥ मूढ पुरुष इसके स्वाभाविक दोषोंको यत्नपूर्वक छिपाता है, और औपाधिक ( ऊपरी ) गुणोंको प्रकट करता हुआ इसकी प्रशंसा करता है । क्षतमुत्पन्नं देहे यदि न प्रक्षाल्यते त्रिदिनम् । तत्रोत्पतन्ति बहवः कृमयो दुर्गन्धसङ्कीर्णाः ॥२४॥ शरीरमें यदि थोड़ा-सा घाव हो जाय और उसको तीन दिन भी न धोया जाय तो दुर्गन्धके कारण उसमें बहुत-से कीड़े पड़ जाते हैं । यो देहः सुप्तोऽभूत्सुपुष्पशय्योपशोभिते तल्पे । सम्प्रति स रज्जुकाष्ठैर्नियन्त्रितः क्षिप्यते वह्नौ ॥२५॥ देखो, जो शरीर अति सुशोभित फूलोंकी सेजपर सुखपूर्वक सोया हुआ था वह अब रस्सी और काठसे जकड़ा जाकर अग्निमें फेंका जा रहा है ! सिंहासनोपविष्टं दृष्ट्वा यं मुदमवाप लोकोऽयम् । तं कालाकृष्टतनुं विलोक्य नेत्रे निमीलयति ॥२६॥ ७

विषय-निन्दा

प्रबोधसुधाकर जिसे सिंहासनपर विराजमान देखकर लोग आनन्दित होते थे उसी पुरुषको आज कालके गालमें पड़ा देखकर वे नेत्र मूँद लेते हैं। एवंविधोऽतिमलिनो देहो यत्सत्तया चलति । तं विस्मृत्य परेशं वहत्यहंतामनित्येऽस्मिन् ॥२७॥ ऐसा महामलिन देह जिसकी सत्तासे चलता है उस परमेश्वरको भुलाकर इस अनित्य और अपवित्र देहमें लोग 'अहं- बुद्धि' करते हैं ! क्वात्मा सच्चिद्रूपः क मांसरुधिरास्थिनिर्मितो देहः । इति यो लज्जति धीमानितरशरीरं स किं मनुते॥२८॥ 'कहाँ तो सत्-चित्-स्वरूप आत्मा और कहाँ अस्थि, मांस और रुधिर आदिका बना हुआ यह अति घृणित देह ?' ऐसा विचारकर जो बुद्धिमान् लज्जित होता है, वह दूसरोंके देहों- को क्या समझेगा ? [ उनसे अपना सम्बन्ध क्यों जोड़ेगा ? ] विषय-निन्दा मूढः कुरुते विषयजकर्दमसम्मार्जनं मिथ्या । दुरदृष्टवृष्टिभिरसौ देहो गेहं पतत्येव ॥२९॥ अविचारी लोग इस विषयभोगजनित मांसपिण्डको व्यर्थ ही धोते-पोंछते हैं । आखिर दुर्भाग्यरूप वर्षासे एक दिन यह देहरूप घर गिर ही जाता है । ८

विषय-निन्दा भार्या रूपविहीना मनसः क्षोभाय जायते पुंसाम् । अत्यन्तं रूपाढ्या सा परपुरुषैर्वशीक्रियते ॥३०॥ जो स्त्री कुरूपा होती है उससे तो पुरुषोंका चित्त कुढ़ा करता है और जो अत्यन्त रूपवती होती है वह परपुरुषोंके चंगुलमें फँस जाती है । यः कश्चित्परपुरुषो मित्रं भृत्योऽथवा भिक्षुः । पश्यति हि साभिलाषं विलक्षणोदाररूपवतीम् ॥३१॥ मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्यों न हो अति अद्भुत रूपवती स्त्रीको वह चाहभरी दृष्टिसे देखने ही लगता है । यं कञ्चित्पुरुषवरं स्वभर्तुरतिसुन्दरं दृष्ट्वा । मृगयति किं न मृगाक्षी मनसेव परस्त्रियं पुरुषः ॥३२॥ जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्रीकी ताकमें रहता है उसी प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पतिसे अधिक रूपवान् पुरुषको देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूँ ढ़ा करती ? एवं सुरूपनार्या भर्ता कोपात्प्रतिक्षणं क्षीणः । नो लभते सुखलेशं बलिमिव बलिभुग्बहुष्वेकः ॥३३॥ इस प्रकार रूपवती स्त्रीका पति क्षण-क्षणमें ईर्ष्यानलसे क्षीण होता हुआ जरा भी चैन नहीं पाता; जैसे बहुत-से कौवोंमें पड़ी हुई बलिको एक कौवा नहीं पा सकता । ९

प्रबोधसुधाकर वनिता नितान्तमज्ञा स्वाज्ञामुल्लङ्घ्य वर्तते यदि सा । शत्रोरप्यधिकतरा पराभिलाषिण्यसौ किमुत ॥३४॥ स्त्री अत्यन्त बुद्धिहीना होती है। वह यदि अपनी ( पतिकी ) आज्ञाका उल्लंघन करके चलने लगे तो शत्रुसे भी बढ़कर है; फिर उसके परपुरुषकी इच्छा करनेवाली होनेपर तो कहना ही क्या है ? लोको नापुत्रस्यास्तीति श्रुत्यास्य कः प्रभाषितो लोकः। मुक्तिः संसरणं वा तदन्यलोकोऽथवा नाद्यः ॥३५॥ सर्वेऽपि पुत्रभाजस्तन्मुक्तौ नैव संसृतिर्भवति । श्रवणादयोऽप्युपाया मृषा भवेयुस्तृतीयेऽपि ॥३६॥ तत्प्राप्त्युपायसत्त्वाद् द्वितीयपक्षेऽप्यपुत्रस्य । पुत्रेष्ट्यादिकयागप्रवृत्तये वेदवादोऽयम् ॥३७॥ 'पुत्रहीनको शुभलोककी प्राप्ति नहीं हो सकती' इस श्रुतिमें 'लोक' शब्दसे क्या कहा गया है ? मुक्ति, संसार या इन दोनोंसे भिन्न कोई और लोक ? इनमें पहला पक्ष तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रायः सभी मनुष्य पुत्रवान् हैं; अतः उनकी मुक्ति हो जानेपर संसार ही नहीं रहेगा [-सारा जगत् शून्यप्राय हो जायगा ] । इसके सिवा [ मुक्तिके साधक ] शास्त्रश्रवणादि उपाय भी मिथ्या हो जायँगे । तीसरा पक्ष भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उन ( स्वर्गादि लोकों ) की प्राप्तिके तो अन्य ( यज्ञादि ) उपाय भी १०

विषय-निन्दा हैं। [ अतः इन दो पक्षोंका निराकरण हो जानेसे इस शब्दका तात्पर्य दूसरे पक्ष ( संसार ) में ही है किन्तु इस ] द्वितीय पक्षमें भी यह वेदवाक्य पुत्रहीन पुरुषोंकी पुत्रेष्टि आदि यज्ञोंमें प्रवृत्ति करानेके लिये ही है । नानाशरीरकष्टैर्धनव्ययैः साध्यते पुत्रः । उत्पन्नमात्रपुत्रे जीवितचिन्ता गरीयसी तस्य ॥३८॥ नाना प्रकारके शारीरिक कष्ट और धनादिके व्ययसे तो पुत्र उत्पन्न होता है और उत्पन्न होनेपर भी उसके जीवित रहनेकी बड़ी चिन्ता लगी रहती है । जीवन्नपि किं मूर्खः प्राज्ञः किंवा सुशीलभाग्भविता । जारश्चौरः पिशुनः पतितो द्यूतप्रियः क्रूरः ॥३६॥ जीवित रहनेपर भी न जाने वह मूर्ख, बुद्धिमान्, सुशील, जार, चोर, चुगलखोर, पतित, जुआरी या क्रूर कैसी प्रकृतिका निकले ? पितृमातृबन्धुघाती मनसः खेदाय जायते पुत्रः । चिन्तयति तातनिधनं पुत्रो द्रव्याधधीशताहेतोः॥४०॥ माता, पिता और बन्धुओंका घात करनेवाला पुत्र सदैव उनके चित्तको दुःखित करनेवाला ही होता हैं। वह धन एवं ११

प्रबोधसुधाकर धरतीके आधिपत्यके लिये सदा अपने पिताके मरणका ही चिन्तन करता रहता है । सर्वगुणैरुपपन्नः पुत्रः कस्यापि कुत्रचिद्भवति । सोऽल्पायू रुग्णो वा ह्यनपत्यो वा तथापि खेदाय ॥४१॥ सर्व-गुण-सम्पन्न पुत्र तो कभी कहीं किसीके होता है; वह भी यदि अल्पायु, रोगी अथवा पुत्रहीन हुआ तो दुःखका ही कारण होता है । पुत्रात्सद्गतिरिति चेत्तदपि प्रायोऽस्ति युक्त्यसहम् । इत्थं शरीरकष्टैर्दुःखं सम्प्रार्थ्यते मूढैः ॥४२॥ पुत्रसे सद्गति होती है-यह सर्वथा युक्ति-विरुद्ध है । [ हम तो समझते हैं ] इस प्रकार मूढलोग शारीरिक कष्ट उठाकर दुःखोंको ही मोल लेते हैं । पितृमातृबन्धुभगिनीपितृव्यजामातृमुख्यानाम् । मार्गस्थानामिव युतिरनेकयोनिभ्रमात्क्षणिका ॥४३॥ नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए पिता, माता, भाई, बहिन, पितृव्य और जामाता आदि सम्बन्धियोंका मेल मार्गमें ठहरे हुए पथिकोंके संयोगके समान क्षणभरके लिये ही होता है । दैवं यावद्विपुलं यावत्प्रचुरः परोपकारश्च । तावत्सर्वे सुहृदो व्यत्ययतः शत्रवः सर्वे ॥४४॥ १२

विषय-निन्दा जबतक दैव अनुकूल रहता है और परोपकारकी अधिकता होती है तभीतक सब सगे-सम्बन्धी होते हैं, उनमें अन्तर पड़ा कि वे उलटे अपने शत्रु हो जाते हैं । अश्नन्ति चेदनुदिनं वन्दिन इव वर्णयन्ति सन्तृप्ताः । तच्चेद्द्वित्रदिनान्तरमभिनिन्दन्तः प्रकुप्यन्ति ॥४५॥ यदि वे नित्यप्रति नाना प्रकारके पदार्थ खाते रहते हैं, तो खूब तृप्त होकर बन्दीजनकी भाँति बड़ाई करते हैं, उनमें यदि दो-तीन दिनका भी अन्तर पड़ जाय तो वे ( प्रशंसा करनेवाले ) ही कुवाक्य कहते हुए कोप करने लगते हैं । दुर्भरजठरनिमित्तं समुपार्जयितुं प्रवर्तते चित्तम् । लक्षावधि बहुवित्तं तथाप्यलभ्यं कपर्दिकामात्रम् ॥४६॥ इस दुर्भर ( कठिनतासे भरे जाने योग्य ) पेटके लिये चित्त लाखों रुपयेतक बहुत-सा धन कमानेको प्रवृत्त होता है, तथापि बिना प्रारब्धके एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती । लब्धश्चेदधिकोऽर्थः पत्न्यादीनां भवेत्स्वार्थः । नृपचौरतोऽप्यनर्थस्तस्माद्द्रव्योद्यमो व्यर्थः ॥४७॥ यदि अधिक धन मिल भी जाय तो उससे स्त्री आदिका ही स्वार्थ-साधन होता है, तथा राजा और चोरोंसे भी अनर्थकी आशंका रहती है; इसलिये धनके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ ही है। १३

प्रबोधसुधाकर अन्याय॒मर्थभाजां पश्यति भूपोऽध्वगामितां चौरः । पिशुनो व्यसनप्राप्तिं दायादानां गणः कलहम् ॥४८॥ राजा [ द्रव्यहरणकी इच्छासे ] धनी पुरुषोंके अन्यायकी ताकमें रहता है । चोर उसके मार्गमें जानेकी प्रतीक्षा किया करता है । दुष्ट पुरुष उसे विपत्तिमें पड़ा देखना चाहते हैं और उसके उत्तराधिकारियोंकी दृष्टि सदा कलहपर रहती है । पातकभरैरनेकैर्थं समुपा‌र्जयन्ति राजानः । अश्वमतङ्गजहेतोः प्रतिक्षणं नाश्यते सोऽर्थः ॥४९॥ राजालोग नाना प्रकारके पाप-कर्मोंसे धनको इकट्ठा करते हैं और फिर वह धन हाथी-घोड़ोंके लिये क्षण-क्षणमें नष्ट किया जाता है । राजान्तराभिगमनाद्रणभङ्गान्मन्त्रिभृत्यदोषाद्वा । विषशस्त्रगुप्तघातान्मग्नाश्चिन्तार्णवे भूपाः ॥५०॥ राजालोग अन्य राजाओंके आक्रमणसे, युद्धमें पराजयसे, मन्त्री और सेवकादिके षड्यन्त्रोंसे तथा विष अथवा शस्त्रोंके द्वारा गुप्त- घात आदिसे [ शङ्कितचित्त रहकर ] सदा ही चिन्तासागरमें डूबे रहते हैं । १४