भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

“एकद्वारं च माहेन्द्र्या-मन्यथा दोषंदं भवेत् । भद्रं सर्वत्र कल्याणं चतुर्द्वारं शिवालये ॥” अप० सू० १५७ शिवालय मे एक द्वार रखना हो तो पूर्व दिशा में ही रखे और अन्य दिशा में रखें तो दोष देने वाला है । परन्तु चारो दिशा में चार द्वार बनावें तो कल्याण कारक है । ‘ब्रह्मविष्णुरवीणां च कुर्यात् पूर्वोक्तमेव हि । समोसरणे च जैनेन्द्रे दिशादोषो न विद्यते ॥’ अप० सू० १५७ ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन प्रासादों में ऊपर कहे अनुसार द्वार बनावें । जिनदेव के समवसरण प्रासादों में दिशा का दोष नहीं है । चाहे जिस दिशा में द्वार बना सकते है । वैराज्यादिसमुत्पन्नाः प्रासादा ब्रह्मणोदिताः १ । एक-त्रि-पञ्चसप्ताङ्ग-संख्याङ्गैः पञ्चविंशतिः ॥११॥ इति वैराज्यप्रासादः । वैराज्यादि जो पचीस प्रासाद हैं, वे ब्रह्माजी ने बताये हैं । वे एक, तीन, पांच, सात और नव अंगो के भेदवाले है । जैसे-वैराज्यप्रासाद एक अंग फक्त कोना वाला है । नंदन, सिंह और श्रीनन्दन, ये तीन प्रासाद तीन अंग ( दो कोना और भद्र ) वाले हैं । मंदर, मलय, विमान, सुविशाल और त्रैलोक्यभूषण, ये पांच प्रासाद पांच अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ और भद्र ) वाले है । माहेन्द्र, रत्नशीर्ष, शतशृंग, भूधर, भुवनमंडन त्रैलोक्यविजय और पृथ्वीवल्लभ,’ ये सात प्रासाद सात अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिरथ, दो रथ और भद्र ) वाले है । महीधर, कैलाश, नवमंगल, गंधमादन, सर्वाङ्गसुन्दर, विजयानन्द, सर्वाङ्गतिलक, महाभोग और मेरु, ये नव प्रासाद नव अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिकर्ण दोरथ, दो उपरथ और भद्र ) वाले है । ऐसा अपराजित पृच्छा सूत्र १५६ में कहा है ॥११॥ २-नन्दन प्रासाद— चतुर्भक्ते भवेत् कोणो भागो भद्रं द्विभागिकम् । भागार्धं निर्गमं भद्रे प्रकुर्यान्मुखभद्रकम् ॥१२॥ शृङ्गमेकं भवेत् कोणे२ द्वे द्वे भद्रे च नन्दनः । इति नंदनः । प्रासाद के तल का चार भाग करे । उनमें से एक २ भाग का कोना और दो भाग का भद्र बनावें । भद्र का निर्गम आधा भाग का रखें। भद्र में मुखभद्र भी बनावें । कोने के ऊपर १. ब्रह्मणार्चिताः' २. 'कर्णे' ।