प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ८६ ध्वजादंड रखने का स्थान— प्रासादपृष्ठदेशे तु दक्षिणे तु प्रतिरथे । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्य ईशाने नैऋतेऽथवा ॥४०॥ इति प्रासादस्योर्ध्वलक्षणम् । प्रासाद के शिखर के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजादंड रखने का छिद्रवाला स्थान ध्वजाधार (कलावा) बनावे । यह पूर्वाभिमुख प्रासाद के ईशान कोने मे और पश्चिमा- भिमुख प्रासाद के नैऋत्य कोने मे बनावे ॥४०॥ ध्वजाधार (स्तंभवेध) का स्थान-- "रेखायाः षष्ठमे भागे तदंशे पादवर्जिते । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्यः प्रतिरथे च दक्षिणे ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ शिखर की रेखा के उदय का छह भाग करे । उनमे ऊपर के छठे भाग का फिर चार भाग करे, इनमे से नीचे का एक भाग छोड कर, इसके ऊपर के भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजाधार बनावे अर्थात् रेखा का चौबीस भाग करके ऊपर के बाईसवे भाग मे ध्वजाधार बनावे । अपराजित के मत से स्तंभवेध का स्थान— "रेखाध' (र्घश्च?) त्रिभागोर्ध्वं सूत्रांशे (तदंशे) पादवर्जिते । ध्वजोन्नतिस्तु कर्त्तव्या ईशाने नैऋतेऽथवा ॥ प्रासादपृष्ठदेशे तु प्रतिरथे च दक्षिणे । स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्तेरष्टमांश के (भित्याश्च षष्ठमाशके)॥" सूत्र १४४ शिखर की रेखा (कोण) के ऊपर के अर्ध भाग का तीन भाग करे । ऊपर के तीसरे भाग का फिर चार भाग करके नीचे से एक भाग छोड करके उसके ऊपर के भाग में स्तंभवेध बनावे । यह ईशान अथवा नैऋत कोण मे प्रासाद के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे दीवार के छट्ठे भाग के मान जितना मोटा बनावे । ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका— "स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्त्याश्च षष्ठमाशकः । घण्टोदयप्रमाणेन स्तम्भिकोदयः कारयेत् ॥ घामहस्ताङ्गलविस्तार-स्तस्योर्ध्वं कलशो भवेत् ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ प्रा० १२