भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१०० प्रासादमण्डने द्वे द्वे कर्णे तथा भद्रे शृङ्गमेकं प्रतिरथे । मन्दिरस्तृतीयं भद्रे मलयो भद्रजं त्यजेत् ॥१८॥ ऊपर तीन अंगवाले प्रासादो का वर्णन कहा गया है। अब पांच अंगवाले प्रासादों का वर्णन करते हैं—समचोरस प्रासाद के तलका छह भाग करें। इनमें कर्ण, प्रतिकर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक एक २ भाग का रक्खे । कर्ण और प्रतिकर्ण का निर्गम समदल रक्खें और भद्र का निर्गम आधा भाग रखना चाहिये । कर्ण और भद्र के ऊपर दो दो और प्रतिकर्ण के ऊपर एक २ शृङ्ग चढावें। ऐसा मंदिर नाम का प्रासाद है। इस प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक उरुशृंग चढ़ावें तो मलय नाम का प्रासाद होता है ॥१६ से १८॥ शृंग सख्या २५ । कोणे ८, भद्रे ८, प्ररथे ८, एक शिखर । ७-विमान, ८-विशाल और ९ त्रैलोक्यभूषण प्रासाद— प्रत्यङ्गं तिलकं कुर्यात् प्रतिरथे विमानकः । भद्रोरुशृङ्गैर्वैश्शालः प्रतिरथे सुभूष्णः ॥१९॥ इति पञ्चांगाः पंचप्रासादाः । ऊपर श्लोक १८ के अंत मे 'भद्रजं त्यजेत्' शब्द का यहां अर्थ करें। मलय नाम के प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरुशृंग हटा करके कर्ण के दोनों तरफ एक २ प्रत्यंग चढावें और प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें, तो इसे विमान नाम का प्रासाद कहा जाता है। विमान प्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढावे, तो विशाल नाम का प्रासाद कहा जाता है, और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढावे तो उसे त्रैलोक्यभूषण नामक प्रासाद कहा है ॥१९॥ विमान शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ एक शिखर एवं कुल ३३ शृंग । तिलक संख्या—प्ररथे १-१ कुल ८ । त्रैलोक्यभूषण शृंगसंख्या—कोणे ८ प्रतिरथे १६ भद्रे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर एवं ४१ शृंग और तिलक ८ । विशाल शृंगसंख्या—भद्रे १२ बाकी पूर्ववत् कुल ३७ । तिलक ८ प्ररथे ।