भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः ६६ एक २ शृंग और भद्र के ऊपर दो २ उरुशृंग रक्खे । ऐसा नंदन नाम का प्रासाद है ॥१२॥ शृंगसंख्या १३ । कोणे ४ भद्रे ८ और एक शिखर । ३-सिंहप्रासाद— [चित्र विवरण: वैराग्यादि त्र्यङ्गो नन्दन प्रासाद भद्र १ भाग ४ अंक न. ३१॥ प्रासादपीठ प्र. ३१यते / नदन प्रासाद] मुखभद्रे प्रतिभद्र-मुद्गमो रथिकोपरि ॥१३॥ कर्णशृङ्गे सिंहकर्णः सिंहनामा स उच्यते । देवतासु² प्रकर्त्तव्यः सिंहस्तत्रैव शाश्वतः ॥१४॥ तुष्यति गिरिजा तस्य सौभाग्यधनपुत्रदा । रथिका सिंहकर्णश्च भद्रे शृङ्गे च सिंहकः ॥१५॥ इति सिंहः । तल विभक्ति नन्दन प्रासाद की तरह ही करे । मुखभद्र में प्रतिभद्र बनावे । तथा भद्र के गवाक्ष के ऊपर उद्गम बनावे । कोने के शृंगो के ऊपर सिंह रक्खे । ऐसा सिंह नाम का प्रासाद है । यह देवता (देवीओँ) के लिये बनावे । इसमे सिंह शाश्वत रहता है, इसलिये पार्वती देवी खुश होती है और सौभाग्य धन और पुत्र देती है। भद्र की रथिका के ऊपर सिंहकर्ण और शृंगो के ऊपर भी सिंहकर्ण रखने से सिंह नाम का प्रासाद है ॥१३ से १५॥ ४-श्रीनन्दन प्रासाद— कर्णे शृङ्गं तु पञ्चाण्डं स श्रीनन्दन उच्यते । इति नन्दनः इतित्र्यङ्गप्रासादाः । नन्दन प्रासाद के कोने ऊपर पाच अंडक वाला केसरी शृंग चढ़ावे तो यह श्रीनन्दन नाम का प्रासाद होता है । शृङ्ग संख्या २६ । कोणे केसरी क्रम २०, भद्रे ८, एक शिखर । ५-मंदिर और ६-मलय प्रासाद— त्र्यङ्ग इत्यर्थः षड्भागै-श्चतुरस्रं विभजयेत् ॥१६॥ कर्णं प्रतिरथं कुर्याद् भद्रार्धं भागभागिकम् । समं निर्गममंशैश्च³ भद्रं, भागाद्द्वै निर्गमम् ॥१७॥ २. 'देवाना तु' । ३. 'निर्गममस्माच्च' ।

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