भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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मनोनिग्रह इह वा पूर्वभवे वा स्वकर्मणैवार्जितं फलं यद्यत् । शुभमशुभं वा तत्तद्भोगोऽप्यप्रार्थितो भवति ॥७२॥ इस जन्मके अथवा पूर्वजन्मके कर्मोंसे उपार्जित जैसे-जैसे शुभ अथवा अशुभ फल होने होते हैं, उनके भोग भी बिना माँगे उपस्थित हो जाते हैं । चेतःपशुमशुभपथं प्रधावमानं निराकर्तुम् । वैराग्यमेकमुचितं गलकाष्ठं निर्मितं धात्रा ॥७३॥ कुमार्गकी ओर दौड़ते हुए चित्तरूपी पशुको रोकनेके लिये विधाताने एकमात्र वैराग्यको ही गलेका उचित काष्ठ बनाया । निद्रावसरे यत्सुखमेतत्किं विषयजं यस्मात् । न हि चेन्द्रियप्रदेशावस्थानं चेतसो निद्रा ॥७४॥ निद्राके समय जो सुख होता है क्या वह विषयजन्य होता है ? [ कदापि नहीं ] क्योंकि चित्तका इन्द्रिय-गोलकोंमें न रहना ही तो निद्रा है । अद्वारतुङ्गकुड्ये गृहेऽवरुद्धो यथा व्याघ्रः । बहुनिर्गमप्रयत्नैः श्रान्तस्तिष्ठति पतद्भ्रूसंश्र तथा॥७५॥ सर्वेन्द्रियावरोधाद्योगशतैर्निर्गमं वीक्ष्य । शान्तं तिष्ठति चेतो निरुद्यमत्वं तदा याति ॥७६॥ २१