प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ६१ उदुम्बर के आगे जो अर्द्धचन्द्र के जैसी आकृति की जाती है, उसका उदय खुर थर के उदय के बराबर रक्खे। द्वार के विस्तार के बराबर अर्द्धचन्द्र लंबा बनावे और लम्बाई से आधा निर्गम रक्खे। लम्बाई के तीन भाग करके उनमे से दो भाग का अर्द्धचंद्र और इसके दोनो तरफ आधे २ भाग का दो गगारक बनावे। अर्द्धचन्द्र और गगारक के बीच मे पत्तेवाली वेलयुक्त शंख और पद्मपत्र जैसी आकृति से सुशोभित बनावे ॥४२-४३॥ उत्तरंग— "उदुम्बरसपादेन उत्तरङ्गं विनिर्दिशेत् । तदुच्छ्रयं विभजेत भागा अथैकविंशतिः ॥ पत्रशाखा त्रिशाखा च द्विसार्धा तु कारयेत् । मालाधरं च त्रिभागं कर्तव्यं वामदक्षिणे ॥ ऊर्ध्वे छाद्यकः पादोनः पादोना फालना तथा । रथिका सप्तभागाश्च भागैकं कण्ठं भवेत् ॥ षड्भागमुत्सेधं कार्य-मुद्गमं च प्रशस्यते । ईदृशं कारयेत् प्राज्ञः सर्वयज्ञफलं भवेत् ॥" वास्तुविद्या अ० ६ द्वार के उदुम्बर के उदय से उत्तरंग का उदय सवाया रक्खे। जो उदय आवे उसके इक्कीस भाग करे। उनमे से ढाई भाग को पत्रशाखा और त्रिशाखा बनावे । उसके ऊपर तीन भाग का मालाधर, पौन भाग की छज्जी, पौन भाग का फालना, सात भाग की रथिका ( गवाक्ष ), एक भाग का कंठ और छह भाग का उद्गम बनावे । इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष उत्तरंग बनावेगे तो सब यज्ञो के बराबर फलदायक होता है । उत्तरंग उद्गम ६ रथिका ७ कण्ठ १ फालना ३/४ छाद्यक ३/४ मालाधर ३ २।। १/२ —उत्तरंग रेखा २१ भाग—