भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

६८ प्रसादमण्डने शाखा के विस्तार का चौथा भाग शाखा का प्रवेश ( निर्गम ) रक्खे । रूपस्तंभ के दोनों तरफ शोभा के लिये एक २ कोणिका बनावें, इसमे चंपा के फूलों की अथवा जलवट की आकृति करें ॥६१॥ सूत्रधार राजसिंह कृत वास्तुराज में कहा है कि— “सर्वेषां पेटके व्यासः प्रवेशस्तु युगांशकः । सार्धवेदांशतो वापि पञ्चांशोऽथवा मतः ॥” अध्याय ६ सब शाखाओं का प्रवेश शाखा के विस्तार के चौथे भाग, साढे चार भाग अथवा पांचवें भाग तक रक्खें । अपराजित पृच्छा सूत्र १३२ श्लो० २४ वें में भी यही लिखा है । शाखा के द्वारपाल का नाम— द्वारदैर्घ्ये चतुर्थांशे द्वारपालो विधीयते । स्तम्भं शाखादिकं शेषं त्रिशाखा च विभाजयेत् ॥६२॥ इति त्रिशाखमानम् । द्वार के उदय का चार भाग करके एक भाग के उदय में द्वारपाल बनावें और बाकी तीन भाग के उदय में स्तंभ और शाखा आदि बनावें ॥६२॥