प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंविषयनिग्रह पश्यति परस्य युवतिं सकाममपि तन्मनोरथं कुरुते । ज्ञात्वैव तदप्राप्तिं व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ॥५८॥ पुरुष परस्त्रीको कामवश देखता है और उसकी प्राप्तिकी कामना भी करता है । यद्यपि यह जानता है कि उसका मिलना सर्वथा असम्भव है तथापि [ उसकी कामना करके ] वह व्यर्थ घोर पापका भागी बन जाता हैं । पिशुनैः प्रकाममुदितां परस्य निन्दां शृणोति कर्णाभ्याम् तेन परः किं म्रियते व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ५६ मनुष्य अपने कानोंसे चुगलखोरोंद्वारा मनमानी कही हुई परायी निन्दा सुनता रहता हैं; इससे क्या वह पुरुष [ जिसकी निन्दा की जाती है ] मर जाता है ? [ उसका तो कुछ भी नहीं बिगड़ता ] उलटे निन्दा सुननेवाला ही, घोर पापका भागी बन जाता है । अनृतं परापवादं रसना वदति प्रतिक्षणं तेन । परहानिर्लब्धिः का व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ६० जिह्वा क्षण-क्षणमें दूसरे पुरुषोंकी निन्दा और मिथ्याभाषण किया करती है, इससे दूसरोंकी क्या हानि अथवा [ अपना क्या ] लाभ हो सकता है ? वह निन्दक पुरुष व्यर्थ ही महापापका भागी हो जाता है । १७ २