प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ प्रासादमण्डने अंचिता, कुञ्चिता, शस्या, मध्यस्था, भ्रमा और सभ्रमा ये छह प्रकार के कोली के नाम है। प्रासाद के विस्तार का दस भाग करके, उनमें से दो भाग की कोली बनावे, उसका नाम अंचिता, तीन भाग वाली कोली का नाम कुञ्चिता और चार भाग वाली कोली का नाम शस्या है। तथा प्रासाद के विस्तार मान के चौथे भाग की कोली बनावें, उसका नाम मध्यस्था, तीसरे भाग वालो कोली का नाम भ्रमा और आधे भाग वाली कोली का नाम सभ्रमा है। प्रासाद के अंडक और आभूषण— शृङ्गोरुशृङ्गं ग्रप्रत्यङ्गं गणयेदण्डकानि¹ च । तवङ्गं तिलकं कर्णं कुर्यात् प्रासादभूषणम् ॥३०॥ शिखर, उरुशृङ्ग, प्रत्यग और शृङ्ग, ये प्रासाद के अंडक माने जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते है। तथा तवग, तिलक और सिंहकर्ण ये प्रासाद के आभूषण माने जाते है ॥३०॥ शिखर के नमन का विभाग-- दशांशे शिखरे मूले अग्रेतननवांशके । सार्द्धांशकौ रथौ कर्णौ द्वौ शेषं भद्रमिष्यते ॥३१॥ शिखर के मूल में दस भाग और ऊपर स्कंध के नव भाग करें, उनमें से डेढ़ २ भाग के दो प्रतिरथ और दो दो भाग के दोनों कोने बनावे। बाकी जो तीन भाग नीचे और दो भाग ऊपर बचे है, उस मानका भद्र बनावे ॥३१॥ आमलसार का मान-- रथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छ्रायो विस्तारार्धेन चतुर्भागैर्विभाजयेत् ॥३२॥ ग्रीवा चामलसारश्च पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥३३॥ दोनो प्रतिरथ के मध्य विस्तार के मान का गोल आमलसार बनाना चाहिये। इसकी ऊंचाई विस्तार से आधी रक्खें। ऊंचाई का चार भाग करें। उनमे से पौने भाग की ग्रीवा ( गला ), सवा भाग का आमलसार, एक भाग की चन्द्रिका और एक भाग की आमलसारिका बनावे ॥३२-३३॥ (१) 'मण्डकान् गणयेत् सुधी:'।