भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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मनोनिग्रह मनोनिग्रह स्वीयोद्गमतोयवहा सागरमुपयाति नीचमार्गेण । सा स्वीयोद्गम एव स्थिरा सती किं न याति वार्धित्त्वम् ६५ अपने उद्गम-स्थान (निकासकी जगह) से निकलकर नीचे मार्गसे बहनेवाली नदी समुद्रमें जा मिलती है, वह यदि उद्गम स्थानपर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती ? एवं मनः स्वहेतुं विचारयत्सुस्थिरं भवेदन्तः । न बहिर्वोदेति तदा किं नात्मत्वं स्वयं याति ॥६६॥ इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारणका विचार करता हुआ अपने आपमें ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयोंमें न जाय तो क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा ? वर्षास्वम्भःप्रचयात्कूपे गुरुनिर्झरे पयः क्षारम् । ग्रीष्मेणैव तु शुष्के माधुर्यं भजति तत्राम्भः ॥६७॥ कुओं और बड़े-बड़े झरनोंमें वर्षाऋतुमें अधिक जल इकट्ठा हो जानेसे वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतुमें सूखकर अल्प परिमाणमें रह जानेपर उनका जल मीठा हो जाता है ! तद्वद्विषयोद्रिक्तं तमःप्रधानं मनः कलुषम् । तस्मिन्विरागशुष्के शनकैराविर्भवेत्सत्त्वम् ॥६८॥ १९