भारतकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 86 में से

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अनुग्रह श्रीशङ्कर अपने शिरपर धारण करते हैं वे श्रीकृष्ण त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से भिन्न कोई अविकारिणी सच्चिदानन्द- मयी नीलिमा हैं। कृपापात्रं यस्य त्रिपुररिपुरम्भोजवसतिः सुता जह्नोः पूता चरणनखनिर्णेजनजलम् । प्रदानं वा यस्य त्रिभुवनपतित्वं विभुरपि निदानं सोऽस्माकं जयति कुलदेवो यदुपतिः ॥२४३॥ त्रिपुरारि शिव और कमलासन ब्रह्मा जिनकी कृपाके पात्र हैं, परमपावन श्रीगंगाजी जिनके चरण-नखका धोवन हैं तथा त्रिलोकीका राज्य जिनका दान है वे सर्वव्यापक और हम सबके आदि- कारण तथा कुलदेव श्रीयदुनाथ सदा विजयी हो रहे हैं। मायाहस्तेऽर्पयित्वा भरणकृतिकृते मोहमूलोद्भवं मां मातः कृष्णाभिधाने चिरसमयमुदासीनभावं गतासि । कारुण्यैकाधिवासे सकृदपि वदनं नेक्षसे त्वं मदीयं तत्सर्वज्ञे न कर्तुं प्रभवति भवती किं नु मूलस्य शान्तिम् हे कृष्णनाम्नी मातेश्वरि ! मोहरूपी मूलनक्षत्रमें उत्पन्न हुए मुझ पुत्रको भरण-पोषणके लिये मायाके हाथोंमें सौंपकर तू बहुत दिनोंसे मेरी ओरसे उदासीन हो गयी है । अरी एकमात्र करुणा- मयी माँ ! तू एक बार भी मेरा मुख नहीं देखती ? हे सर्वज्ञे ! क्या तू उस मोहरूपी मूलकी शान्ति करनेमें समर्थ नहीं है ? ६९