भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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प्रबोधसुधाकर अन्याय॒मर्थभाजां पश्यति भूपोऽध्वगामितां चौरः । पिशुनो व्यसनप्राप्तिं दायादानां गणः कलहम् ॥४८॥ राजा [ द्रव्यहरणकी इच्छासे ] धनी पुरुषोंके अन्यायकी ताकमें रहता है । चोर उसके मार्गमें जानेकी प्रतीक्षा किया करता है । दुष्ट पुरुष उसे विपत्तिमें पड़ा देखना चाहते हैं और उसके उत्तराधिकारियोंकी दृष्टि सदा कलहपर रहती है । पातकभरैरनेकैर्थं समुपा‌र्जयन्ति राजानः । अश्वमतङ्गजहेतोः प्रतिक्षणं नाश्यते सोऽर्थः ॥४९॥ राजालोग नाना प्रकारके पाप-कर्मोंसे धनको इकट्ठा करते हैं और फिर वह धन हाथी-घोड़ोंके लिये क्षण-क्षणमें नष्ट किया जाता है । राजान्तराभिगमनाद्रणभङ्गान्मन्त्रिभृत्यदोषाद्वा । विषशस्त्रगुप्तघातान्मग्नाश्चिन्तार्णवे भूपाः ॥५०॥ राजालोग अन्य राजाओंके आक्रमणसे, युद्धमें पराजयसे, मन्त्री और सेवकादिके षड्यन्त्रोंसे तथा विष अथवा शस्त्रोंके द्वारा गुप्त- घात आदिसे [ शङ्कितचित्त रहकर ] सदा ही चिन्तासागरमें डूबे रहते हैं । १४