भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

६० प्रासादमण्डने अब मै उदुम्बर ( देहली ) का स्वरूप कहता हूं। यह स्तंभों की कुम्भियों की ऊंचाई के बराबर ऊंचाई का रक्खे। यदि किसी कारण वश नीचा करने की आवश्यकता हो तो कुम्भी के अर्धभाग, तीसरा भाग अथवा चौथा भाग जितना नीचा कर सकते है। ऐसे चार प्रकार के उदुम्बर का उदय प्रशस्त माना है। इससे हीन अथवा अधिक उदय का बनावें तो दुषित होता है * खुरथर के उदय बराबर अर्द्ध चन्द्रका उदय रक्खे, और इसके ऊपर उदुम्बर रक्खे। गर्भगृह के भूमितलका उदय उदुम्बर के आधे, तीसरे अथवा चौथे भाग मे रक्खें। बाहर के मंडपों का भूमितल पीठ के उदयान्त तक रक्खें और रंगमंडप का भूमितल पीठ के नीचे के अंत्य भाग मे रक्खे। क्षीरार्णव में भी कहा है कि— “उदुम्बरे क्षते¹ कुम्भी स्तम्भकं चावपूर्वकम् । सान्धारे च निरन्धारे कुम्भिकान्तमुदुम्बरम् ॥” अध्याय १०६ यदि किसी कारण वश उदुम्बर का उदय कम किया जाय तो भी कुम्भी और स्तंभ का मान पहले जितना ही रखना चाहिये, अर्थात् स्तम्भकी कुम्भी कम नही करनी चाहिये ऐसा विशेष नियम है। बाकी सांधार और निरंधार प्रसादो मे कुम्भी के उदय बराबर उदुम्बर का उदय रखना चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है। अर्द्धचन्द्र (शंखावर्त्त) -- खुरकेन समं कुर्या-दर्ध चन्द्रस्य चोच्छ्रतिः । द्वाख्याससमं दैर्घ्यं निर्गमं स्यात् तदर्धतः ॥४२॥ द्विभागमर्धचन्द्रं च भागेन द्वौ गगाऽकौ । शङ्खत्रसमायुक्तं पद्माकारैरलङ्कृतम् ॥४३॥ इति अर्द्धचन्द्रः ।

  • कितने ही आधुनिक शिल्पियो की मान्यता है कि—“उदुम्बर (देहलो) कुम्भा से निचा उतारने की आवश्यकता हो तब उसके बराबर स्तंभ की कुम्भिया भी नीची उतारनी चाहिये ।” उनकी यह मान्यता प्रामाणिक मालूम नही होती. क्योकि क्षीराणव अ० १०६ मे स्पष्ट लिखा है कि—'उदुम्बरे क्षते (हते) कुम्भी स्तम्भं तु पूर्ववत् भवेत् ।' कभी उदुम्बर उदय मे कम करने की आवश्यकता हो तब स्तम्भ और उनकी कुम्भिया प्रथम के मान के अनुसार रखनी चाहिये । एवं अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे तो कुम्भियो से ही उदुम्बर नीचा उतारने को कहा है. तो कुम्भिया नीचे कैसे की जाय ? इससे साफ मालूम होता हैं कि जब उदुम्बर नीचा करने की आवश्यकता हो, तब कुम्भियां नीचे नही करनी चाहिये, किन्तु कुम्भा के उदय बराबर ऊंचाई में रखनी चाहिये । (१) 'हृते'