प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर अतः शुद्ध वैराग्यका आश्रय लेकर जो पदार्थ मनको रुचिकर हों उन्हें त्याग दे और जो बात उसे रुचिकर न हो वही करे, इससे चित्त निष्क्रिय हो जाता है। विषयनिग्रह संसृतिपारावारे ह्यगाधविषयोदकेन सम्पूर्णे । नृशरीरमम्बुतरणं कर्मसमीरैरितस्ततश्चलति ॥५५॥ अगाध विषय-जलसे भरे हुए इस संसार-समुद्रमें नर-देहरूप एक नौका है, जो कर्म-वायुसे प्रेरित होकर इधर-उधर डगमगाती फिरती है। छिद्रैर्नवभिरुपेतं जीवो नौकापतिर्महानलसः । छिद्राणामनिरोधाज्जलपरिपूर्णं पतत्यधः सततम्॥५६॥ यह नौका [ इन्द्रिय-गोलकरूप ] नौ छिद्रोंसे युक्त है, इसका स्वामी जीव अत्यन्त आलसी है। छिद्रोंके न रोकनेसे उसमें [ विषय- रूप ] जल भर जाता है और वह निरन्तर डूबती रहती है। छिद्राणां तु निरोधात्सुखेन पारं परं याति । तस्मादिन्द्रियनिग्रहमृते न कश्चित्तरत्यनृतम् ॥५७॥ इन छिद्रोंके रोक देनेसे यह सुखपूर्वक संसार-सागरके उस पार पहुँच सकती है, इसलिये इन्द्रिय-निग्रहके बिना इस मिथ्या प्रपञ्चको कोई पार नहीं कर सकता। १६