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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

अथ प्रासादमण्डने चतुर्थोऽध्यायः द्वारमान से मूर्त्ति और पद्वासन का मान-- द्वारोच्छ्रायोऽष्टनवधा भागमेकं परित्यजेत् । शेषे त्र्यंशे द्विभागार्चा त्र्यंशोना द्वारतोऽथवा ॥१॥ द्वार के उदय का आठ अथवा नव भाग करे । उनमें से ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी जो सात अथवा आठ भाग रहे, उनके तीन भाग करें। उनमें से दो भाग की मूर्त्ति और एक भाग ऊंचाई में पद्वासन ( पीठिका ) बनावें अथवा दरवाजे का तीन भाग करके उसमें से दो भाग की मूर्त्ति बनावें ॥१॥ द्वारदैर्घ्ये तु द्वात्रिंशे तिथिशक्रकलांशकैः । ऊर्ध्वार्चा आसनस्था तु मनुविश्वार्कभागतः ॥२॥ द्वार के उदय का बत्तीस भाग करे । उनमें से पंद्रह, चौदह अथवा सोलह भाग के मान की खड़ी मूर्ति बनावें । बैठी मूर्ति चौदह, तेरह अथवा बारह भाग की बनावें ॥२॥ क्षीरार्णव अ० ११० में लीखा है कि- “द्वारं चाष्टविभक्तं च त्रिधा भक्तं च सप्तभिः । पीठमानं भागमेकं शेषं च प्रतिमा मुने ! ॥ सप्तभागं भवेद् द्वारं षड्भागं च त्रिधाकृतम् । द्विभागं प्रतिमामानं शेषं पीठं हि चोच्यते ॥ द्वारं षड्भागिकं कुर्यात् त्रिधा पञ्च प्रकल्पयेत् । पीठञ्चैकेन भागेन द्विभागं प्रतिमा भवेत् ॥ एवमूर्ध्वप्रतिमा च अर्द्धं शयनासनं भवेत् । पीठमानं च नान्यत्र शेषस्थाने च निष्कलम् ॥ जलशय्याप्रमाणेन द्वारविस्तारसाधितम् । अन्यथा च यदा अर्चा विस्तरं नैव लङ्घयेत् ॥” द्वार की ऊंचाई का आठ भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के सात भाग का तीन भाग करें, उनमें से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग की पीठ ( पद्वासन ) बनावें ।

चतुर्थोऽध्यायः ७३ अथवा द्वार की ऊंचाई का सात भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी छह भाग के तीन भाग करे, उनमे से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनावे । द्वार की ऊंचाई का छह भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के पाच भाग का तीन भाग करें, उनमे से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनावे । यह खड़ी प्रतिमा का मान है । शयनासन प्रतिमा के पीठ का मान द्वारोदय के अर्द्धमान का बनावे और बाकी प्रतिमा का मान जानें । जलशय्या वाली प्रतिमा के मानानुसार द्वार का विस्तार रक्खे । अर्थात् जलशय्या- वाली प्रतिमा द्वार के विस्तार से अधिक मान की नही बनानी चाहिये । गर्भगृह का मान-- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशभागविभाजिते । *द्विद्विभागेन द्वौ भित्ती षड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३॥ प्रासाद की समचोरस भूमि के दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग की दोनो तरफ की दीवार और बाकी छह भाग का गर्भगृह बनावें ॥३॥ गर्भगृह के मान से मूत्तिका मान-- तृतीयांशेन गर्भस्य प्रासादे प्रतिमोत्तमा । मध्यमा स्वदशांशोना पञ्चांशोना कनीयसी ॥४॥ गर्भगृह के विस्तार के तीसरे भाग की प्रतिमा बनाना उत्तम है । प्रतिमा का दसवां भाग प्रतिमा के मान मे से घटादें तो मध्यम मान की और पांचवां भाग घटावे तो कनिष्ठ मान की प्रतिमा माना जाता है ॥४॥ देवों का दृष्टिस्थान-- आयभागैर्भजेद् द्वार-मष्टममूर्ध्वतस्त्यजेत् । सप्तमसप्तमे दृष्टि-नृपे सिंहे ध्वजे शुभा ॥५॥ देहली के ऊपर से लेकर उत्तरंग के नीचे भाग तक के द्वार के बीच मे आठ भाग करें । उनमें से ऊपर का आठवां भाग छोड़कर उसके नीचे का सातवां भाग का आठ भाग करें । (२) 'भित्तिद्विभागा कर्त्तव्या ।'

  • कितने ही शिल्पी सातवां और आठवां भाग के मध्य मे आख की कीकी रहे, इस प्रकार प्रतिमा की दृष्टि रखते हैं, इससे आय का मेल नही मिलता, जिसे उनकी मान्यता प्रमाणिक मालूम नही होती । प्रा० १०

७४ प्रसादमण्डने उनमें से भी ऊपर का एक भाग छोड़कर के उसके नीचे का सातवां भाग गज आय है, उसमें सब देवों की दृष्टि रखनी चाहिये । अर्थात् द्वार के मध्य उदय का चौंसठ भाग करके उनमें से पचपनवें भाग में दृष्टि रखें । अथवा आठ भाग वाले सातवें भाग के वृष, सिंह और ध्वज आय मे भी दृष्टि रखना शुभ माना है ॥५॥ विशेष देवों का दृष्टिस्थान-- षष्ठभागस्य पञ्चांशे लक्ष्मीनारायणादिदृक् । शयनाचैंशलिङ्गानि द्वारार्द्धं न व्यतिक्रमेत् ॥६॥ द्वार के आठ भागों में जो छठा भाग है, उसके आठ भाग करके पांचवें भाग में लक्ष्मीनारायण की दृष्टि रखें । शयनासन वाले देव और शिवलिङ्ग की दृष्टि द्वार के अर्धभाग में रखें, किन्तु द्वारार्थ का उल्लंघन करके दृष्टि नहीं रखें ॥६॥ देवों का पदस्थान-- पट्टाधो यक्षभूताद्याः पट्टाग्रे सर्वदेवताः । तदग्रे वैष्णवं ब्रह्मा मध्ये लिङ्गं शिवस्य च ॥७॥ इति प्रतिमाप्रमाणदृष्टिपदस्थानम् । गर्भगृह के स्तंभ के ऊपर जो पाट रखा जाता है, उसके नीचे यक्ष, भूत और नाग आदि को स्थापित करे । तथा दूसरे सब देव पाट के आगे स्थापित करे । उसके आगे वैष्णव और ब्रह्मा को और गर्भगृह के मध्य (ब्रह्मभाग) में शिवलिग को स्थापित करें ॥७॥ वत्थुसार पयरण ३ के मत से पदस्थान-- “गब्भगिहइड्ढपयंसा जक्खा पढमंसि देवया बीए । जिणकिणहरवी तहए बंभु चउत्थे शिवं पणगे ॥" गर्भगृह के बराबर दो भाग करें, उनमे से दीवार के तरफ के भाग के पांच भाग करे, इनमे दीवार वाले प्रथम भाग में यक्षको, दूसरे भाग मे देवियो को, तीसरे भाग में जिनदेव, कृष्ण (विष्णु) और सूर्य को, चौथे भाग मे ब्रह्मा को और पांचवें भाग मे (गर्भगृह के मध्य भाग में) शिवलिङ्ग को स्थापित करें । समरांगण सूत्रधार अ० ७० के मत से पदस्थान-- “भक्ते प्रासादगर्भार्द्धे दशधा पृष्ठभागतः । पिशाचरक्षोदनुजाः स्थाप्या गन्धर्वगुह्यकाः ॥ आदित्यचण्डिकाविष्णु-ब्रह्मेशानाः पद क्रमात् ॥”

चतुर्थोऽध्यायः ७५ गर्भगृह के बराबर दो भाग करके दीवार की तरफ के अर्धभाग के दस भाग करे, उनमे से दीवार से प्रथम भाग मे पिशाच, दूसरे में राक्षस, तीसरे मे दैत्य, चौथे मे गंधर्व, पांचवे मे यक्ष, छठे में सूर्य, सातवें मे चंडिका, आठवे में विष्णु, नवे मे ब्रह्मा और दसवे मे शिव को स्थापित करे। अग्निपुराण अ० ६७ के मत से पदस्थान— “षड्भिर्विभाजिते गर्भे त्यक्त्वा भागं च पृष्ठतः । स्थापनं पञ्चमांशे च यदि वा वसुभाजिते ॥ स्थापनं सप्तमे भागे प्रतिमासु सुखावहम् ॥” गर्भगृह का छह भाग करे, उनमे से दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे के पांचवे भाग मे सब देवो को स्थापित करे। अथवा गर्भगृह के आठ भाग करके दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे सातवें भाग में सब देवो को स्थापित करना सुखकारक है।* प्रहार थर— छाद्यस्योर्ध्वे प्रहारः स्याच्छृङ्गे शृङ्गे तथैव च । प्रासादशृङ्गशृङ्गेषु अधोभागे तु छाद्यकम् ॥८॥ छज्जा के ऊपर प्रहार का थर बनावें। प्रत्येक शृङ्ग के नीचे प्रहार का थर बनाना चाहिये। उसके नीचे छाद्य ( छज्जा ) बनावे ॥८॥ छाद्यके थरमान— छाद्यं भागद्वयं सार्धं सार्धभागं च पालवम् । मण्डलीकं भागमेकं भागेन तिलकस्तथा ॥६॥ △ छज्जा का उदय दो भाग अथवा डेढ़ ( ढाई ? ) भाग, पालव डेढ़ भाग, मुंडलिक एक भाग और तिलक एक भाग रखना चाहिये ॥६॥ शृंगक्रम— मूलकर्णे रथादौ च एक द्वित्रिक्रमान् न्यसेत् । निरन्धारे मूलभित्तौ सान्धारे भ्रमभित्तिषु ॥१०॥ *विशेष माहिती के लिये स्वय द्वारा अनुवादित 'देवतामूर्ति प्रकरण' ओर 'रूपमण्डन' देखना चाहिये। △ यह श्लोक बहुतसी प्रतो मे नही है।

७६ प्रासादमण्डने मूलकर्ण (कोना), रथ, उपरथ आदि प्रासाद के अंग है, उनके ऊपर एक, दो अथवा तीन शृङ्ग अनुक्रम से चढावें। निरंधार (प्रकाश वाला) प्रासाद की मुख्य दीवार पर और सांधार (परिक्रमा वाला) प्रासाद हो तो परिक्रमा की दीवार पर शृङ्गों का क्रम रखें ॥१०॥ उरःशृंग का क्रम- उरुशृङ्गाणि भद्रेस्यु-रेकादिग्रहसंख्यया । त्रयोदशोर्ध्वे सप्ताधो लुप्तानि चोर्ध्वशृङ्गकैः ॥११॥ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक से नव तक उरःशृङ्ग चढ़ाये जाते है। शिखर के उदय का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग के मान का उरःशृङ्ग बनावें। दूसरा उरःशृङ्ग प्रथम के उरःशृङ्ग का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग का बनावें। इस प्रकार ऊपर के उरः शृङ्ग का तेरह भाग करके सात भाग के उदय में नीचे का उरःशृङ्ग रखें ॥११॥ उरुशृंग की रचना शिखर का निर्माण शिखर निर्माण- रेखामूले च दिग्भागं कुर्यादग्रे षडंशकम् । षड्बाह्ये दोषंदं प्रोक्तं पञ्चमध्ये न शोभनम् ॥१२॥ शिखर के नीचे के दोनों कोने के विस्तार का दस भाग करें। उनमें से शिखर के ऊपर के स्कंध का विस्तार छह भाग रखें। इस स्कंध का विस्तार छह भाग से अधिक रखें तो

चतुर्थोऽध्यायः ७७ शिखर दोष कारक होता है और पांच भाग से कम रखे तो शिखर शोभायमान नही होता ॥१२॥ ज्ञानरत्नकोष में लीखा है कि-- "चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशधा प्रतिभाजिते । द्वौ द्वौ भागौ तु कर्त्तव्यौ कोणे कोणे न संशयः ॥ भद्रं भागत्रयं कार्यं सार्धभागं तु चानुगम् । व्यासमानं सपादं च उच्छ्रयेण तु कारयेत् ॥ स्कन्धं षड्भागिकं कार्यं तस्योर्ध्वं नवधा भवेत् । चतुर्भागायतं कोणं त्रिभिर्भागैस्तु चानुगम् ॥ भद्रपूर्णं तु द्विभिर्भागै-स्ततस्तु साधयेत् कलाम् ॥" प्रासाद के समचोरस क्षेत्र का दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग के दो कोण, तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग के दो प्रतिकर्ण बनावे । शिखर विस्तार से ऊंचाई में सवाया रक्खें और उसका स्कंध छह भाग विस्तार में रक्खें । इसका नव भाग करके चार भाग के दोनों कोण, तीन भाग के दोनों प्रतिकर्ण और पूरा भद्र दो भाग का रक्खे । पीछे रेखा बनावें । कलारेखा की साधना-- "आदिकोणं द्विधा कृत्य प्रथमं वेदभाजितम् ॥ द्वितीयं तु त्रिभिर्भागै-रेवं सप्तकला भवेत् । उदयं द्व्यष्टभिर्भागैः कृत्वा रेखां समालिखेत् ॥ ऊर्ध्वतिर्यग् भागानां भागे भागे तु लाञ्छयेत् । एवं तु सिध्यते रेखा भद्रे कोणे तथानुगे ॥" एक तरफ के कोण का दो भाग करें। उनमें से प्रथम भाग का चार और दूसरे भाग का २५६ रेखा का नकशा

७८ प्रासादमण्डने तीन भाग करने से सात कला रेखा होती हैं । इसी तरह दूसरी तरफ के कोण की भी सात कला रेखा होती है। ऐसी कुल चौदह कला रेखाओं में दोनों प्रतिकर्ण की दो कला रेखा मिलाने से सोलह कला रेखा होती है । इनके उदय में सोलह २ भाग करने से दोसौ छप्पन कला रेखायें होती है । उदयभेदोद्भू रेखा— सपादं शिखरं कार्यं सकर्णं शिखरोदयम् । सपादकर्णयोर्मध्ये रेखाः स्युः पञ्चविंशतिः ॥१३॥ मूलरेखा के विस्तार से शिखर का उदय सवाया करें । सवाया शिखर में दोनों कोने के मध्य मे पचीस रेखाये है ॥१३॥ सपादकर्णयोर्मध्ये¹ उदये पञ्चविंशतिः । प्रोक्ता रेखाः कलाभेदै-र्वलणे पञ्चविंशतिः ॥१४॥ सवाया उदय वाले शिखर के दोनों कोने के मध्य में पचीस रेखा उदय में होती हैं । कला के भेद से ये शिखर के नमन में पचीस रेखायें है ॥१४॥ कलाभेदोद्भूव रेखा— पञ्चादिनन्दयुग्मान्तं खण्डानि तेष्वनुक्रमात् । अंशवृद्ध्या कलाः कार्या दैर्घ्ये स्कन्धे च तत्समाः ॥१५॥ शिखर के उदय का पांच से लेकर उनतीस खंड करें । उन खंडों में अनुक्रम से एक २ कला उदय मे बढ़ावें । जैसे-प्रथम पांच खंडों में एक से पांच कला, छठे मे छह और सातवें मे सात, इस प्रकार उनतीसवे खंड में उनतीस कला है । उदय मे जितनी कला होवे, उतनी कला संख्या स्कंध मे भी बनाना चाहिये ॥१५॥ अष्टादावष्टषष्ट्यन्तं चतुर्वृद्ध्या च षोडश । दैर्घ्यतुल्याः कलाः स्कन्धे एकहीनांशोऽशोभनम् ॥१६॥ प्रथम समचार की त्रिकखंडों मे आठ २ कला रेखा है । पीछे आगे के प्रत्येक खंड में चार २ कला बढ़ाने से अठारहवें खंड में अड़सठ कला रेखा होती हैं । उदय मे जितनी कला रेखा हो, उतनी स्कंध मे भी बनावे । एक भी कम रक्खे तो शोभायमान नही लगता ॥१६॥ (१) पुनरुक्त मालूम होता है ।

चतुर्थोऽध्यायः ७६ रेखाचक्र— ऊर्ध्वा अष्टादशांशाः स्यु-स्तिर्यक्पोडश एव च । चक्रेऽस्मिंश्च भवन्त्येव रेखाणां षट्शरद्वयम् ॥१७॥ शिखर के उदय मे अठारह और तिरछी सोलह रेखा होती है, ऐसा चक्र बनाने से दौसो छप्पन रेखायें होती हैं, ऊपर 'कला रेखा की साधना' पढ़ें ॥१७॥ प्रथम समचार की त्रिखंडा कलारेखा— त्रिखण्डात् खण्डवृद्धिस्च यावदष्टादशैव हि । एकैकांशे कलाष्टौ च समचारस्तु पोडश ॥१८॥ त्रिखंड से लेकर एक २ खंड वढाते हुए अठारह खंड तक बढावे । प्रथम प्रत्येक त्रिखंड मे समचार की आठ २ कला रेखाये है । ऐसे सोलह चार है ॥१८॥ दूसरा सपादचार की त्रिखंडा कलारेखा— द्वितीयप्रथमे खण्डे कलाष्टौ द्वितीये नव । तृतीये दशखण्डेषु शेषेषूर्ध्वेष्वयं क्रमः ॥१९॥ दूसरा सपादचार हो तो प्रथम खंड में आठ, दूसरे खंड मे नव और तीसरे खंड मे दस कला रेखा बनावे । इस प्रकार बाकी के चारो मे भी इसी क्रम रेखा बनावे ॥१९॥ तीसरा सार्द्धचार की त्रिखंडा कलारेखा— अष्टदिक्सूर्यभागैश्च त्रिखण्डा तृतीया भवेत् । अनेन क्रमयोगेन कोष्ठानङ्कैः प्रपूरयेत् ॥२०॥ तीसरा सार्धचार हो तो प्रथम खंड मे आठ, दूसरे खंड में दस और तीसरे खंड मे बारह कलारेखा बनावे । इस क्रम से दूसरे चारो के कोठे को अंको से पूर्ण करे ॥२०॥ सोलह प्रकार के चार— 'समः सपादः सार्द्धंश्च पादोनो द्विगुणस्तथा । द्विगुणश्च सपादो द्वौ सार्ध. पादोनकस्त्रयः ॥

  • श्लोक १८ से २० तक का खुलासा वार आशय समझने के लिये देखो चार के भेदो से त्रिखडा की रेखा और कला जानने का यत्र ।

८० प्रासादमण्डने त्रिखंडा की रेखा और कला—

नम्बरचार के नामरेखा का नामप्रथम खंडकी कलाद्वितीय खंडकी कलातृतीय खंडकी कलाकला की कुल संख्या
समचार<br>८×१=८शशिनी२४
सपादचार<br>८×१।=१०शीतला१०२७
सार्धचार<br>८×१॥=१२सौम्या१०१२३०
पादोनद्वयचार<br>८×१।॥=१४शान्ता१११४३३
द्विगुणचार<br>८×२=१६मनोरमा१२१६३६
सपाद द्विगुणचार<br>८×२।=१८शुभा१३१८३९
सार्धद्विगुणचार<br>८×२॥=२०मनोभवा१४२०४२
पादोनत्रयचार<br>८×२।॥=२२वीरा१५२२४५
त्रिगुणचार<br>८×३=२४कुमुदा१६२४४८
१०सपाद त्रिगुणचार<br>८×३।=२६पद्मशेखरा१७२६५१
११सार्द्धं त्रिगुणचार<br>८×३॥=२८ललिता१८२८५४
१२पादोन चतुष्क<br>८×३।॥=३०लीलावती१९३०५७
१३चतुर्गुणचार<br>८×४=३२त्रिदशा२०३२६०
१४सपाद चतुष्कचार<br>८×४।=३४पूर्णमण्डला२१३४६३
१५सार्धचतुष्कचार<br>८×४॥=३६पूर्णभद्रा२२३६६६
१६पादोन पंचकचार<br>८×४।॥=३८भद्राङ्गी२३३८६९
इस प्रकार चतुःखंडादिकी कला रेखाएं चार के भेदों से समझना चाहिये ।

चतुर्थोऽध्यायः ८१ त्रिगुणोऽथ सपादोऽसौ सार्धः पादोनवेदकः । चतुर्गुणः सपादोऽसौ सार्धः पादोनपञ्चकः ॥ इति षोडशधा चारं त्रिखण्डाद्यासु लक्षयेत् ॥" अप० सू० १३६ त्रिखंडादि खंडो मे सोलह कलाचारों के भेदों से सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती हैं। ये सोलह कलाचार इस प्रकार है—प्रथम सम ( बराबर ) चार, दूसरा सपाद ( सवाया ) चार, तीसरा सार्द्ध ( डेढा ) चार, चौथा पौने दो गुणा, पांचवा दो गुणा, छठ्ठा सवा दो गुणा, सातवां ढाईगुणा, आठवा पौने तीनगुणा, नवा तीनगुणा, दसवा सवा तीनगुणा, ग्यारहवा साढे तीनगुणा, बारहवा पौने चार गुणा, तेरहवां चार गुणा, चौदहवां सवा चार गुणा, पंद्रहवा साढे चार गुणा, और सोलहवां पौने पांच गुणा है। रेखासंख्या— रेखाणां जायते संख्या षट्पञ्चाशच्छतद्वयम् । दैन्ये भवन्ति यावन्त्यः कलाः स्कन्धेऽपि तत्समाः ॥२१॥ इति रेखानिर्णयः । सोलह प्रकार के कलाचारो के भेदों से प्रत्येक त्रिखंडादि मे सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती है। इसलिये रेखाग्रो की कुल संख्या दोसौ छप्पन होती हैं। शिखर के उदय मे जितनी कलारेखा उत्पन्न हो, उतनी स्कध मे भी बनानी चाहिये ॥२१॥ मंडोवर और शिखर का उदयमान— विंशद्भिर्विभजेद् भागैः शिलातः कलशान्तकम् । मण्डोवरोऽष्टसार्धाष्ट-नवांशैः शिखरं¹ परम् ॥२२॥ खरशिला से लेकर कलश के अंत भाग तक के उदय के बीस भाग करे। उनमे से आठ, साढे आठ अथवा नव भाग का मंडोवर का उदय रखे, इसी क्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ मान के मंडोवर का उदय होता है। ऐसा अप० सू० १३८ मे भी कहा है। बाकी जो भाग रहे, उतने उदय का शिखर बनावे ॥२२॥ शिखर विधान— रेखामूलस्य विस्तारात्² पद्मकोशं समालिखेत् । चतुर्गुणेन सूत्रेण सपादः शिखरोदयः ॥२३॥ (१) 'शिखरोदयम्' । (२) 'विस्तारे' । प्रा० ११

८२ प्रासादमण्डने मूलरेखा के विस्तार से चार गुणा सूत्र से दोनों कोने के मूल बिंदु से दो गोल बनावे। जिसके दोनों गोल के स्पर्श से कमल की पंखुड़ो जैसी आकृति वाला पद्मकोश बन जाता है। उसमें दोनों कोने के मध्य विस्तार से सवाया शिखर का उदय रक्खे ॥२३॥* ग्रीवा, आमलसार और कलशका मान— स्कन्धकोशान्तरे सप्त-भक्ते ग्रीवा तु भागतः । सार्ध आमलसारश्च पद्मच्छत्रं³ तु सार्धकम् ॥२४॥ त्रिभाग उच्चकलशो द्विभागस्तस्य विस्तरः । प्रासादस्याष्टमांशेन पृथुत्वं कलशाएडकम् ॥२५॥ ऊपर के लिखे अनुसार सवाया शिखर का उदय करने के बाद जो पद्मकोश का उदय बाकी रहता है, उसमे ग्रीवा, आमलसार और कलश बनावे। जैसे—शिखर के स्कध से लेकर पद्मकोश के अन्त्य बिन्दु तक के उदय का सात भाग करें । उनमे से एक भाग की ग्रीवा, डेढ़ भाग का आमलसार, डेढ़ भाग का पद्मच्छत्र ( चंद्रिका ) और तीन भाग का कलश बनावे । द्विभाग के विस्तार वाले कलश का बीजोरा बनावें । कलश के अंडा का विस्तार प्रासाद के आठवे भाग का रक्खें ॥२४-२५॥ शुकनासका उदय— छाद्यतः स्कन्धपर्यन्त-मेकविंशतिभाजिते । अङ्कदिग्रुद्रसूर्यांशै-र्विश्वांशैस्तस्य चोच्छ्रतिः ॥२६॥ छज्जा से लेकर शिखर के स्कंध तक के उदय का इक्कीस भाग करें । इनमे से नव, दस, ग्यारह, बारह अथवा तेरह भाग तक शुकनास का उदय रक्खे ॥२६॥ सिंहस्थान— शुकनासस्य संस्थाने छाद्यो पञ्चधा मतम् । एकत्रिपुञ्चसप्ताङ्क-सिंहस्थानानि कल्पयेत् ॥२७॥ (३) 'पत्र' ।

  • शिल्पियो की मान्यता है कि—मूलकर्ण (पायचा) से शिखर का उदय सवाया करना हो तो पायचे के विस्तार से चार गुना सूत्र से, डेढा करना हो तो पाच गुना सूत्र से, पौने दुगुना करना हो तो पौने सात गुना सूत्र से और १ ३/८ उदय करना हो तो साढे चार गुना सूत्र से मूलकर्ण के दोनो विन्दु से दो गोल बनाने से कमल के पखुडी जैसा आकार बन जाता हैं। इसमे अपने इष्ट मान के उदय में शिखर का स्कंध और बाकी रहे उदय मे आमलसार और कलश आदि बनावें ।

चतुर्थोऽध्यायः ८३ छज्जा के ऊपर शुकनास का उदय पांच प्रकार का माना है। उनमे से शुकनास के उदय का जो मान आया हो उसका नव भाग करे। इनमे से एक, तीन, पाच, सात अथवा नव, इन पाच भागो मे से किसी भी भाग मे सिंह स्थान की कल्पना कर सकते हैं। अर्थात् उस स्थान पर सिंह रखा जाता है ॥२७॥ *कपिली (कोली) का स्थान— द्वारस्य दक्षिणे वामे कपिली षड्विधा मता । तदूर्ध्वे शुकनासा स्यात् सैव प्रासादनासिका ॥२८॥ गर्भगृह के द्वार के आर दाहिनी और बायी ओर छह प्रकार से कोली बनावे। उसकी ऊंचाई मे शुकनास बनावे, यह प्रासाद की नासिका है ॥२८॥ कपिली का मान— प्रासादो दशभागश्च द्वित्रिवेदांशसम्मितः । प्रासादार्धेन पादेन त्रिभागेनाथ निर्मिता ॥२६॥ प्रासाद के विस्तार का दस भाग करे, उनमे से दो, तीन अथवा चार भाग की, तथा प्रासाद के मान से आधे, चौथे अथवा तीसरे भाग के मान की, ऐसे छह प्रकार के मान से कपिली (कोली) बनाने का विधान है ॥२६॥ छह प्रकार की कपिली— ''अञ्चिता कुञ्चिता शस्या त्रिधोदितक्रमांगताः । मध्यस्था भ्रमा सद्भ्रमा षट्कोल्यः परिकीर्त्तिताः ॥ प्रासादे दशधा भक्ते भूमिसौमा विचक्षण ! । अञ्चिता च द्विभागा स्यात् त्रिभागा कुञ्चिता तथा ॥ शस्या चैवं चतुर्भागा त्रिधा चोक्तक्रमांगताः । ... .... ... ... .... ..." ॥ प्रासादपादमध्यस्था भ्रमा सप्तत्रिभागतः । अर्द्ध तु सद्भ्रमा कार्या प्रासादस्य प्रमाणतः ॥" अप० सू० १३८

  • गर्भगृह के द्वार के मडप को कोली मडप कहते हैं। उसके छज्जा के ऊपर शुकनास के दोनो तरफ शिखर के आकार का महप किया जाता है, उसको आधुनिक शिल्पीयो प्रासादपुत्र कहते हैं। उसका नाम कपिली अथवा कोली है ।

८४ प्रासादमण्डने अंचिता, कुञ्चिता, शस्या, मध्यस्था, भ्रमा और सभ्रमा ये छह प्रकार के कोली के नाम है। प्रासाद के विस्तार का दस भाग करके, उनमें से दो भाग की कोली बनावे, उसका नाम अंचिता, तीन भाग वाली कोली का नाम कुञ्चिता और चार भाग वाली कोली का नाम शस्या है। तथा प्रासाद के विस्तार मान के चौथे भाग की कोली बनावें, उसका नाम मध्यस्था, तीसरे भाग वालो कोली का नाम भ्रमा और आधे भाग वाली कोली का नाम सभ्रमा है। प्रासाद के अंडक और आभूषण— शृङ्गोरुशृङ्गं ग्रप्रत्यङ्गं गणयेदण्डकानि¹ च । तवङ्गं तिलकं कर्णं कुर्यात् प्रासादभूषणम् ॥३०॥ शिखर, उरुशृङ्ग, प्रत्यग और शृङ्ग, ये प्रासाद के अंडक माने जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते है। तथा तवग, तिलक और सिंहकर्ण ये प्रासाद के आभूषण माने जाते है ॥३०॥ शिखर के नमन का विभाग-- दशांशे शिखरे मूले अग्रेतननवांशके । सार्द्धांशकौ रथौ कर्णौ द्वौ शेषं भद्रमिष्यते ॥३१॥ शिखर के मूल में दस भाग और ऊपर स्कंध के नव भाग करें, उनमें से डेढ़ २ भाग के दो प्रतिरथ और दो दो भाग के दोनों कोने बनावे। बाकी जो तीन भाग नीचे और दो भाग ऊपर बचे है, उस मानका भद्र बनावे ॥३१॥ आमलसार का मान-- रथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छ्रायो विस्तारार्धेन चतुर्भागैर्विभाजयेत् ॥३२॥ ग्रीवा चामलसारश्च पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥३३॥ दोनो प्रतिरथ के मध्य विस्तार के मान का गोल आमलसार बनाना चाहिये। इसकी ऊंचाई विस्तार से आधी रक्खें। ऊंचाई का चार भाग करें। उनमे से पौने भाग की ग्रीवा ( गला ), सवा भाग का आमलसार, एक भाग की चन्द्रिका और एक भाग की आमलसारिका बनावे ॥३२-३३॥ (१) 'मण्डकान् गणयेत् सुधी:'।

चतुर्थोऽध्यायः ८५ प्रकारान्तर से आमलसार का मान-- "स्कन्धः षड्भागको ज्ञेयः सप्ताशामलसारकः । क्षेत्रमष्टविंशभागे--रुच्छ्रये च तदर्धतः ॥ ग्रीवा भागत्रयं कार्या अण्डक. पञ्चभागकः । त्रिभागा चन्द्रिका चैव तथैवामलसारिका ॥ निर्गमे षट्सार्धभागो भवेदामलसारिका । चन्द्रिका द्विसार्धभागा अण्डकः पञ्च एव च ॥" ज्ञान प्र० दी० श्र० ६ क्षीरार्णवमते आमलकारक मान स्वमते आमलसारका मान स्कंध का विस्तार छह भाग और आमलसार का विस्तार सात भाग रक्खे। आमलसार के विस्तार का अठाईस भाग और ऊंचाई का चौदह भाग करे। उदय मे तीन भाग का गला, पाच भाग का अंडक, तीन भाग की चन्द्रिका और तीन भाग की आमलसारिका रक्खे। आमलसार के मध्य गर्म से विस्तार मे साढे छह भाग निकलती आमलसारिका, इससे ढाई भाग निकलती चंद्रिका और इससे पाच भाग निकलता अंडक (आमलसार) रखना चाहिये। आमलसारकें नीचे शिखरके कोणरूप-- "शिवे तु चैश्वरं रूपं ध्यानमग्नं विचक्षण ! । शिखरकर्णे दातव्यं जिने कुर्याज्जिनेश्वरः ॥” क्षीरार्णवे । शिखर के आमलसार के नीचे और स्कंध के कोने के ऊपर शिवालय हो तो ध्यान मे मग्न ऐसे शिव के रूप तथा जिनालय हो तो जिनदेव के रूप रखे जाते है।

८६ प्रासादमण्डने


सुवर्णपुरुष (प्रासाद पुरुष) का स्थापनक्रम-- घृतपात्रं न्यसेन्मध्ये ताम्रतारं सुवर्णजम् । सौवर्णपुरुषं तत्र तुलीपर्यङ्कशायिनम् ॥३४॥ आमलसार के गर्भ मे घी से भरा हुआ सोना, चांदी अथवा तांबे का कलश सुवर्णपुरुष के पास रखना चाहिये ।* तथा चांदी अथवा चंदन का पलंग रक्खे, उसके ऊपर रेशम की शय्या बिछा करके, उस पर सुवर्णपुरुष को शयन करावें। यह विधि शुभ दिन में वास्तु पूजन करके करनी चाहिये । क्योकि यह प्रासाद का मर्मस्थान ( जीवस्थान ) है ॥३४॥

सुवर्ण पुरुष का मान और उसकी रचना-- प्रमाणं पुरुषस्यार्धा-ऽङ्गुलं कुर्यात् करं प्रति । त्रिपताकं करे वामे हृदिस्थं दक्षिणाम्बुजम्¹ ॥३५॥ प्रासाद पुरुष का प्रमाण प्रासाद के विस्तार के अनुसार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । अर्थात् एक हाथ के प्रासाद मे आधा अंगुल, दो हाथ के प्रासाद मे एक अंगुल, तोन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में दो अंगुल, इस प्रकार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । इस सुवर्णपुरुष के बांये हाथ में ध्वजा रखकर के यह छाती पर और दाहिना हाथ कमलयुक्त रक्खे ॥३५॥ प्रा० कुबेरपुरुष

अपराजितपृच्छासूत्र १५३ में कहा है कि-- “अथातः सम्प्रवक्ष्यामि पुरुषस्य प्रवेशनम् । न्यसेद् देवालयेष्वेवं जीवस्थानफलं भवेत् ॥ छादनोपप्रवेशेषु शृङ्गमध्येऽथवोपरि । शुकनासावसानेषु वेद्यूर्ध्वे भूमिकान्तरे ॥ मध्यगर्भे विधातव्यो हृदयवरणंको विधिः । हंसतुली ततो कुर्यात् ताम्रपर्यङ्कसंस्थिताम् ॥


  • कुछ शिल्पियो का मत है कि-घीसे भरा हुआ सोना, चादी अथवा तांबा के कलश मे सुवर्ण पुरुष को रखकर के, वह कलश पलंग पर रक्खें । (१) 'दक्षिण करम्' ।

चतुर्थोऽध्यायः ८७ शयनं चापि निर्दिष्ट पद्म वै दक्षिणे करे । त्रिताकं करे वामे कारयेद्धृदि सस्थितम् ॥” यह सुवर्णपुरुष देवालय का जीवस्थान है, इसलिये उसको देवालय मे स्थापना करने का स्थान कहता हूँ—यह छज्जा के प्रवेश मे, शिखर के मध्य भाग मे अथवा उसके ऊपर, शुकनास के अन्तिम स्थान मे, वेदी के ऊपर और दो माल के मध्य गर्भ मे स्थापन करना चाहिये । यह हृदयवर्णक (जीव) विधि है । इसको तावे के पलंग के ऊपर रेशम की शय्या बिछा कर, उसके ऊपर शयन कराना चाहिये । उसके दाहिने हाथ मे कमल और बाये हाथ मे ध्वजा रखकर वह हाथ छाती के ऊपर रखना चाहिये । प्रमाणं तस्य वक्ष्यामि प्रासादादौ समस्तके । यावच्छतार्धं हस्तादेः कल्पयेच्च यथाक्रमम् ॥ वृद्धिर्द्धाङ्गुलाद्धस्ते यावन्मेरुं प्रकल्पयेत् । एवविध प्रकर्त्तव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥ हेमजं तारज वापि ताम्रजं वापि भागशः । कलशे चाम्बुपूर्णे तु सौवर्णं पुरुष न्यसेत् ॥ पर्यङ्कस्य चतु र्पत्सु कुम्भाश्चत्वार एव च । हिरण्यनिधिसंयुक्ता आत्ममुद्राभिरङ्किताः ॥ एवमारोपयेद् देवं यथोक्तं वास्तुशासने । तस्य नैव भवेद् दुःखं यावदाभूत सम्प्लवम् ॥” अब सुवर्ण पुरुष का प्रमाण कहता हूँ—एक हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके बनावे । यह सोना, चादी अथवा ताबा का बनाकर जलपूर्ण कलश मे स्थापन करे । पीछे उसको पलंग के ऊपर रक्खे । इसके पश्चात् अपने नाम वाली सुवर्णमुद्रा से भरे हुए चार कलश पलंग के चारो पायो के पास रक्खे । इस प्रकार सुवर्णपुरुष को स्थापित करने से जब तक जगत विद्यमान रहे, तब तक किसी प्रकार का दुःख देवालय बधाने वाले को नही होता है । कलश को उत्पत्ति और स्थापना-- क्षीराब्धौ समुत्पन्नं प्रासादस्याग्रजातकम् । माङ्गल्येषु च सर्वेषु कलशं स्थापयेद् बुधः ॥३६॥ जब देवो ने क्षीरसमुद्र का मंथन किया, तब उसमे से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे । इन चौदह रत्नो मे एक काम कुम्भ नाम का श्रेष्ठ कलश भी प्राप्त हुआ था । यह प्रासाद के अग्र

८८ प्रासादमण्डने भाग (शिखर) पर और सब मांगलिक स्थानों मे विद्वान् लोग स्थापित करते हैं ॥३६॥ कलश का उदयमान— पूर्वोक्तमानतो ज्येष्ठः षोडशांशाधिको भवेत् । द्वात्रिंशदंशतो¹ मध्यो नवांशोऽभ्युदयं भवेत् ॥३७॥ ग्रीवापीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिके भागतुल्ये च त्रिभागं बीजपूरकम् ॥३८॥ पूर्वोक्त श्लोक २५ में कलश का जो मान लिखा है, उसका मान में उसका सोलहवां भाग बढावे तो ज्येष्ठ मान का और बत्तीसवां भाग बढ़ावें तो मध्यम मान के कलश का उदय होता है। जो उदय आवे उसका नव भाग करे, उन मे से एक भाग की ग्रीवा और पीठ, तीन भाग का अंडक (कलश का पेट), दोनों कर्णिका (एक छज्जी और एक कणी) एक २ भाग और तीन भाग का बीजोरा उदय मे रक्खें ॥३७-३८॥ कलश का विस्तार मान— एकांशमग्रे द्वौ मूले वह्निवेदांशकर्णिके । ग्रीवा द्वौ पीठमर्द्ध² द्वौ षड्भागं विस्तराण्डकम् ॥३९॥ इति कलशः । बीजोरा के अग्र भाग का विस्तार एक भाग और मूल भाग का विस्तार दो भाग, ऊपर की कणी का विस्तार तीन भाग, नीचे की कणी (छाजली) का विस्तार चार भाग, गला का विस्तार दो भाग, आधी पीठ का विस्तार दो भाग (पूरी पीठ का विस्तार चार भाग) और कलश के पेटका बिस्तार छह भाग है ॥३९॥ १ 'तावदंशोनः कनीयो'

चतुर्थोऽध्यायः ८६ ध्वजादंड रखने का स्थान— प्रासादपृष्ठदेशे तु दक्षिणे तु प्रतिरथे । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्य ईशाने नैऋतेऽथवा ॥४०॥ इति प्रासादस्योर्ध्वलक्षणम् । प्रासाद के शिखर के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजादंड रखने का छिद्रवाला स्थान ध्वजाधार (कलावा) बनावे । यह पूर्वाभिमुख प्रासाद के ईशान कोने मे और पश्चिमा- भिमुख प्रासाद के नैऋत्य कोने मे बनावे ॥४०॥ ध्वजाधार (स्तंभवेध) का स्थान-- "रेखायाः षष्ठमे भागे तदंशे पादवर्जिते । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्यः प्रतिरथे च दक्षिणे ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ शिखर की रेखा के उदय का छह भाग करे । उनमे ऊपर के छठे भाग का फिर चार भाग करे, इनमे से नीचे का एक भाग छोड कर, इसके ऊपर के भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजाधार बनावे अर्थात् रेखा का चौबीस भाग करके ऊपर के बाईसवे भाग मे ध्वजाधार बनावे । अपराजित के मत से स्तंभवेध का स्थान— "रेखाध' (र्घश्च?) त्रिभागोर्ध्वं सूत्रांशे (तदंशे) पादवर्जिते । ध्वजोन्नतिस्तु कर्त्तव्या ईशाने नैऋतेऽथवा ॥ प्रासादपृष्ठदेशे तु प्रतिरथे च दक्षिणे । स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्तेरष्टमांश के (भित्याश्च षष्ठमाशके)॥" सूत्र १४४ शिखर की रेखा (कोण) के ऊपर के अर्ध भाग का तीन भाग करे । ऊपर के तीसरे भाग का फिर चार भाग करके नीचे से एक भाग छोड करके उसके ऊपर के भाग में स्तंभवेध बनावे । यह ईशान अथवा नैऋत कोण मे प्रासाद के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे दीवार के छट्ठे भाग के मान जितना मोटा बनावे । ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका— "स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्त्याश्च षष्ठमाशकः । घण्टोदयप्रमाणेन स्तम्भिकोदयः कारयेत् ॥ घामहस्ताङ्गलविस्तार-स्तस्योर्ध्वं कलशो भवेत् ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ प्रा० १२

६० प्रासादमण्डने दीवार के छठे भाग का मोटा स्तंभवेध (ध्वजाधार) बनावे। ध्वजादंड को मजबूत स्थिर रखने के लिये बगल में एक स्तंभिका रखी जाती है। उसका उदय स्तंभवेध से आमलसार का उदय तक रक्खें। उसकी मोटाई प्रासाद के मान से हस्तांगुल (जितने हाथ हो उतने अंगुल) रक्खें और उसके ऊपर कलश रक्खें। ध्वजादंड और स्तंभिका इन दोनों का अच्छी तरह वज्रबंध करें। शिखर का २४ भाग करके २२ वां भाग में ध्वजदंड और स्तंभिका का स्थान— शिखर का छह भाग करके ऊपर के छठे भाग के तीसरे भाग में ध्वजदंड का स्थान— ध्वजादंड का उदयमान— दण्डः कार्यस्तृतीयांशः शिलातः¹ कलशान्तकम् । मध्योऽष्टांशेन हीनोऽसौ ज्येष्ठपादोनः कन्यसः ॥४१॥ १. 'शिलान्तः'

चतुर्थोऽध्यायः ६१ प्रासाद की खरशिला से लेकर कलश के अग्रभाग तक के उदय का तीन भाग करके, इनमे से एक भाग के मान का लंबा ध्वजादंड बनावे। यह ज्येष्ठमान का है। इनमे से आठवा भाग कम करने से मध्यम मान का और चौथा भाग कम करने से कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४१॥ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान— प्रासादव्यासमानेन² दण्डो ज्येष्ठः प्रकीर्तितः । मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥४२॥ प्रासाद के विस्तार के बराबर ध्वजादंड की लंबाई रखे, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड है । इसमे से दसवा भाग कम करे तो मध्यम मान का और पाचवा भाग कम करे तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४२॥ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान— "मूलरेखाप्रमाणेन ज्येष्ठः स्याद् दण्डसम्भवः । मध्यमो द्वादशांशोनः षडंशोनः कनिष्ठकः ॥" अप० सू० १४४ मूलरेखा (गर्भगृह अथवा शिखर के नीचे के पायचा के विस्तार जितना) के विस्तार मान का लंबा ध्वजाडड बनावे, यह ज्येष्ठ मान का है। उसमे से बारहवां भाग कम करे तो मध्यम और छठा भाग कम करेतो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। विवेक विलास के प्रथम सर्ग के श्लोक १७६ मे स्पष्ट लिखा है कि— "दण्डः प्रकाशे प्रासादे प्रासादकरसंख्यया । सान्धकारे पुनः कार्यो मध्यप्रासादमानतः ॥" प्रकाश वाले (विना परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड प्रासाद के मान का बनावे, अर्थात् प्रासाद का जितना विस्तार हो उतना लंबा ध्वजाडड बनावे। अंधकार वाले (परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड मध्य प्रासाद के मान का बनावे। अर्थात् परिक्रमा और उसकी दीवार को छोड़कर के गभारे के दोनो दीवार तक के मान का बनावे। ध्वजादंड का विस्तारमान— एकहस्ते तु प्रासादे दण्डः पादोनमङ्गुलम् । कुर्यादर्घाङ्गुला वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥४३॥ २. 'पृथु' । *यह मत प्रचार मे अधिक है।