भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 278 में से

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अथ प्रासादमण्डने चतुर्थोऽध्यायः द्वारमान से मूर्त्ति और पद्वासन का मान-- द्वारोच्छ्रायोऽष्टनवधा भागमेकं परित्यजेत् । शेषे त्र्यंशे द्विभागार्चा त्र्यंशोना द्वारतोऽथवा ॥१॥ द्वार के उदय का आठ अथवा नव भाग करे । उनमें से ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी जो सात अथवा आठ भाग रहे, उनके तीन भाग करें। उनमें से दो भाग की मूर्त्ति और एक भाग ऊंचाई में पद्वासन ( पीठिका ) बनावें अथवा दरवाजे का तीन भाग करके उसमें से दो भाग की मूर्त्ति बनावें ॥१॥ द्वारदैर्घ्ये तु द्वात्रिंशे तिथिशक्रकलांशकैः । ऊर्ध्वार्चा आसनस्था तु मनुविश्वार्कभागतः ॥२॥ द्वार के उदय का बत्तीस भाग करे । उनमें से पंद्रह, चौदह अथवा सोलह भाग के मान की खड़ी मूर्ति बनावें । बैठी मूर्ति चौदह, तेरह अथवा बारह भाग की बनावें ॥२॥ क्षीरार्णव अ० ११० में लीखा है कि- “द्वारं चाष्टविभक्तं च त्रिधा भक्तं च सप्तभिः । पीठमानं भागमेकं शेषं च प्रतिमा मुने ! ॥ सप्तभागं भवेद् द्वारं षड्भागं च त्रिधाकृतम् । द्विभागं प्रतिमामानं शेषं पीठं हि चोच्यते ॥ द्वारं षड्भागिकं कुर्यात् त्रिधा पञ्च प्रकल्पयेत् । पीठञ्चैकेन भागेन द्विभागं प्रतिमा भवेत् ॥ एवमूर्ध्वप्रतिमा च अर्द्धं शयनासनं भवेत् । पीठमानं च नान्यत्र शेषस्थाने च निष्कलम् ॥ जलशय्याप्रमाणेन द्वारविस्तारसाधितम् । अन्यथा च यदा अर्चा विस्तरं नैव लङ्घयेत् ॥” द्वार की ऊंचाई का आठ भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के सात भाग का तीन भाग करें, उनमें से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग की पीठ ( पद्वासन ) बनावें ।

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