प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंसगुण-निर्गुणकी एकता दुःसहविरहभ्रान्त्या स्वपतीन्ददृशुस्तरून्नरांश्च पशून् । हरिरयमिति सुप्रीताः सरभसमालिङ्गयाञ्चक्रुः॥२२१॥ दुःसह विरह-व्यथाके कारण उत्पन्न हुए भ्रमसे अपने पति, वृक्ष, मनुष्य और पशु आदिको भी 'ये हरि ही हैं' ऐसा जानकर वे प्रेमविभोर होकर अति वेगसे आलिङ्गन कर लेती थीं । कापि च कृष्णायन्ती कस्याश्चित्पूतनायन्त्याः । अपिबत्स्तनमिति साक्षाद्व्यासो नारायणः प्राह॥२२२॥ साक्षात् नारायण भगवान् व्यासने भी कहा है कि कोई गोपी कृष्ण बनकर पूतना बनी हुई दूसरी गोपीका स्तन-पान करती थी । तस्मान्निजनिजदयितान्कृष्णाकारान्व्रजस्त्रियो वीक्ष्य । स्वपरनृपतिपत्नीनामन्तर्यामी हरिः साक्षात् ॥२२३॥ अतः यह सिद्ध होता है कि व्रजबालाएँ अपने-अपने पतियोंको कृष्णरूप देखकर उन्हींको आलिङ्गन करती थीं और यह समझती थीं कि यह श्रीकृष्ण ही अपने-पराये समस्त मानव पति-पत्नियोंके साक्षात् अन्तर्यामी हैं । परमार्थतो विचारे गुडतन्मधुरत्वदृष्टान्तात् । नश्वरमपि नरदेहं परमात्माकारतां याति ॥२२४॥ ६३