प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ८१ त्रिगुणोऽथ सपादोऽसौ सार्धः पादोनवेदकः । चतुर्गुणः सपादोऽसौ सार्धः पादोनपञ्चकः ॥ इति षोडशधा चारं त्रिखण्डाद्यासु लक्षयेत् ॥" अप० सू० १३६ त्रिखंडादि खंडो मे सोलह कलाचारों के भेदों से सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती हैं। ये सोलह कलाचार इस प्रकार है—प्रथम सम ( बराबर ) चार, दूसरा सपाद ( सवाया ) चार, तीसरा सार्द्ध ( डेढा ) चार, चौथा पौने दो गुणा, पांचवा दो गुणा, छठ्ठा सवा दो गुणा, सातवां ढाईगुणा, आठवा पौने तीनगुणा, नवा तीनगुणा, दसवा सवा तीनगुणा, ग्यारहवा साढे तीनगुणा, बारहवा पौने चार गुणा, तेरहवां चार गुणा, चौदहवां सवा चार गुणा, पंद्रहवा साढे चार गुणा, और सोलहवां पौने पांच गुणा है। रेखासंख्या— रेखाणां जायते संख्या षट्पञ्चाशच्छतद्वयम् । दैन्ये भवन्ति यावन्त्यः कलाः स्कन्धेऽपि तत्समाः ॥२१॥ इति रेखानिर्णयः । सोलह प्रकार के कलाचारो के भेदों से प्रत्येक त्रिखंडादि मे सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती है। इसलिये रेखाग्रो की कुल संख्या दोसौ छप्पन होती हैं। शिखर के उदय मे जितनी कलारेखा उत्पन्न हो, उतनी स्कध मे भी बनानी चाहिये ॥२१॥ मंडोवर और शिखर का उदयमान— विंशद्भिर्विभजेद् भागैः शिलातः कलशान्तकम् । मण्डोवरोऽष्टसार्धाष्ट-नवांशैः शिखरं¹ परम् ॥२२॥ खरशिला से लेकर कलश के अंत भाग तक के उदय के बीस भाग करे। उनमे से आठ, साढे आठ अथवा नव भाग का मंडोवर का उदय रखे, इसी क्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ मान के मंडोवर का उदय होता है। ऐसा अप० सू० १३८ मे भी कहा है। बाकी जो भाग रहे, उतने उदय का शिखर बनावे ॥२२॥ शिखर विधान— रेखामूलस्य विस्तारात्² पद्मकोशं समालिखेत् । चतुर्गुणेन सूत्रेण सपादः शिखरोदयः ॥२३॥ (१) 'शिखरोदयम्' । (२) 'विस्तारे' । प्रा० ११