प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ प्रासादमण्डने मूलरेखा के विस्तार से चार गुणा सूत्र से दोनों कोने के मूल बिंदु से दो गोल बनावे। जिसके दोनों गोल के स्पर्श से कमल की पंखुड़ो जैसी आकृति वाला पद्मकोश बन जाता है। उसमें दोनों कोने के मध्य विस्तार से सवाया शिखर का उदय रक्खे ॥२३॥* ग्रीवा, आमलसार और कलशका मान— स्कन्धकोशान्तरे सप्त-भक्ते ग्रीवा तु भागतः । सार्ध आमलसारश्च पद्मच्छत्रं³ तु सार्धकम् ॥२४॥ त्रिभाग उच्चकलशो द्विभागस्तस्य विस्तरः । प्रासादस्याष्टमांशेन पृथुत्वं कलशाएडकम् ॥२५॥ ऊपर के लिखे अनुसार सवाया शिखर का उदय करने के बाद जो पद्मकोश का उदय बाकी रहता है, उसमे ग्रीवा, आमलसार और कलश बनावे। जैसे—शिखर के स्कध से लेकर पद्मकोश के अन्त्य बिन्दु तक के उदय का सात भाग करें । उनमे से एक भाग की ग्रीवा, डेढ़ भाग का आमलसार, डेढ़ भाग का पद्मच्छत्र ( चंद्रिका ) और तीन भाग का कलश बनावे । द्विभाग के विस्तार वाले कलश का बीजोरा बनावें । कलश के अंडा का विस्तार प्रासाद के आठवे भाग का रक्खें ॥२४-२५॥ शुकनासका उदय— छाद्यतः स्कन्धपर्यन्त-मेकविंशतिभाजिते । अङ्कदिग्रुद्रसूर्यांशै-र्विश्वांशैस्तस्य चोच्छ्रतिः ॥२६॥ छज्जा से लेकर शिखर के स्कंध तक के उदय का इक्कीस भाग करें । इनमे से नव, दस, ग्यारह, बारह अथवा तेरह भाग तक शुकनास का उदय रक्खे ॥२६॥ सिंहस्थान— शुकनासस्य संस्थाने छाद्यो पञ्चधा मतम् । एकत्रिपुञ्चसप्ताङ्क-सिंहस्थानानि कल्पयेत् ॥२७॥ (३) 'पत्र' ।
- शिल्पियो की मान्यता है कि—मूलकर्ण (पायचा) से शिखर का उदय सवाया करना हो तो पायचे के विस्तार से चार गुना सूत्र से, डेढा करना हो तो पाच गुना सूत्र से, पौने दुगुना करना हो तो पौने सात गुना सूत्र से और १ ३/८ उदय करना हो तो साढे चार गुना सूत्र से मूलकर्ण के दोनो विन्दु से दो गोल बनाने से कमल के पखुडी जैसा आकार बन जाता हैं। इसमे अपने इष्ट मान के उदय में शिखर का स्कंध और बाकी रहे उदय मे आमलसार और कलश आदि बनावें ।