प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ७१ रूपस्तम्भस्तथा षष्ठी रूपशाखा ततः परम् । खल्वशाखा च सिंहाख्या मूलकर्णेन सम्मिता ॥६७॥ इति नवशाखाः । प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गात्रर्वशाखा, तीसरी स्तंभशाखा, चौथी खल्वशाखा, पांचवी गांधर्वशाखा, छठा रूपस्तंभ, सातवी रूपशाखा, आठवीं खल्वशाखा और नवमी सिंहशाखा है । ये नवशाखा का विस्तार प्रासाद के कोने तक किया जाता है ॥६६-६७॥ नवशाखा का मान— “शाखाविस्तारमानं तु रुद्रभागविभाजितम् । द्विभागः स्तम्भ इत्युक्त उभयोः कोणिकाद्वयम् ॥ निर्गमः सार्धभागेन पादोनद्वयमेव च । रूपस्तंभद्वयं कार्यं गन्धर्वाद्द्यमेव च ॥” अप० सूत्र १३२ नवशाखा के विस्तार का ग्यारह भाग करके, उनमे से दोनों स्तंभ दो २ भाग रखना चाहिये । उनके दोनो तरफ पाव २ भाग की कोणिकाये बनावे । स्तंभका निर्गम डेढा अथवा पौने दुगुना रक्खें । इन नवशाखाओं मे दो स्तंभ और दो गांधर्व शाखा है । दोनो स्तंभ का विस्तार दो २ भाग और ऽत्येक शाखा का विस्तार एक २ भाग रखना चाहिये । उत्तरंग के देव— यस्य देवस्य या मूर्त्तिः सैव कार्योत्तरङ्गके । शाखायां च परिवारो गणेशश्चोत्तरङ्गके ॥६८॥ इति श्री सूत्रधारमंडनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने भिट्ट- पीठमण्डोवरगर्भगृहोदुम्बरद्वारप्रमाणनामस्तृतीयोऽध्यायः । प्रासाद के गर्भगृह मे जिस देव की मूर्त्ति प्रतिष्ठित हो, उस देव की मूर्त्ति द्वार के उत्तरंग में रखनी चाहिये । तथा शाखाओं में उस देव के परिवार का रूप बनाना चाहिये । उत्तरंग मे गणेश को भी स्थापित कर सकते है ॥६८॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन का अनुवादित प्रासादमंडन के तीसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥३॥