प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ८३ छज्जा के ऊपर शुकनास का उदय पांच प्रकार का माना है। उनमे से शुकनास के उदय का जो मान आया हो उसका नव भाग करे। इनमे से एक, तीन, पाच, सात अथवा नव, इन पाच भागो मे से किसी भी भाग मे सिंह स्थान की कल्पना कर सकते हैं। अर्थात् उस स्थान पर सिंह रखा जाता है ॥२७॥ *कपिली (कोली) का स्थान— द्वारस्य दक्षिणे वामे कपिली षड्विधा मता । तदूर्ध्वे शुकनासा स्यात् सैव प्रासादनासिका ॥२८॥ गर्भगृह के द्वार के आर दाहिनी और बायी ओर छह प्रकार से कोली बनावे। उसकी ऊंचाई मे शुकनास बनावे, यह प्रासाद की नासिका है ॥२८॥ कपिली का मान— प्रासादो दशभागश्च द्वित्रिवेदांशसम्मितः । प्रासादार्धेन पादेन त्रिभागेनाथ निर्मिता ॥२६॥ प्रासाद के विस्तार का दस भाग करे, उनमे से दो, तीन अथवा चार भाग की, तथा प्रासाद के मान से आधे, चौथे अथवा तीसरे भाग के मान की, ऐसे छह प्रकार के मान से कपिली (कोली) बनाने का विधान है ॥२६॥ छह प्रकार की कपिली— ''अञ्चिता कुञ्चिता शस्या त्रिधोदितक्रमांगताः । मध्यस्था भ्रमा सद्भ्रमा षट्कोल्यः परिकीर्त्तिताः ॥ प्रासादे दशधा भक्ते भूमिसौमा विचक्षण ! । अञ्चिता च द्विभागा स्यात् त्रिभागा कुञ्चिता तथा ॥ शस्या चैवं चतुर्भागा त्रिधा चोक्तक्रमांगताः । ... .... ... ... .... ..." ॥ प्रासादपादमध्यस्था भ्रमा सप्तत्रिभागतः । अर्द्ध तु सद्भ्रमा कार्या प्रासादस्य प्रमाणतः ॥" अप० सू० १३८
- गर्भगृह के द्वार के मडप को कोली मडप कहते हैं। उसके छज्जा के ऊपर शुकनास के दोनो तरफ शिखर के आकार का महप किया जाता है, उसको आधुनिक शिल्पीयो प्रासादपुत्र कहते हैं। उसका नाम कपिली अथवा कोली है ।