प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर निरन्तर शान्त-चित्त रहना तथा कोई भगवत्सम्बन्धी गीतका गान करे अथवा बाँसुरी बजावे तो एक ही समय आनन्दका आविर्भाव और सात्त्विक भावोंका प्रौढ़ उद्रेक हो जाना । तस्मिन्ननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम्। स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम्॥१८२॥ उस सत्त्वोद्रेकमें रोककर रक्खा हुआ मन परमात्मसुखका अनुभव करता है । फिर उस ( परमात्मसुख ) के स्थिर हो जानेपर चित्तकी अवस्था मतवाले हाथीके समान हो जाती है । जन्तुषु भगवद्भावं भगवति भूतानि पश्यति क्रमशः । एतादृशी दशा चेत्तदैव हरिदासवर्यः स्यात् ॥१८३॥ और वह क्रमशः समस्त प्राणियोंमें भगवान्को और भगवान्में समस्त प्राणियोंको देखने लगता है, यदि ऐसी अवस्था हो जाय तो वह तत्काल भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ हो जाता है । ध्यानविधि यमुनाटटनिकटस्थितवृन्दावनकानने महारम्ये । कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरि स्थाप्य ॥१८४॥ तिष्ठन्तं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम् । पीताम्बरपरिधानं चन्दनकर्पूरलिप्तसर्वाङ्गम् ॥१८५॥ ५२