प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर ननु सगुणो दृश्यतनुस्तथैकदेशाधिवासश्च । स कथं भवेत्परात्मा प्राकृतवद्रागरोषयुतः ॥१६६॥ [ यदि कहो कि ] यह श्रीकृष्ण तो सगुण है, दृश्य शरीरधारी है, एकदेशी है तथा साधारण पुरुषोंके समान रागद्वेषयुक्त है; यह परमात्मा कैसे हो सकता है ? इतरे दृश्यपदार्था लक्ष्यन्तेऽनेन चक्षुषा सर्वे । भगवाननया दृष्ट्या न लक्ष्यते ज्ञानदृग्गम्यः ॥१६७॥ [ तो इस विषयमें यह विचारना चाहिये कि ] इन चर्म- चक्षुओंसे तो अन्य सब दृश्य-पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, इनसे भगवान् दिखायी नहीं दे सकते; वे तो ज्ञान-दृष्टिके ही विषय हैं । यद्विश्वरूपदर्शनसमये पार्थाय दत्तवान्भगवान् । दिव्यं चक्षुस्तस्माददृश्यता युज्यते नृहरौ ॥१६८॥ भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुनको दिव्य- दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरिकी अदृश्यता सिद्ध ही है; [ क्योंकि चर्म-चक्षुओंसे न देख सकनेके कारण ही तो उन्होंने अर्जुनको दिव्य-दृष्टि दी थी ] । साक्षाद्यथैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते रवेर्बिम्बम् । विश्वं प्रकाशयति तत्सर्वैः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥ ५६