प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ | प्रासादमण्डने
से ही प्रासादों के नाम और उसकी जाति, ये दोनों उत्पन्न होते है ॥५॥ भ्रमणी (परिक्रमा)— दशहस्तादधो न स्यात् प्रासादो भ्रमसंयुतः । नवाष्टदशभागेन भ्रमो भित्तिर्विधीयते ॥६॥ दस हाथ से न्यून प्रासाद को भ्रमणी (परिक्रमा) नहीं किया जाता, किन्तु दस हाथ से अधिक विस्तार वाले प्रासाद को भ्रमणी करना चाहिये। भ्रमणी और दीवार प्रासाद के आठ नव अथवा दसवें भाग की रखना चाहिये ॥६॥ १-वैराज्य प्रासाद— वैराज्यश्चतुरस्रः स्याच्चतुद्वारे चतुष्किका । प्रासादो ब्रह्मणः प्रोक्तो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥७॥ प्रथम वैराज्य प्रासाद समचोरस और चार द्वार वाला है। प्रत्येक द्वार चौकी मंडप वाला बनावे। यह प्रासाद ब्रह्माजी ने कहा है और विश्वकर्मा ने निर्माण किया है ॥७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५५ में कहा है कि— “चतुरस्रीकृते क्षेत्रे तथा षोडशभाजिते । तस्य मध्यं चतुर्भागै-गर्भं सूत्रैश्च कारयेत् ॥ द्वादशस्वथ शेषेषु बाह्ये भित्तीः प्रकल्पयेत् ॥” वैराज्य प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग कर के उन में से चार भाग का मध्य गर्भगृह बनावे और बाकी बारह भाग में दो २ भाग की दीवार और दो भागकी भ्रमणी बनावे । सपादं शिखरं कार्यं घण्टाकलशभूषितम् । चतुर्भिः शुकनासैस्तु सिंहकर्णैर्विराजितम् ॥८॥ इसके शिखर का उदय विस्तार से सवाया बनावे । तथा आमलसार और कलश से सोभायमान करें। एवं चारों ही दिशा मे शुकनाश तथा सिंहकर्ण आदि से शिखर को शोभायमान बनावे ॥८॥
रेखाचित्र विवरण (चित्रगत पाठ):
- शिखर के पार्श्व में (उर्ध्व पाठ): वैराज्यादि प्रकृति प्रथम विभक्ति अंक ॥१॥
- तलच्छन्द (Ground Plan) में अंकित पाठ: गर्भगृह, भित्ति, भ्रम, २, भित्ति