प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ प्रासादमण्डने पञ्चमोऽध्यायः मंगल— नानाविधमिदं विश्वं विचित्रं येन सूत्रितम् । सूत्रधारः श्रेयसेऽस्तु¹ सर्वेषां पालनक्षमः ॥१॥ जिसने अनेक प्रकार का यह विचित्र जगत बनाया है, यही सूत्रधार (विश्वकर्मा) सबका पालन करने मे समर्थ है। और यही सबके कल्याण के लिये हों ॥१॥ ग्रंथ मान्यता की याचना— न्यूनाधिकं प्रसिद्धं च यत् किञ्चिन्मण्डनोदितम् । विश्वकर्मप्रसादेन शिल्पिभिर्मान्यतां वचः ॥२॥ जगत में जो कुछ मंडन सूत्रधार का न्यूनाधिक रूप से कहा हुआ शिल्पशास्त्र प्रसिद्ध है, वह विश्वकर्मा की कृपा से शिल्पियो से मान्य हो ॥२॥ वैराज्यपासाद— चतुर्भागं समारभ्य यावत्सूर्योत्तरं शतम् । भागसंख्येति विख्याता फालना कर्णबाह्यतः ॥३॥ चार भाग से लेकर एकसो बारह भाग तक के वैराज्यादि प्रासाद होते है । तथा उनकी फालनाऐ कोने से बाहर निकलती होती है । ॥३॥ फालना के भेद— अष्टोत्तरशतं भेदा अंशवृद्ध्या भवन्ति ते । समांशैर्विषमैः कार्या-नन्तभेदैश्च फालना ॥४॥ एक २ अंशकी वृद्धि से फालना का एक सौ आठ भेद होते हैं। एवं समांश और विषमांश के भेदो से फालना के अनन्त भेद भी होते है ॥४॥ एकस्यापि तलस्योध्र्वे शिखराणि बहून्यपि । नामानि जातयस्तेषा-मूर्ध्वमार्गानुसारतः ॥५॥ एक ही तल के ऊपर बहुत प्रकार के शिखर बनाये जाते है और उन शिखरो के निर्माण १. 'स एव स्यात्' ।