प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
DevanagariHindipublished278 पृष्ठ
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६० प्रासादमण्डने दीवार के छठे भाग का मोटा स्तंभवेध (ध्वजाधार) बनावे। ध्वजादंड को मजबूत स्थिर रखने के लिये बगल में एक स्तंभिका रखी जाती है। उसका उदय स्तंभवेध से आमलसार का उदय तक रक्खें। उसकी मोटाई प्रासाद के मान से हस्तांगुल (जितने हाथ हो उतने अंगुल) रक्खें और उसके ऊपर कलश रक्खें। ध्वजादंड और स्तंभिका इन दोनों का अच्छी तरह वज्रबंध करें। शिखर का २४ भाग करके २२ वां भाग में ध्वजदंड और स्तंभिका का स्थान— शिखर का छह भाग करके ऊपर के छठे भाग के तीसरे भाग में ध्वजदंड का स्थान— ध्वजादंड का उदयमान— दण्डः कार्यस्तृतीयांशः शिलातः¹ कलशान्तकम् । मध्योऽष्टांशेन हीनोऽसौ ज्येष्ठपादोनः कन्यसः ॥४१॥ १. 'शिलान्तः'