भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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६२ प्रासादमण्डने नागरप्रासाद का द्वारमान— एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं स्यात् षोडशाङ्गुलम् । षोडशाङ्गुलिका वृद्धि-र्यावद्धस्तचतुष्टयम् ॥४४॥ अष्टहस्तान्तकं यावद् दीर्घे वृद्धिर्गुणाङ्गुला । द्व्यङ्गुला प्रतिहस्तं च यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥४५॥ यानवाहनपल्यङ्कं द्वारं प्रासादसद्मनाम् । दैर्ध्यार्द्धेन पृथुत्वं स्याच्छोभनं तत्कलाधिकम् ॥४६॥ इति नागरप्रासादद्वारमानम् । नागर जाति के प्रासाद के द्वार का उदय एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय सोलह अंगुल रखना चाहिये । पीछे चार हाथ तक सोलह २ अंगुल, पांच से आठ हाथ तक तीन २ अंगुल और नौ से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल बढ़ा करके द्वार का उदय रखना चाहिये । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय १६० अंगुल¹ होता है । पालखी, वाहन, शय्या और पलंग तथा प्रासाद और घर का द्वार, ये सब विस्तार में लंबाई से आधा रखना चाहिये । उसमे भी लंबाई का सोलहवां भाग विस्तार में बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४४ से ४६॥ क्षीरार्णवमें कहा है कि— “एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं च षोडशाङ्गुलम् । इयं वृद्धि. प्रकर्त्तव्या यावच्च चतुर्हस्तकम् ॥ वेदाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावच्च दशहस्तकम् । हस्तविंशतिमाने च हस्ते हस्ते त्रयाङ्गुला ॥ द्वयाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रासादे त्रिंशद्धस्तके । अङ्गुलेका ततो वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ नागराख्यमिदं द्वार-मुक्तं क्षीरार्णवे मुने ।। दशमाशो यदा हीनं द्वारं स्वर्गे मनोहरम् ॥ अधिकं दशमांशेन प्रासादे पर्वताश्रये । तावत्क्षेत्रान्तरे ज्ञातु-मर्हहेवमुनीश्वर ! ॥ (१) समरांगण सूत्रधार अध्याय ५५ श्लोक १२६ मे चार से अधिक मान के प्रासादो मे तीन तीन अंगुल बढाना लीखा हैं । जिसे पचास हाथ के प्रासाद का द्वारमान २०२ अंगुल का होता है ।