भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 86 में से

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प्रबोधसुधाकर उसी प्रकार विषय-वासनाओंसे भरा हुआ चित्त तमोगुणी और पापमय होता है, वैराग्यद्वारा उसीके सूख जानेपर उसमें धीरे-धीरे सत्त्वगुणका आविर्भाव हो जाता है । यं विषयमभिलषित्वा धावति बाह्येन्द्रियद्वारा । तस्याप्राप्तौ खिद्यति तथा यथा स्वं गतं किञ्चित्॥६९॥ जिस विषयकी अभिलाषासे यह चित्त किसी बाह्येन्द्रिय- द्वारा दौड़ता है उसके न मिलनेपर ऐसा दुखी होता है मानो इसका कुछ खो गया हो ! नगनगरदुर्गदुर्गमसरितः परितः परिभ्रमच्चेतः । यदि नो लभते विषयं यन्त्रितमिव खिन्नतां याति ॥७०॥ अपने अभीष्ट विषयकी खोजमें पर्वत, नगर, दुर्ग और दुर्गम नदियोंमें सब ओर भटकता हुआ चित्त यदि उस विषयको नहीं पाता तो विवश-सा होकर खिन्न हो जाता है । तुम्बीफलं जलान्तर्बलादधः क्षिप्तमप्युपैत्यूर्ध्वम् । तद्वन्मनः स्वरूपे निहितं यत्नाद्बहिर्याति ॥७१॥ तूँबेको बड़े वेगसे भी जलमें फेंका जाय तो भी वह तुरन्त जलके ऊपर ही आ जाता है, इसी प्रकार अपने स्वरूपमें यत्न- पूर्वक लगानेपर भी चित्त पुनः-पुनः बाहर निकल जाता है । २०