प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर अब उस कलशके छिद्रोंसे बाहर निकलनेवाले तेजके अंशोंसे जो उन विविध पदार्थोंका पृथक्-पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है ? छिद्रोंसे, कलशसे, मृत्तिकासे, पात्रसे, तैलसे या बत्तीसे ? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होनेके कारण इनमेंसे किसीसे भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थोंके ज्ञानमें तो एकमात्र दीपकका प्रकाश ही शरण ( कारण ) है, इसी प्रकार शरीरमें भी प्रत्येक ज्ञानका आधार आत्मा ही है ।
मायासिद्धि
चिन्मात्रः परमात्मा ह्यपश्यदात्मानमात्मतया । अभवत्सोऽहंनामा तस्मादासीद्भिदो मूलम् ॥६५॥ चिन्मात्र परमात्माने ही प्रथम अपने आपको आपरूपसे देखा । तब उसका नाम 'अहंकार' हुआ । उसीसे भेदकी नींव पड़ी । द्वैधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै । तस्मादयमाकाशः स्त्रियैव परिपूर्यते सततम् ॥६६॥ सेयमपीक्षाञ्चक्रे ततो मनुष्या अजायन्त । इत्युपनिषदः प्राहुर्बृहदारण्यके याज्ञवल्क्योक्त्या ॥६७॥ बृहदारण्यक शाखामें याज्ञवल्क्यकी उक्तिद्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नीका आविर्भाव हो जाता है । तब यह २८