प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः ६७ दिशा के द्वार का नियम— एकद्वारं भवेत् पूर्वे द्विद्वारं पूर्वपश्चिमे । त्रिद्वारं मध्यजं द्वारं दक्षिणास्यं विवर्जयेत् ॥६॥ प्रासाद का यदि एक द्वार रखना हो तो पूर्वदिशा मे ही रक्खे। दो द्वार रखना हो तो पूर्व पश्चिम दिशामे रक्खे। तीन द्वार रखना हो तो दो द्वार के बीच में मुख्य द्वार रक्खे। परन्तु दक्षिणाभिमुख वाला मुख्य द्वार नहीं रखना चाहिये। ऐसा द्वार नहीं बनावें जिससे प्रवेश मे उत्तर मुख रहे ॥६॥ चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु शिवब्रह्मजिनालये । होमशालायां २कर्त्तव्यं क्वचिद् राजगृहे तथा ॥१०॥ शिव, ब्रह्मा और जिनदेव, इनके प्रासादो मे चारो ही दिशाओ मे द्वार रक्खे जाते हैं। एवं यज्ञशाला और कभी राजमहल मे भी चारो दिशाओ में द्वार रक्खे जाते है ॥१०॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५७ मे त्रिद्वारके विषय मे विशेषरूप से लिखते है कि— "पूर्वोत्तरयाम्ये चैव पूर्वापरोत्तरे तथा। याम्यापरोत्तरे शस्तं त्रिद्वारं त्रिविधं स्मृतम् ॥" पूर्व उत्तर और दक्षिण, पूर्व पश्चिम और उत्तर तथा दक्षिण पश्चिम और उत्तर, इस प्रकार तीन प्रकार के त्रिद्वार प्रशस्त है। "पूर्वापरे स्याद् द्विद्वारं दूषयेच्च याम्योत्तरे। एकद्वारं च माहेन्द्रं चतुर्द्वारं चतुर्दिशम् ॥" अप० सू० १५७ प्रासाद मे दो द्वार बनाना हो तो पूर्व और पश्चिम दिशा में बनावें। परन्तु उत्तर और दक्षिण दिशा मे नही बनावे, क्योकि यह दोष कर्त्ता है। यदि एक ही द्वार बनाना हो तो पूर्व दिशा मे ही बनावे और चार द्वार बनाना हो तो चारों दिशा मे बनावे। "पूर्वे च भक्तिदं द्वारं मुक्तिदं वरुणोद्गतम् । याम्योत्तरे शिवे द्वारे कृते दोषो महद्भयम् ॥" अप० सू० १५७ पूर्वदिशा का द्वार भक्ति देनेवाला है और पश्चिम दिशा का द्वार मुक्ति को देनेवाला है। शिव प्रासाद मे यदि उत्तर और दक्षिण दिशा में द्वार किया जाय तो बडा दोष और भय करने वाला है। २. 'होमश ला चतुर्द्वारा' पाठान्तरे । प्रा० १३