प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ६५ एकशाखं भवेद् द्वारं शूद्रे वैश्ये द्विजे सदा । समशाखं च धूमाये श्वाने रासभवायसे' ॥५५॥ महादेव के प्रासाद का द्वार नवशाखा वाला, दूसरे देवों के प्रासाद का द्वार सात शाखा वाला, चक्रवर्ती राजाओं के प्रासाद का द्वार पांच शाखावाला, सामान्य राजाओं के प्रासाद का द्वार तीन शाखावाला, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जाति के गृहों के द्वार एक शाखावाला बनावे । दो, चार, छह और आठ, ये सम शाखावाले द्वार धूम, श्वान, खर और ध्वांक्ष आय वाले घरों मे बनाने चाहिये ॥५४-५५॥ शाखा के आय— “नवशाखे ध्वजश्चैको वृषभः पञ्चशाखिके । त्रिशाखे च तथा सिंहः सप्तशाखे गजः स्मृतः ॥” अप० सू० १३१ नवशाख मे ध्वज आय, पंचशाख मे वृषभाय, त्रिशाख में सिंह आय और सप्तशाख में गज आय देनी चाहिये । प्रासाद के अंग तुल्य शाखा— त्रिपञ्चसप्तनन्दाङ्गे शाखाः स्युरङ्गतुल्यकाः । हीनशाखं न कर्त्तव्य-मधिकालय' सुखावहम् ॥५६॥ प्रासाद के भद्र आदि तीन, पांच, सात अथवा नव अंग है। उनमे से जितने अंग का प्रासाद हो, उतनी शाखाये बनानी चाहिये । अंग से कम शाखा नहीं बनाना चाहिये, लेकिन यदि अधिक बनावे तो वह सुखदायक है । शाखा से द्वारका नाम और परिचय— “पद्मिनी नवशाखं च सप्तशाखं तु हस्तिनी । नन्दिनी पञ्चशाखं च त्रिविधं चोत्तमं भवेत् ॥ मुकुली मालिनी ज्येष्ठा गान्धारी सुभगा तथा । मध्यमेति द्विधा प्रोक्ता कनिष्ठा सुप्रभा स्मृता ॥ मुकुली चाष्टशाखं च षट्शाखं च मालिनी । (१) श्वाने ध्वाङ्क्षे च रासभे । प्रा० ६