प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंविषय-निन्दा जबतक दैव अनुकूल रहता है और परोपकारकी अधिकता होती है तभीतक सब सगे-सम्बन्धी होते हैं, उनमें अन्तर पड़ा कि वे उलटे अपने शत्रु हो जाते हैं । अश्नन्ति चेदनुदिनं वन्दिन इव वर्णयन्ति सन्तृप्ताः । तच्चेद्द्वित्रदिनान्तरमभिनिन्दन्तः प्रकुप्यन्ति ॥४५॥ यदि वे नित्यप्रति नाना प्रकारके पदार्थ खाते रहते हैं, तो खूब तृप्त होकर बन्दीजनकी भाँति बड़ाई करते हैं, उनमें यदि दो-तीन दिनका भी अन्तर पड़ जाय तो वे ( प्रशंसा करनेवाले ) ही कुवाक्य कहते हुए कोप करने लगते हैं । दुर्भरजठरनिमित्तं समुपार्जयितुं प्रवर्तते चित्तम् । लक्षावधि बहुवित्तं तथाप्यलभ्यं कपर्दिकामात्रम् ॥४६॥ इस दुर्भर ( कठिनतासे भरे जाने योग्य ) पेटके लिये चित्त लाखों रुपयेतक बहुत-सा धन कमानेको प्रवृत्त होता है, तथापि बिना प्रारब्धके एक कानी कौड़ी भी नहीं मिलती । लब्धश्चेदधिकोऽर्थः पत्न्यादीनां भवेत्स्वार्थः । नृपचौरतोऽप्यनर्थस्तस्माद्द्रव्योद्यमो व्यर्थः ॥४७॥ यदि अधिक धन मिल भी जाय तो उससे स्त्री आदिका ही स्वार्थ-साधन होता है, तथा राजा और चोरोंसे भी अनर्थकी आशंका रहती है; इसलिये धनके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ ही है। १३