प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः ८५ प्रकारान्तर से आमलसार का मान-- "स्कन्धः षड्भागको ज्ञेयः सप्ताशामलसारकः । क्षेत्रमष्टविंशभागे--रुच्छ्रये च तदर्धतः ॥ ग्रीवा भागत्रयं कार्या अण्डक. पञ्चभागकः । त्रिभागा चन्द्रिका चैव तथैवामलसारिका ॥ निर्गमे षट्सार्धभागो भवेदामलसारिका । चन्द्रिका द्विसार्धभागा अण्डकः पञ्च एव च ॥" ज्ञान प्र० दी० श्र० ६ क्षीरार्णवमते आमलकारक मान स्वमते आमलसारका मान स्कंध का विस्तार छह भाग और आमलसार का विस्तार सात भाग रक्खे। आमलसार के विस्तार का अठाईस भाग और ऊंचाई का चौदह भाग करे। उदय मे तीन भाग का गला, पाच भाग का अंडक, तीन भाग की चन्द्रिका और तीन भाग की आमलसारिका रक्खे। आमलसार के मध्य गर्म से विस्तार मे साढे छह भाग निकलती आमलसारिका, इससे ढाई भाग निकलती चंद्रिका और इससे पाच भाग निकलता अंडक (आमलसार) रखना चाहिये। आमलसारकें नीचे शिखरके कोणरूप-- "शिवे तु चैश्वरं रूपं ध्यानमग्नं विचक्षण ! । शिखरकर्णे दातव्यं जिने कुर्याज्जिनेश्वरः ॥” क्षीरार्णवे । शिखर के आमलसार के नीचे और स्कंध के कोने के ऊपर शिवालय हो तो ध्यान मे मग्न ऐसे शिव के रूप तथा जिनालय हो तो जिनदेव के रूप रखे जाते है।