प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
८४ प्रासादमण्डने अंचिता, कुञ्चिता, शस्या, मध्यस्था, भ्रमा और सभ्रमा ये छह प्रकार के कोली के नाम है। प्रासाद के विस्तार का दस भाग करके, उनमें से दो भाग की कोली बनावे, उसका नाम अंचिता, तीन भाग वाली कोली का नाम कुञ्चिता और चार भाग वाली कोली का नाम शस्या है। तथा प्रासाद के विस्तार मान के चौथे भाग की कोली बनावें, उसका नाम मध्यस्था, तीसरे भाग वालो कोली का नाम भ्रमा और आधे भाग वाली कोली का नाम सभ्रमा है। प्रासाद के अंडक और आभूषण— शृङ्गोरुशृङ्गं ग्रप्रत्यङ्गं गणयेदण्डकानि¹ च । तवङ्गं तिलकं कर्णं कुर्यात् प्रासादभूषणम् ॥३०॥ शिखर, उरुशृङ्ग, प्रत्यग और शृङ्ग, ये प्रासाद के अंडक माने जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते है। तथा तवग, तिलक और सिंहकर्ण ये प्रासाद के आभूषण माने जाते है ॥३०॥ शिखर के नमन का विभाग-- दशांशे शिखरे मूले अग्रेतननवांशके । सार्द्धांशकौ रथौ कर्णौ द्वौ शेषं भद्रमिष्यते ॥३१॥ शिखर के मूल में दस भाग और ऊपर स्कंध के नव भाग करें, उनमें से डेढ़ २ भाग के दो प्रतिरथ और दो दो भाग के दोनों कोने बनावे। बाकी जो तीन भाग नीचे और दो भाग ऊपर बचे है, उस मानका भद्र बनावे ॥३१॥ आमलसार का मान-- रथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छ्रायो विस्तारार्धेन चतुर्भागैर्विभाजयेत् ॥३२॥ ग्रीवा चामलसारश्च पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥३३॥ दोनो प्रतिरथ के मध्य विस्तार के मान का गोल आमलसार बनाना चाहिये। इसकी ऊंचाई विस्तार से आधी रक्खें। ऊंचाई का चार भाग करें। उनमे से पौने भाग की ग्रीवा ( गला ), सवा भाग का आमलसार, एक भाग की चन्द्रिका और एक भाग की आमलसारिका बनावे ॥३२-३३॥ (१) 'मण्डकान् गणयेत् सुधी:'।
चतुर्थोऽध्यायः ८५ प्रकारान्तर से आमलसार का मान-- "स्कन्धः षड्भागको ज्ञेयः सप्ताशामलसारकः । क्षेत्रमष्टविंशभागे--रुच्छ्रये च तदर्धतः ॥ ग्रीवा भागत्रयं कार्या अण्डक. पञ्चभागकः । त्रिभागा चन्द्रिका चैव तथैवामलसारिका ॥ निर्गमे षट्सार्धभागो भवेदामलसारिका । चन्द्रिका द्विसार्धभागा अण्डकः पञ्च एव च ॥" ज्ञान प्र० दी० श्र० ६ क्षीरार्णवमते आमलकारक मान स्वमते आमलसारका मान स्कंध का विस्तार छह भाग और आमलसार का विस्तार सात भाग रक्खे। आमलसार के विस्तार का अठाईस भाग और ऊंचाई का चौदह भाग करे। उदय मे तीन भाग का गला, पाच भाग का अंडक, तीन भाग की चन्द्रिका और तीन भाग की आमलसारिका रक्खे। आमलसार के मध्य गर्म से विस्तार मे साढे छह भाग निकलती आमलसारिका, इससे ढाई भाग निकलती चंद्रिका और इससे पाच भाग निकलता अंडक (आमलसार) रखना चाहिये। आमलसारकें नीचे शिखरके कोणरूप-- "शिवे तु चैश्वरं रूपं ध्यानमग्नं विचक्षण ! । शिखरकर्णे दातव्यं जिने कुर्याज्जिनेश्वरः ॥” क्षीरार्णवे । शिखर के आमलसार के नीचे और स्कंध के कोने के ऊपर शिवालय हो तो ध्यान मे मग्न ऐसे शिव के रूप तथा जिनालय हो तो जिनदेव के रूप रखे जाते है।
८६ प्रासादमण्डने
सुवर्णपुरुष (प्रासाद पुरुष) का स्थापनक्रम-- घृतपात्रं न्यसेन्मध्ये ताम्रतारं सुवर्णजम् । सौवर्णपुरुषं तत्र तुलीपर्यङ्कशायिनम् ॥३४॥ आमलसार के गर्भ मे घी से भरा हुआ सोना, चांदी अथवा तांबे का कलश सुवर्णपुरुष के पास रखना चाहिये ।* तथा चांदी अथवा चंदन का पलंग रक्खे, उसके ऊपर रेशम की शय्या बिछा करके, उस पर सुवर्णपुरुष को शयन करावें। यह विधि शुभ दिन में वास्तु पूजन करके करनी चाहिये । क्योकि यह प्रासाद का मर्मस्थान ( जीवस्थान ) है ॥३४॥
सुवर्ण पुरुष का मान और उसकी रचना-- प्रमाणं पुरुषस्यार्धा-ऽङ्गुलं कुर्यात् करं प्रति । त्रिपताकं करे वामे हृदिस्थं दक्षिणाम्बुजम्¹ ॥३५॥ प्रासाद पुरुष का प्रमाण प्रासाद के विस्तार के अनुसार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । अर्थात् एक हाथ के प्रासाद मे आधा अंगुल, दो हाथ के प्रासाद मे एक अंगुल, तोन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में दो अंगुल, इस प्रकार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । इस सुवर्णपुरुष के बांये हाथ में ध्वजा रखकर के यह छाती पर और दाहिना हाथ कमलयुक्त रक्खे ॥३५॥ प्रा० कुबेरपुरुष
अपराजितपृच्छासूत्र १५३ में कहा है कि-- “अथातः सम्प्रवक्ष्यामि पुरुषस्य प्रवेशनम् । न्यसेद् देवालयेष्वेवं जीवस्थानफलं भवेत् ॥ छादनोपप्रवेशेषु शृङ्गमध्येऽथवोपरि । शुकनासावसानेषु वेद्यूर्ध्वे भूमिकान्तरे ॥ मध्यगर्भे विधातव्यो हृदयवरणंको विधिः । हंसतुली ततो कुर्यात् ताम्रपर्यङ्कसंस्थिताम् ॥
- कुछ शिल्पियो का मत है कि-घीसे भरा हुआ सोना, चादी अथवा तांबा के कलश मे सुवर्ण पुरुष को रखकर के, वह कलश पलंग पर रक्खें । (१) 'दक्षिण करम्' ।
चतुर्थोऽध्यायः ८७ शयनं चापि निर्दिष्ट पद्म वै दक्षिणे करे । त्रिताकं करे वामे कारयेद्धृदि सस्थितम् ॥” यह सुवर्णपुरुष देवालय का जीवस्थान है, इसलिये उसको देवालय मे स्थापना करने का स्थान कहता हूँ—यह छज्जा के प्रवेश मे, शिखर के मध्य भाग मे अथवा उसके ऊपर, शुकनास के अन्तिम स्थान मे, वेदी के ऊपर और दो माल के मध्य गर्भ मे स्थापन करना चाहिये । यह हृदयवर्णक (जीव) विधि है । इसको तावे के पलंग के ऊपर रेशम की शय्या बिछा कर, उसके ऊपर शयन कराना चाहिये । उसके दाहिने हाथ मे कमल और बाये हाथ मे ध्वजा रखकर वह हाथ छाती के ऊपर रखना चाहिये । प्रमाणं तस्य वक्ष्यामि प्रासादादौ समस्तके । यावच्छतार्धं हस्तादेः कल्पयेच्च यथाक्रमम् ॥ वृद्धिर्द्धाङ्गुलाद्धस्ते यावन्मेरुं प्रकल्पयेत् । एवविध प्रकर्त्तव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥ हेमजं तारज वापि ताम्रजं वापि भागशः । कलशे चाम्बुपूर्णे तु सौवर्णं पुरुष न्यसेत् ॥ पर्यङ्कस्य चतु र्पत्सु कुम्भाश्चत्वार एव च । हिरण्यनिधिसंयुक्ता आत्ममुद्राभिरङ्किताः ॥ एवमारोपयेद् देवं यथोक्तं वास्तुशासने । तस्य नैव भवेद् दुःखं यावदाभूत सम्प्लवम् ॥” अब सुवर्ण पुरुष का प्रमाण कहता हूँ—एक हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके बनावे । यह सोना, चादी अथवा ताबा का बनाकर जलपूर्ण कलश मे स्थापन करे । पीछे उसको पलंग के ऊपर रक्खे । इसके पश्चात् अपने नाम वाली सुवर्णमुद्रा से भरे हुए चार कलश पलंग के चारो पायो के पास रक्खे । इस प्रकार सुवर्णपुरुष को स्थापित करने से जब तक जगत विद्यमान रहे, तब तक किसी प्रकार का दुःख देवालय बधाने वाले को नही होता है । कलश को उत्पत्ति और स्थापना-- क्षीराब्धौ समुत्पन्नं प्रासादस्याग्रजातकम् । माङ्गल्येषु च सर्वेषु कलशं स्थापयेद् बुधः ॥३६॥ जब देवो ने क्षीरसमुद्र का मंथन किया, तब उसमे से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे । इन चौदह रत्नो मे एक काम कुम्भ नाम का श्रेष्ठ कलश भी प्राप्त हुआ था । यह प्रासाद के अग्र
८८ प्रासादमण्डने भाग (शिखर) पर और सब मांगलिक स्थानों मे विद्वान् लोग स्थापित करते हैं ॥३६॥ कलश का उदयमान— पूर्वोक्तमानतो ज्येष्ठः षोडशांशाधिको भवेत् । द्वात्रिंशदंशतो¹ मध्यो नवांशोऽभ्युदयं भवेत् ॥३७॥ ग्रीवापीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिके भागतुल्ये च त्रिभागं बीजपूरकम् ॥३८॥ पूर्वोक्त श्लोक २५ में कलश का जो मान लिखा है, उसका मान में उसका सोलहवां भाग बढावे तो ज्येष्ठ मान का और बत्तीसवां भाग बढ़ावें तो मध्यम मान के कलश का उदय होता है। जो उदय आवे उसका नव भाग करे, उन मे से एक भाग की ग्रीवा और पीठ, तीन भाग का अंडक (कलश का पेट), दोनों कर्णिका (एक छज्जी और एक कणी) एक २ भाग और तीन भाग का बीजोरा उदय मे रक्खें ॥३७-३८॥ कलश का विस्तार मान— एकांशमग्रे द्वौ मूले वह्निवेदांशकर्णिके । ग्रीवा द्वौ पीठमर्द्ध² द्वौ षड्भागं विस्तराण्डकम् ॥३९॥ इति कलशः । बीजोरा के अग्र भाग का विस्तार एक भाग और मूल भाग का विस्तार दो भाग, ऊपर की कणी का विस्तार तीन भाग, नीचे की कणी (छाजली) का विस्तार चार भाग, गला का विस्तार दो भाग, आधी पीठ का विस्तार दो भाग (पूरी पीठ का विस्तार चार भाग) और कलश के पेटका बिस्तार छह भाग है ॥३९॥ १ 'तावदंशोनः कनीयो'
चतुर्थोऽध्यायः ८६ ध्वजादंड रखने का स्थान— प्रासादपृष्ठदेशे तु दक्षिणे तु प्रतिरथे । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्य ईशाने नैऋतेऽथवा ॥४०॥ इति प्रासादस्योर्ध्वलक्षणम् । प्रासाद के शिखर के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजादंड रखने का छिद्रवाला स्थान ध्वजाधार (कलावा) बनावे । यह पूर्वाभिमुख प्रासाद के ईशान कोने मे और पश्चिमा- भिमुख प्रासाद के नैऋत्य कोने मे बनावे ॥४०॥ ध्वजाधार (स्तंभवेध) का स्थान-- "रेखायाः षष्ठमे भागे तदंशे पादवर्जिते । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्यः प्रतिरथे च दक्षिणे ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ शिखर की रेखा के उदय का छह भाग करे । उनमे ऊपर के छठे भाग का फिर चार भाग करे, इनमे से नीचे का एक भाग छोड कर, इसके ऊपर के भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजाधार बनावे अर्थात् रेखा का चौबीस भाग करके ऊपर के बाईसवे भाग मे ध्वजाधार बनावे । अपराजित के मत से स्तंभवेध का स्थान— "रेखाध' (र्घश्च?) त्रिभागोर्ध्वं सूत्रांशे (तदंशे) पादवर्जिते । ध्वजोन्नतिस्तु कर्त्तव्या ईशाने नैऋतेऽथवा ॥ प्रासादपृष्ठदेशे तु प्रतिरथे च दक्षिणे । स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्तेरष्टमांश के (भित्याश्च षष्ठमाशके)॥" सूत्र १४४ शिखर की रेखा (कोण) के ऊपर के अर्ध भाग का तीन भाग करे । ऊपर के तीसरे भाग का फिर चार भाग करके नीचे से एक भाग छोड करके उसके ऊपर के भाग में स्तंभवेध बनावे । यह ईशान अथवा नैऋत कोण मे प्रासाद के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे दीवार के छट्ठे भाग के मान जितना मोटा बनावे । ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका— "स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्त्याश्च षष्ठमाशकः । घण्टोदयप्रमाणेन स्तम्भिकोदयः कारयेत् ॥ घामहस्ताङ्गलविस्तार-स्तस्योर्ध्वं कलशो भवेत् ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ प्रा० १२
६० प्रासादमण्डने दीवार के छठे भाग का मोटा स्तंभवेध (ध्वजाधार) बनावे। ध्वजादंड को मजबूत स्थिर रखने के लिये बगल में एक स्तंभिका रखी जाती है। उसका उदय स्तंभवेध से आमलसार का उदय तक रक्खें। उसकी मोटाई प्रासाद के मान से हस्तांगुल (जितने हाथ हो उतने अंगुल) रक्खें और उसके ऊपर कलश रक्खें। ध्वजादंड और स्तंभिका इन दोनों का अच्छी तरह वज्रबंध करें। शिखर का २४ भाग करके २२ वां भाग में ध्वजदंड और स्तंभिका का स्थान— शिखर का छह भाग करके ऊपर के छठे भाग के तीसरे भाग में ध्वजदंड का स्थान— ध्वजादंड का उदयमान— दण्डः कार्यस्तृतीयांशः शिलातः¹ कलशान्तकम् । मध्योऽष्टांशेन हीनोऽसौ ज्येष्ठपादोनः कन्यसः ॥४१॥ १. 'शिलान्तः'
चतुर्थोऽध्यायः ६१ प्रासाद की खरशिला से लेकर कलश के अग्रभाग तक के उदय का तीन भाग करके, इनमे से एक भाग के मान का लंबा ध्वजादंड बनावे। यह ज्येष्ठमान का है। इनमे से आठवा भाग कम करने से मध्यम मान का और चौथा भाग कम करने से कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४१॥ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान— प्रासादव्यासमानेन² दण्डो ज्येष्ठः प्रकीर्तितः । मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥४२॥ प्रासाद के विस्तार के बराबर ध्वजादंड की लंबाई रखे, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड है । इसमे से दसवा भाग कम करे तो मध्यम मान का और पाचवा भाग कम करे तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४२॥ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान— "मूलरेखाप्रमाणेन ज्येष्ठः स्याद् दण्डसम्भवः । मध्यमो द्वादशांशोनः षडंशोनः कनिष्ठकः ॥" अप० सू० १४४ मूलरेखा (गर्भगृह अथवा शिखर के नीचे के पायचा के विस्तार जितना) के विस्तार मान का लंबा ध्वजाडड बनावे, यह ज्येष्ठ मान का है। उसमे से बारहवां भाग कम करे तो मध्यम और छठा भाग कम करेतो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। विवेक विलास के प्रथम सर्ग के श्लोक १७६ मे स्पष्ट लिखा है कि— "दण्डः प्रकाशे प्रासादे प्रासादकरसंख्यया । सान्धकारे पुनः कार्यो मध्यप्रासादमानतः ॥" प्रकाश वाले (विना परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड प्रासाद के मान का बनावे, अर्थात् प्रासाद का जितना विस्तार हो उतना लंबा ध्वजाडड बनावे। अंधकार वाले (परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड मध्य प्रासाद के मान का बनावे। अर्थात् परिक्रमा और उसकी दीवार को छोड़कर के गभारे के दोनो दीवार तक के मान का बनावे। ध्वजादंड का विस्तारमान— एकहस्ते तु प्रासादे दण्डः पादोनमङ्गुलम् । कुर्यादर्घाङ्गुला वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥४३॥ २. 'पृथु' । *यह मत प्रचार मे अधिक है।
६२ प्रासादमण्डने एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ध्वजादंड का विस्तार पौन अंगुल का रक्खे । पीछे पचास हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके रक्खें ॥४३॥ ध्वजादंड की रचना— सुवृत्तः सारदारुश्च ग्रन्थिकोटरवजिंतः । पर्वभिर्विषमैः कार्यः समग्रन्थिः सुखावहः ॥४४॥ ध्वजादंड बहुत अच्छा और किसी प्रकार की गांठ या पोलाण आदि दोषो से रहित, तथा मजबूत काष्ठ का सुन्दर एवं गोलाकार बनावें । दंड में पर्व (विभाग) विषम संख्या में और ग्रन्थी (चूड़ी) समसंख्या में रखना सुखदायक है ॥४४॥ विषमपर्व वाले ध्वजादंड के तेरह नाम— “जयन्तस्त्वेकपर्वश्च त्रिपर्वशत्रु मर्दनः । पिङ्गल; पञ्चपर्वश्च सप्तपर्वश्च सम्भवः ॥ श्रीमुखो नवपर्वश्च आनन्दो रुद्रपर्वकः । त्रिदेवो विश्वपर्वश्च तिथिभिर्दिव्यशेखरः ॥ मुनीन्दुभिः कालदण्डो महोत्कटो नवेन्दुतः । सूर्याख्यस्त्वेर्काविशत्या कमलो वह्निनेत्रतः ॥ तत्त्वपर्वो विश्वकर्मा दण्डनामानि पर्वतः । शस्ताशस्तत्वमेतेषामभिधानगुणोद्भवम् ॥” अप० सू० १४४ एक पर्व वाला जयंत, तीन पर्ववाला शत्रु मर्दन, पांच पर्व का पिंगल, सात पर्व का संभव, नव पर्व का श्रीमुख, ग्यारह पर्व का आनंद, तेरह पर्व का त्रिदेव, पंद्रह पर्व का दिव्यशेखर, सत्रह पर्व का कालदंड, उन्नीस पर्व का महाउत्कट, इक्कीस पर्व का सूर्य, तेबीस पर्व का कमल और पच्चीस पर्व का विश्वकर्मा कहलाता है । वे तेरह प्रकार के डंड के नाम पर्व के अनुसार है और नाम के अनुसार शुभाशुभ फल देने वाले है । ध्वजादण्ड की मर्कटी (पाटली)— दण्डदीर्घषडंशेन मर्कट्यर्धेन विस्तृता । अर्द्ध चन्द्राकृतिः पार्श्वे घटोर्ध्वं कलशस्तथा ॥४५॥ ध्वजादंड की लंबाई के छठे भाग की मर्कटी (पाटली) की लंबाई रक्खें । लंबाई से आधी विस्तार मे रक्खे । (विस्तार के तीसरे भाग की मोटाई रक्खे ।) पाटली का सम्मुख
चतुर्थोऽध्यायः ६३ भाग अर्द्धचन्द्र के आकार वाला बनावे। इसके कोने मे घंटडीया लगावे और ऊपर कलश रखे ॥४५॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १४४ में कहा है कि— "मण्डूकी तस्य कर्त्तव्या अर्धचन्द्राकृतिस्तथा। पृथुदण्डसप्तगुणा हस्तादिपञ्चकावधि ॥ षड्गुणा च द्वादशान्तं शेषाः पञ्चगुणास्तथा । तथा त्रिभागविस्ताराः कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ अर्धचन्द्राकृतिश्चैव पक्षे कुर्याद् गगारकम् । वंशोर्ध्व कलशं चैव पक्षे घण्टाप्रलम्बनम् ॥" ध्वजादंड की पाटली अर्धचंद्र के आकार की बनावे । वह एक से पाच हाथ तक के लबे व जादंड के विस्तार से सातगुणी, छह से बारह हाथ तक के लम्बे ध्वजादंड के विस्तार से षगुणी और तेरह से पचास हाथ तक के ध्वजादंड के विस्तार से पाचगुणी पाटली लम्बाई मे रखे। लम्बाई का तीसरा भाग विस्तार मे रखे । यह सब इच्छितफल को देनेवाली है । अर्धचंद्राकृति के दोनो तरफ गगारक बनावे । दंड के ऊपर कलश रखे और पाटली के दोनो वगल में लम्बी घंटडीया लगाना चाहिये । ध्वजा का मान--- ध्वजा दण्डप्रमाणेन दैर्घ्येऽष्टांशेन विस्तरे । नानावस्त्रैर्विचित्रार्था-स्त्रिपञ्चाग्रशिखोत्तमा ॥४६॥ ध्वजादंड के लबाई के मान की ध्वजा की लंबाई रक्खे और लम्बाई से आठवे भाग की चौड़ाई रखे । यह अनेक वर्ण के वस्त्रो की बनावे और अग्रभाग मे तीन अथवा पाच शिखाये बनावे ॥४६॥ ध्वजा का महात्म्य— पुरे च नगरे कोट्टे रथे राजगृहे तथा । वापीकूपतडागेषु ध्वजाः कार्याः सुशोभनाः ॥४७॥ पुर, नगर, किला, रथ, राजमहल, वावडी, कूंआं और तालाव आदि स्थानो के ऊपर सुन्दर ध्वजा रखनी चाहिये ॥४७॥ निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा ध्वजहीने सुरालये । असुरा वासमिच्छन्ति ध्वजहीनं न कारयेत् ॥४८॥
६४ प्रासादमण्डने तैयार हुए प्रासाद के शिखर को ध्वजा रहित देखकर असुर (राक्षस) उसमे रहने की इच्छा करते है । इसलिये देवालय ध्वजा रहित नहीं रखना चाहिये ॥४८॥ ध्वजोच्छ्रायेण तुष्यन्ति देवाश्च पितरस्तथा । दशाश्वमेधिकं पुण्यं सर्वतीर्थधरादिकम् ॥४६॥ देवालय के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से देव और पितर संतुष्ट होते है । तथा दशाश्वमेध यज्ञ करने से और समस्त भूतल की तीर्थयात्रा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य प्रासाद के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से होता है ॥४६॥ पञ्चाशत् पूर्वतः पश्चाद्-आत्मानं च तथाधिकम् । शतमेकोत्तरं सोऽपि तारयेन्नरकार्णवात् ॥५०॥ इति ध्वजलक्षणं पुण्याधिकारः । इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे प्रतिमा- प्रमाणदृष्टिपदस्थानशिखरध्वजाकलशलक्षणाधिकारश्चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ ध्वजा चढ़ानेवाले के वंश की पहले की पचास और पीछे की पचास, तथा एक अपनी इस तरह कुल एकसौ एक पीढ़ी के पूर्वजों को नरकरूपी समुद्र से यह ध्वजा तिरा देती है अर्थात् उद्धार करती है ॥५०॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासादमण्डन ग्रन्थ के चौथा- अध्ययन की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥४॥
अथ प्रासादमण्डने पञ्चमोऽध्यायः मंगल— नानाविधमिदं विश्वं विचित्रं येन सूत्रितम् । सूत्रधारः श्रेयसेऽस्तु¹ सर्वेषां पालनक्षमः ॥१॥ जिसने अनेक प्रकार का यह विचित्र जगत बनाया है, यही सूत्रधार (विश्वकर्मा) सबका पालन करने मे समर्थ है। और यही सबके कल्याण के लिये हों ॥१॥ ग्रंथ मान्यता की याचना— न्यूनाधिकं प्रसिद्धं च यत् किञ्चिन्मण्डनोदितम् । विश्वकर्मप्रसादेन शिल्पिभिर्मान्यतां वचः ॥२॥ जगत में जो कुछ मंडन सूत्रधार का न्यूनाधिक रूप से कहा हुआ शिल्पशास्त्र प्रसिद्ध है, वह विश्वकर्मा की कृपा से शिल्पियो से मान्य हो ॥२॥ वैराज्यपासाद— चतुर्भागं समारभ्य यावत्सूर्योत्तरं शतम् । भागसंख्येति विख्याता फालना कर्णबाह्यतः ॥३॥ चार भाग से लेकर एकसो बारह भाग तक के वैराज्यादि प्रासाद होते है । तथा उनकी फालनाऐ कोने से बाहर निकलती होती है । ॥३॥ फालना के भेद— अष्टोत्तरशतं भेदा अंशवृद्ध्या भवन्ति ते । समांशैर्विषमैः कार्या-नन्तभेदैश्च फालना ॥४॥ एक २ अंशकी वृद्धि से फालना का एक सौ आठ भेद होते हैं। एवं समांश और विषमांश के भेदो से फालना के अनन्त भेद भी होते है ॥४॥ एकस्यापि तलस्योध्र्वे शिखराणि बहून्यपि । नामानि जातयस्तेषा-मूर्ध्वमार्गानुसारतः ॥५॥ एक ही तल के ऊपर बहुत प्रकार के शिखर बनाये जाते है और उन शिखरो के निर्माण १. 'स एव स्यात्' ।
६६ | प्रासादमण्डने
से ही प्रासादों के नाम और उसकी जाति, ये दोनों उत्पन्न होते है ॥५॥ भ्रमणी (परिक्रमा)— दशहस्तादधो न स्यात् प्रासादो भ्रमसंयुतः । नवाष्टदशभागेन भ्रमो भित्तिर्विधीयते ॥६॥ दस हाथ से न्यून प्रासाद को भ्रमणी (परिक्रमा) नहीं किया जाता, किन्तु दस हाथ से अधिक विस्तार वाले प्रासाद को भ्रमणी करना चाहिये। भ्रमणी और दीवार प्रासाद के आठ नव अथवा दसवें भाग की रखना चाहिये ॥६॥ १-वैराज्य प्रासाद— वैराज्यश्चतुरस्रः स्याच्चतुद्वारे चतुष्किका । प्रासादो ब्रह्मणः प्रोक्तो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥७॥ प्रथम वैराज्य प्रासाद समचोरस और चार द्वार वाला है। प्रत्येक द्वार चौकी मंडप वाला बनावे। यह प्रासाद ब्रह्माजी ने कहा है और विश्वकर्मा ने निर्माण किया है ॥७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५५ में कहा है कि— “चतुरस्रीकृते क्षेत्रे तथा षोडशभाजिते । तस्य मध्यं चतुर्भागै-गर्भं सूत्रैश्च कारयेत् ॥ द्वादशस्वथ शेषेषु बाह्ये भित्तीः प्रकल्पयेत् ॥” वैराज्य प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग कर के उन में से चार भाग का मध्य गर्भगृह बनावे और बाकी बारह भाग में दो २ भाग की दीवार और दो भागकी भ्रमणी बनावे । सपादं शिखरं कार्यं घण्टाकलशभूषितम् । चतुर्भिः शुकनासैस्तु सिंहकर्णैर्विराजितम् ॥८॥ इसके शिखर का उदय विस्तार से सवाया बनावे । तथा आमलसार और कलश से सोभायमान करें। एवं चारों ही दिशा मे शुकनाश तथा सिंहकर्ण आदि से शिखर को शोभायमान बनावे ॥८॥
रेखाचित्र विवरण (चित्रगत पाठ):
- शिखर के पार्श्व में (उर्ध्व पाठ): वैराज्यादि प्रकृति प्रथम विभक्ति अंक ॥१॥
- तलच्छन्द (Ground Plan) में अंकित पाठ: गर्भगृह, भित्ति, भ्रम, २, भित्ति
ओरीसा जगन्नाथपुरी का वैराज्यादि जाति का एकाण्डक शिखर
i नागर जाति के पासाद का कलामय मंडोवर (दीवार) २
पञ्चमोऽध्यायः ६७ दिशा के द्वार का नियम— एकद्वारं भवेत् पूर्वे द्विद्वारं पूर्वपश्चिमे । त्रिद्वारं मध्यजं द्वारं दक्षिणास्यं विवर्जयेत् ॥६॥ प्रासाद का यदि एक द्वार रखना हो तो पूर्वदिशा मे ही रक्खे। दो द्वार रखना हो तो पूर्व पश्चिम दिशामे रक्खे। तीन द्वार रखना हो तो दो द्वार के बीच में मुख्य द्वार रक्खे। परन्तु दक्षिणाभिमुख वाला मुख्य द्वार नहीं रखना चाहिये। ऐसा द्वार नहीं बनावें जिससे प्रवेश मे उत्तर मुख रहे ॥६॥ चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु शिवब्रह्मजिनालये । होमशालायां २कर्त्तव्यं क्वचिद् राजगृहे तथा ॥१०॥ शिव, ब्रह्मा और जिनदेव, इनके प्रासादो मे चारो ही दिशाओ मे द्वार रक्खे जाते हैं। एवं यज्ञशाला और कभी राजमहल मे भी चारो दिशाओ में द्वार रक्खे जाते है ॥१०॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५७ मे त्रिद्वारके विषय मे विशेषरूप से लिखते है कि— "पूर्वोत्तरयाम्ये चैव पूर्वापरोत्तरे तथा। याम्यापरोत्तरे शस्तं त्रिद्वारं त्रिविधं स्मृतम् ॥" पूर्व उत्तर और दक्षिण, पूर्व पश्चिम और उत्तर तथा दक्षिण पश्चिम और उत्तर, इस प्रकार तीन प्रकार के त्रिद्वार प्रशस्त है। "पूर्वापरे स्याद् द्विद्वारं दूषयेच्च याम्योत्तरे। एकद्वारं च माहेन्द्रं चतुर्द्वारं चतुर्दिशम् ॥" अप० सू० १५७ प्रासाद मे दो द्वार बनाना हो तो पूर्व और पश्चिम दिशा में बनावें। परन्तु उत्तर और दक्षिण दिशा मे नही बनावे, क्योकि यह दोष कर्त्ता है। यदि एक ही द्वार बनाना हो तो पूर्व दिशा मे ही बनावे और चार द्वार बनाना हो तो चारों दिशा मे बनावे। "पूर्वे च भक्तिदं द्वारं मुक्तिदं वरुणोद्गतम् । याम्योत्तरे शिवे द्वारे कृते दोषो महद्भयम् ॥" अप० सू० १५७ पूर्वदिशा का द्वार भक्ति देनेवाला है और पश्चिम दिशा का द्वार मुक्ति को देनेवाला है। शिव प्रासाद मे यदि उत्तर और दक्षिण दिशा में द्वार किया जाय तो बडा दोष और भय करने वाला है। २. 'होमश ला चतुर्द्वारा' पाठान्तरे । प्रा० १३
“एकद्वारं च माहेन्द्र्या-मन्यथा दोषंदं भवेत् । भद्रं सर्वत्र कल्याणं चतुर्द्वारं शिवालये ॥” अप० सू० १५७ शिवालय मे एक द्वार रखना हो तो पूर्व दिशा में ही रखे और अन्य दिशा में रखें तो दोष देने वाला है । परन्तु चारो दिशा में चार द्वार बनावें तो कल्याण कारक है । ‘ब्रह्मविष्णुरवीणां च कुर्यात् पूर्वोक्तमेव हि । समोसरणे च जैनेन्द्रे दिशादोषो न विद्यते ॥’ अप० सू० १५७ ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन प्रासादों में ऊपर कहे अनुसार द्वार बनावें । जिनदेव के समवसरण प्रासादों में दिशा का दोष नहीं है । चाहे जिस दिशा में द्वार बना सकते है । वैराज्यादिसमुत्पन्नाः प्रासादा ब्रह्मणोदिताः १ । एक-त्रि-पञ्चसप्ताङ्ग-संख्याङ्गैः पञ्चविंशतिः ॥११॥ इति वैराज्यप्रासादः । वैराज्यादि जो पचीस प्रासाद हैं, वे ब्रह्माजी ने बताये हैं । वे एक, तीन, पांच, सात और नव अंगो के भेदवाले है । जैसे-वैराज्यप्रासाद एक अंग फक्त कोना वाला है । नंदन, सिंह और श्रीनन्दन, ये तीन प्रासाद तीन अंग ( दो कोना और भद्र ) वाले हैं । मंदर, मलय, विमान, सुविशाल और त्रैलोक्यभूषण, ये पांच प्रासाद पांच अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ और भद्र ) वाले है । माहेन्द्र, रत्नशीर्ष, शतशृंग, भूधर, भुवनमंडन त्रैलोक्यविजय और पृथ्वीवल्लभ,’ ये सात प्रासाद सात अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ, दो रथ और भद्र ) वाले है । महीधर, कैलाश, नवमंगल, गंधमादन, सर्वाङ्गसुन्दर, विजयानन्द, सर्वाङ्गतिलक, महाभोग और मेरु, ये नव प्रासाद नव अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिकर्ण दोरथ, दो उपरथ और भद्र ) वाले है । ऐसा अपराजित पृच्छा सूत्र १५६ में कहा है ॥११॥ २-नन्दन प्रासाद— चतुर्भक्ते भवेत् कोणो भागो भद्रं द्विभागिकम् । भागार्धं निर्गमं भद्रे प्रकुर्यान्मुखभद्रकम् ॥१२॥ शृङ्गमेकं भवेत् कोणे२ द्वे द्वे भद्रे च नन्दनः । इति नंदनः । प्रासाद के तल का चार भाग करे । उनमें से एक २ भाग का कोना और दो भाग का भद्र बनावें । भद्र का निर्गम आधा भाग का रखें। भद्र में मुखभद्र भी बनावें । कोने के ऊपर १. ब्रह्मणार्चिताः' २. 'कर्णे' ।
पञ्चमोऽध्यायः ६६ एक २ शृंग और भद्र के ऊपर दो २ उरुशृंग रक्खे । ऐसा नंदन नाम का प्रासाद है ॥१२॥ शृंगसंख्या १३ । कोणे ४ भद्रे ८ और एक शिखर । ३-सिंहप्रासाद— [चित्र विवरण: वैराग्यादि त्र्यङ्गो नन्दन प्रासाद भद्र १ भाग ४ अंक न. ३१॥ प्रासादपीठ प्र. ३१यते / नदन प्रासाद] मुखभद्रे प्रतिभद्र-मुद्गमो रथिकोपरि ॥१३॥ कर्णशृङ्गे सिंहकर्णः सिंहनामा स उच्यते । देवतासु² प्रकर्त्तव्यः सिंहस्तत्रैव शाश्वतः ॥१४॥ तुष्यति गिरिजा तस्य सौभाग्यधनपुत्रदा । रथिका सिंहकर्णश्च भद्रे शृङ्गे च सिंहकः ॥१५॥ इति सिंहः । तल विभक्ति नन्दन प्रासाद की तरह ही करे । मुखभद्र में प्रतिभद्र बनावे । तथा भद्र के गवाक्ष के ऊपर उद्गम बनावे । कोने के शृंगो के ऊपर सिंह रक्खे । ऐसा सिंह नाम का प्रासाद है । यह देवता (देवीओँ) के लिये बनावे । इसमे सिंह शाश्वत रहता है, इसलिये पार्वती देवी खुश होती है और सौभाग्य धन और पुत्र देती है। भद्र की रथिका के ऊपर सिंहकर्ण और शृंगो के ऊपर भी सिंहकर्ण रखने से सिंह नाम का प्रासाद है ॥१३ से १५॥ ४-श्रीनन्दन प्रासाद— कर्णे शृङ्गं तु पञ्चाण्डं स श्रीनन्दन उच्यते । इति नन्दनः इतित्र्यङ्गप्रासादाः । नन्दन प्रासाद के कोने ऊपर पाच अंडक वाला केसरी शृंग चढ़ावे तो यह श्रीनन्दन नाम का प्रासाद होता है । शृङ्ग संख्या २६ । कोणे केसरी क्रम २०, भद्रे ८, एक शिखर । ५-मंदिर और ६-मलय प्रासाद— त्र्यङ्ग इत्यर्थः षड्भागै-श्चतुरस्रं विभजयेत् ॥१६॥ कर्णं प्रतिरथं कुर्याद् भद्रार्धं भागभागिकम् । समं निर्गममंशैश्च³ भद्रं, भागाद्द्वै निर्गमम् ॥१७॥ २. 'देवाना तु' । ३. 'निर्गममस्माच्च' ।
१०० प्रासादमण्डने द्वे द्वे कर्णे तथा भद्रे शृङ्गमेकं प्रतिरथे । मन्दिरस्तृतीयं भद्रे मलयो भद्रजं त्यजेत् ॥१८॥ ऊपर तीन अंगवाले प्रासादो का वर्णन कहा गया है। अब पांच अंगवाले प्रासादों का वर्णन करते हैं—समचोरस प्रासाद के तलका छह भाग करें। इनमें कर्ण, प्रतिकर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक एक २ भाग का रक्खे । कर्ण और प्रतिकर्ण का निर्गम समदल रक्खें और भद्र का निर्गम आधा भाग रखना चाहिये । कर्ण और भद्र के ऊपर दो दो और प्रतिकर्ण के ऊपर एक २ शृङ्ग चढावें। ऐसा मंदिर नाम का प्रासाद है। इस प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक उरुशृंग चढ़ावें तो मलय नाम का प्रासाद होता है ॥१६ से १८॥ शृंग सख्या २५ । कोणे ८, भद्रे ८, प्ररथे ८, एक शिखर । ७-विमान, ८-विशाल और ९ त्रैलोक्यभूषण प्रासाद— प्रत्यङ्गं तिलकं कुर्यात् प्रतिरथे विमानकः । भद्रोरुशृङ्गैर्वैश्शालः प्रतिरथे सुभूष्णः ॥१९॥ इति पञ्चांगाः पंचप्रासादाः । ऊपर श्लोक १८ के अंत मे 'भद्रजं त्यजेत्' शब्द का यहां अर्थ करें। मलय नाम के प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरुशृंग हटा करके कर्ण के दोनों तरफ एक २ प्रत्यंग चढावें और प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें, तो इसे विमान नाम का प्रासाद कहा जाता है। विमान प्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढावे, तो विशाल नाम का प्रासाद कहा जाता है, और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढावे तो उसे त्रैलोक्यभूषण नामक प्रासाद कहा है ॥१९॥ विमान शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ एक शिखर एवं कुल ३३ शृंग । तिलक संख्या—प्ररथे १-१ कुल ८ । त्रैलोक्यभूषण शृंगसंख्या—कोणे ८ प्रतिरथे १६ भद्रे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर एवं ४१ शृंग और तिलक ८ । विशाल शृंगसंख्या—भद्रे १२ बाकी पूर्ववत् कुल ३७ । तिलक ८ प्ररथे ।
पञ्चमोऽध्यायः १०१ १०-माहेन्द्रप्रासाद— चतुरस्रेऽष्टभिर्भक्ते कर्णं प्रतिरथं रथम् । भद्रार्धं भागभागं च भागार्धेन विनिर्गमम् ॥२०॥ वारिमार्गान्तरयुक्ता रथाश्च तुल्यनिर्गमाः । शृङ्गयुग्मं च तिलकं कर्णे द्वेतु प्रतिरथे ॥२१॥ एकं चोपरथे भद्रे त्रीणि त्रीणि चतुर्दिशि । शिखरं पञ्चविस्तारं माहेन्द्रो राज्यदो नृणाम् ॥२२॥ इति माहेन्द्रः । समचोरस तल का आठ भाग करे। इनमे कर्ण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्ध, ये प्रत्येक एक १ भाग का रखें। भद्रका निर्गम आधा भाग का रखे ये सब अंग वारिमार्ग वाले बनावें । कर्ण, प्रतिरथ और उपरथ का निर्गम एक १ भाग रखें। कर्णके ऊपर दो २ शृंग और एक तिलक चढावें, प्रतिरथ के ऊपर दो २ शृंग, उपरथ के ऊपर एक १ शृंग और भद्र के ऊपर तीन ३ उरुशृंग चढावे। मूल शिखर का विस्तार पाच भाग रखे। ऐसा माहेन्द्र नाम का प्रासाद मनुष्यो को राज्य देनेवाला है ॥२० से २२॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे १६ उपरथे ८, भद्रे १२ एक शिखर एवं कुल ४५, तिलक, ४ कोणे । ११-रत्नशीर्ष प्रासाद— कर्णे शृङ्गत्रयं शेषं पूर्ववद् रत्नशीर्षकः । इति रत्नशीर्षः । माहेन्द्र प्रासाद के कर्णके ऊपर यदि तीन शृंग चढ़ाया जाय तो उस प्रासाद का नाम रत्नशीर्ष होता है । शृंग संख्या—कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १२ एक शिखर, कुल ४९ । १२-सितशृंग प्रासाद— त्यक्त्वैकशृङ्गं भद्रस्य मत्तालम्बं च कारयेत् ॥२३॥
चित्र-विवरण (Diagram Inscriptions):
[शिखर-पार्श्वे ऊर्ध्व-पंक्तिः]: चौथादि शंगती माहेन्द्र प्रासाद तलशृंग ४८॥ अंक ॥६४॥ शिखर ४५॥ [पीठिका-योजनान्तर्गतम्]: गर्भ गृह / ३+३ [पीठिका-पार्श्वे]: पृष्ठभद्र और भद्रार्ध [चित्राधोभागे]: माहेन्द्र प्रासाद