प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ६६ शाखा के रूप— “कालिन्दी वामशाखाया दक्षिणे चैव जाह्नवी । गङ्गाऽर्कतनयायुग्म-मुभयोर्वामदक्षिणे ॥ गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः । तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ नन्दी च वामशाखायां कालो दक्षलताश्रितः । यक्षाः स्युरन्तशाखाया निधिहस्ताः शुभोदयाः ॥” अप० सू० १३२ बांयी द्वार शाखा के द्वारपाल की बांयी और यमुना और दाहिनी ओर गंगा, तथा दाहिनी द्वार शाखा के द्वारपाल की बायी ओर गंगा और दाहिनी ओर यमुना देवी का रूप बनाना चाहिये । गंधर्व शाखा के समसूत्र मे खल्वशाखा रक्खे, इन दोनों का निर्गम भी एक भाग रक्खें। सिंहशाखा का निर्गम भी एक भाग रक्खें। हाथ में निधि को धारण किये हुए बांयो शाखा मे नंदी और दाहिनी शाखा में काल नाम के यक्षो के रूप बनावे । पञ्चशाखा— पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपस्तम्भस्तृतीयकः । चतुर्थी खल्वशाखा च सिंहशाखा च पञ्चमी ॥६३॥ इति पञ्चशाखाः । पहली पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरा रूपस्तंभ, चौथी खल्वशाखा और पांचवी सिंहशाखा है। पञ्चशाखा का मान— “शाखाविस्तारमानं च षड्भिर्भागैर्विभाजयेत् । एकभागा भवेच्छाखा रूपस्तम्भो द्विभागिकः ॥ निर्गमश्चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते । कोणिका स्तम्भमध्ये च उभयोर्वामदक्षिणे ॥ गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः । तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ सपादः सार्धभागो वा रूपस्तम्भः प्रशस्यते । उत्सेधस्याष्टमांशेन शस्तं शाखोदरं मतम् ॥” अप० सू० १३२ पंचशाखा के विस्तार का छह भाग करें। उनमें से एक २ भाग की चार शाखा और दो भाग का रूपस्तम्भ बनावे । रूपस्तम्भ का निर्गम एक भाग रक्खे, इसके दोनों तरफ एक २