प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ६३ शिवे द्वारं भवेज्ज्येष्ठं कनिष्ठं च जनालये । मध्यमं सर्वदेवानां सर्वकल्याणकारकम् ॥ उत्तममुदयार्धेन पादोनं मध्यमानकम् । तस्य हीनं कनिष्ठं च विस्तारे द्वारमेव च ॥ एवं ज्ञानं यदा ज्ञात्वा यदा द्वारं प्रतिष्ठितम् । नागरं सर्वदेवानां सर्वदेवेषु दुर्लभम् ॥” इति विश्वकर्मकृते क्षीरार्णवे नारदपृच्छिते शताग्रे पञ्चमोऽध्यायः । एक से चार हाथ तक प्रत्येक हाथ सोलह २ अंगुल की, पांच से दश हाथ तक चार २ अंगुल की, ग्यारह से बीस हाथ तक तीन २ अगुल की, इक्कीस से तीस हाथ तक दो २ अगुल की और इकतीस से पचास हाथ तक एक अंगुल की वृद्धि करके द्वार बनाना चाहिये । हे मुनि ! यह क्षीरार्णव मे नागर जाति के द्वार का मान कहा। उसमे से दसवां भाग कम करें तो स्वर्ग के और अधिक करे तो पर्वत के आश्रित प्रासाद के द्वारका मान होता है। शिवालय मे ज्येष्ठ द्वार, मनुष्यालय मे कनिष्ठ द्वार और सब देवो के प्रासादो मे मध्यम द्वार बनाना चाहिये । यह सब कल्याण करने वाला है। उदय से आधा विस्तार रक्खे तो यह उत्तम मान का द्वार माना जाता है। इसमे उत्तम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रक्खे तो मध्यम मान का और इसमे भी मध्यम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रखें तो कनिष्ठ मान का द्वार माना जाता है। ऐसा समझ करके ही सब देवों के लिये यह नागर जाति का द्वार बनाना चाहिये । भूमिजादिप्रासादका द्वारमान— एकहस्ते सुरागारे द्वारं सूर्याङ्गुलोदयम् । सूर्याङ्गुला प्रतिकरं वृद्धिः पञ्चकरावधि ॥४७॥ पञ्चाङ्गुला च सप्तान्तं नवान्तं सा युगाङ्गुला । द्व्यङ्गुला तु शतार्द्धान्तं वृद्धिः कार्या करं प्रति ॥४८॥ इति भूमिजप्रासादद्वारमानम् । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय बारह अंगुल, पीछे पांच हाथ तक प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल, छह और सात हाथ तक पाच २ अंगुल, आठ और नव हाथ तक चार २ अंगुल, दस से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय दो २ अंगुल बढ़ा करके रक्खे । (उदय मे आधा विस्तार रखना चाहिये । विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढाने से अधिक शोभायमान होता है) ॥४७-४८॥