भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 86 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

मनोनिन्दा मनोनिन्दा हसति कदाचिद्रौति भ्रान्तं सदशदिशो भ्रमति । हृष्टं कदापि रुष्टं शिष्टं दुष्टं च निन्दति स्तौति ॥५१॥ कमपि द्वेष्टि सरोषं ह्यात्मानं श्लाघते कदाचिदपि । चित्तं पिशाचमभवद्राक्षस्या तृष्णया व्याप्तम् ॥५२॥ इस तृष्णा-राक्षसीके अधीन होकर यह चित्त पिशाचरूप हो गया है । कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी भ्रान्त-सा होकर दशों दिशाओंमें घूमने लगता है । [ इसी प्रकार ] कभी हर्षित होता है और कभी रुष्ट हो जाता है । [ विवेकहीन हो जानेके कारण ] यह भद्र पुरुषोंकी निन्दा करता है और दुष्टोंकी स्तुति तथा कभी तो किसीसे रोषपूर्वक द्वेष करने लगता है और कभी अपनी प्रशंसा करने लगता है । दम्भाभिमानलोभैः कामक्रोधोरुमत्सरैश्चेतः । आकृष्यते समन्ताच्छ्वभिरिव पतितास्थिकं मार्गे ॥५३॥ मार्गमें पड़ी हुई हड्डीको जिस प्रकार कुत्ते अपनी-अपनी ओर खींचते हैं उसी प्रकार यह चित्त दम्भ, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध और मत्सरादिसे चारों ओरसे खींचा जा रहा है । तस्माच्छुद्धविरागो मनोऽभिलषितं त्यजेदर्थम् । तदनभिलषितं कुर्यान्निर्व्यापारं ततो भवति ॥५४॥ १५

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 23, कुल 86 में से · BharatKosha