प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ प्रसादमण्डने द्राविडप्रासाद का द्वारमान— प्रासादे एकहस्ते तु द्वारं कुर्याद् दशाङ्गुलम् । रसहस्तान्तकं यावत् तावती वृद्धिरिष्यते ॥४९॥ पञ्चाङ्गुला दशान्तं च द्वयङ्गुला च शताद्र्द्धकम् । पृथुत्वं च तदर्धेन शुभं स्यात्तु कलाधिकम् ॥५०॥ इति द्राविडद्वारमानम् । एक हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय दस अंगुल, पीछे छह हाथ तक प्रत्येक हाथ दस २ अंगुल, सात से दस हाथ तक पांच २ अंगुल और ग्यारह से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा करके रक्खे। उदय से आधा विस्तार रक्खें। विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४९-५०॥ अन्य जाति के प्रासादों का द्वारमान— विमाने भूमिजं मानं वैराटेपु तथैव च । मिश्रके लतिने चैव प्रशस्तं नागरोद्भवम् ॥५१॥ विमाननागरच्छन्दे कुर्याद् विमानपुष्पके । सिंहावलोकने द्वारं नागरं शोभनं मतम् ॥५२॥ वलभ्यां भूमिजं मानं फांसाकारेषु द्राविडम् । धातुजे रत्नजे चैव दारुजे च रथारुहे ॥५३॥ इति द्वारमानम् । विमान और वैराट जाति के प्रासाद का द्वार भूमिज जाति के मान का, मिश्र और लतिन जाति के प्रासाद का द्वार नागर जाति के मान का, विमाननागर, विमानपुष्पक और सिंहावलोकन जाति के प्रासाद का द्वारमान नागर जाति के मान का, वलभी प्रासाद का द्वारमान भूमिज जाति के मान का, फांसनाकार, धातु, रत्न, दारुज और रथारुह जाति के प्रासाद का द्वार द्राविड जाति के मान का रखना चाहिये ॥५१-५३॥ द्वारशाखा— नवशाखं महेशस्य देवानां सप्तशाखिकम् । पञ्चशाखं सार्वभौमे त्रिशाखं मण्डलेश्वरे ॥५४॥