भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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८८ प्रासादमण्डने भाग (शिखर) पर और सब मांगलिक स्थानों मे विद्वान् लोग स्थापित करते हैं ॥३६॥ कलश का उदयमान— पूर्वोक्तमानतो ज्येष्ठः षोडशांशाधिको भवेत् । द्वात्रिंशदंशतो¹ मध्यो नवांशोऽभ्युदयं भवेत् ॥३७॥ ग्रीवापीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिके भागतुल्ये च त्रिभागं बीजपूरकम् ॥३८॥ पूर्वोक्त श्लोक २५ में कलश का जो मान लिखा है, उसका मान में उसका सोलहवां भाग बढावे तो ज्येष्ठ मान का और बत्तीसवां भाग बढ़ावें तो मध्यम मान के कलश का उदय होता है। जो उदय आवे उसका नव भाग करे, उन मे से एक भाग की ग्रीवा और पीठ, तीन भाग का अंडक (कलश का पेट), दोनों कर्णिका (एक छज्जी और एक कणी) एक २ भाग और तीन भाग का बीजोरा उदय मे रक्खें ॥३७-३८॥ कलश का विस्तार मान— एकांशमग्रे द्वौ मूले वह्निवेदांशकर्णिके । ग्रीवा द्वौ पीठमर्द्ध² द्वौ षड्भागं विस्तराण्डकम् ॥३९॥ इति कलशः । बीजोरा के अग्र भाग का विस्तार एक भाग और मूल भाग का विस्तार दो भाग, ऊपर की कणी का विस्तार तीन भाग, नीचे की कणी (छाजली) का विस्तार चार भाग, गला का विस्तार दो भाग, आधी पीठ का विस्तार दो भाग (पूरी पीठ का विस्तार चार भाग) और कलश के पेटका बिस्तार छह भाग है ॥३९॥ १ 'तावदंशोनः कनीयो'