प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मसिद्धि मनसो यदि वा विषयस्तद्युगपत्किं न जानाति । तस्य पराधीनत्वाद्यतः प्रमादस्य कस्त्राता ॥६३॥ यदि इन्हें मनका विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही अनुभव क्यों नहीं कर लेता ? वास्तवमें वह तो पराधीन है क्योंकि यदि उसे स्वतन्त्र माना जाय तो उसको प्रमादसे कौन बचा सकता था ? गाढध्वान्तगृहान्ततः क्षितितले दीपं निधायोज्ज्वलं पञ्चच्छिद्रमधोमुखं हि कलशं तस्योपरि स्थापयेत् । तद्वाह्ये परितोऽनुरन्ध्रममलां वीणां च कस्तूरिकां सद्रत्नं व्यजनं न्यसेच्च कलशाच्छिद्राध्वनिर्गच्छता ॥ तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा । किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥६४॥ एक गाढ़ अन्धकारमय घरके भीतर पृथ्वीपर एक स्फुट- प्रकाशमय दीपक रक्खे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला घड़ा नीचेको मुख करके स्थापित करे । उसके बाहर प्रत्येक छिद्रके सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तूरी, रत्न और पङ्खा रक्खे । २७