भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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६४ प्रासादमण्डने तैयार हुए प्रासाद के शिखर को ध्वजा रहित देखकर असुर (राक्षस) उसमे रहने की इच्छा करते है । इसलिये देवालय ध्वजा रहित नहीं रखना चाहिये ॥४८॥ ध्वजोच्छ्रायेण तुष्यन्ति देवाश्च पितरस्तथा । दशाश्वमेधिकं पुण्यं सर्वतीर्थधरादिकम् ॥४६॥ देवालय के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से देव और पितर संतुष्ट होते है । तथा दशाश्वमेध यज्ञ करने से और समस्त भूतल की तीर्थयात्रा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य प्रासाद के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से होता है ॥४६॥ पञ्चाशत् पूर्वतः पश्चाद्-आत्मानं च तथाधिकम् । शतमेकोत्तरं सोऽपि तारयेन्नरकार्णवात् ॥५०॥ इति ध्वजलक्षणं पुण्याधिकारः । इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे प्रतिमा- प्रमाणदृष्टिपदस्थानशिखरध्वजाकलशलक्षणाधिकारश्चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ ध्वजा चढ़ानेवाले के वंश की पहले की पचास और पीछे की पचास, तथा एक अपनी इस तरह कुल एकसौ एक पीढ़ी के पूर्वजों को नरकरूपी समुद्र से यह ध्वजा तिरा देती है अर्थात् उद्धार करती है ॥५०॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासादमण्डन ग्रन्थ के चौथा- अध्ययन की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥४॥