भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 86 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

प्रबोधसुधाकर वक्षसि यदा जघान श्रीवत्सः श्रीपतेः स किं द्वेष्यः । भक्तानामसुराणामन्येषां वा फलं सदृशम् ॥२०३॥ जब भृगुजीने भगवान्‌के वक्षःस्थलमें पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपतिके द्वेष्य हो गये थे ? [ नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं ] भक्त, असुर और अन्य पुरुषोंको भी वे एक-सा ही फल देते हैं । तस्मान्न कोऽपि शत्रुनों मित्रं नाप्युदासीनः । नृहरिः सन्मार्गस्थः सफलः शाखीव यदुनाथः॥२०४॥ इसलिये भगवान्‌का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है । श्रीनृहरि तो सुन्दर मार्गपर लगे हुए एक फलयुक्त वृक्षके समान हैं । लोहशलाकानिवहैः स्पर्शाश्मनि भिद्यमानेऽपि । स्वर्णत्वमेति लौहं द्वेषादपि विद्विषां तथा प्राप्तिः॥२०५॥ पारसको यदि लोहेकी शलाकाओंसे भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा सुवर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओंको द्वेषसे भी भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है । नन्वात्मनः सकाशादुत्पन्ना जीवसन्ततिश्रेयम् । जगतः प्रियतर आत्मा तत्प्रकृते नैव सम्भवति॥२०६॥ ५८