भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

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प्रबोधसुधाकर है कि 'अन्य ( आत्मा ) तो कर्म-फलको न भोगता हुआ केवल साक्षीभावसे देखा ही करता है ।' निशि वेश्मनि प्रदीपे दीप्यति चौरस्तु वित्तमपहरति । ईरयति वारयति वा तं दीपः किं तथात्मापि ॥१३७॥ रात्रिके समय दीपकके जलते रहनेपर चोर घरमेंसे धन चुराकर ले जाता है; क्या दीपक उसे इसके लिये प्रेरित करता या रोकता है ? [नहीं] । इसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि इन्द्रियों- को उनके व्यापारमें न नियुक्त करता है, न वियुक्त । गेहान्ते दैववशात्कस्मिंश्चित्समुदिते विपन्ने वा। दीपस्तुष्यत्यथवा खिद्यति किं तद्वदात्मापि ॥१३८॥ घरके भीतर दैवयोगसे किसीके जन्मने अथवा मर जानेपर क्या दीपकको किसी प्रकारका हर्ष या खेद होता है ? [ नहीं ] । उसी प्रकार आत्मा भी चित्तादिके हर्ष-शोकमें सर्वथा असंग और उदासीन साक्षीमात्र ही रहता है । स्वप्रकाशता रविचन्द्रवह्निदीपप्रमुखाः स्वपरप्रकाशाः स्युः । यद्यपि तथाप्यमीभिः प्रकाशते क्वापि नैवात्मा॥१३६॥ यद्यपि सूर्य, चन्द्र, अग्नि और दीपक आदि अपने और पराये सबके प्रकाशक हैं, तथापि इनसे आत्मा कभी प्रकाशित नहीं होता । ४०