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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

५२ प्रासादमण्डने

आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतरपत्र, आठ भाग का केवल, नव भाग की मंचिका और पैतीस भाग की जंघा करें। कोना और उपांग आदि फालना की जंघा मे भ्रमवाले स्तंभ बनावे, सब मुख्य कोने की जंघा में समचोरस स्तंभ बनावें, तथा गज, सिंह, वरालुक और मकर के रूपों से शोभायमान बनावें । “कर्णेषु च दिक्पालाष्टौ प्राच्यादिषु प्रदक्षिणे ॥ नाट्येशः पश्चिमे भद्रे अन्धकेश्वरो दक्षिणे । चण्डिका¹ उत्तरे देव्यो दंष्ट्रासुविकृताननाः ॥ प्रतिरथे तस्य देव्यः कर्त्तव्याश्च दिशांपतेः । वारिमार्गे मुनीन्द्राश्च प्रलीनाः तपः साधने ॥ गवाक्षाकारो भद्रेषु कुर्यान्निर्गमभूषितः ।” कर्ण की जंघा मे आठ दिक्पाल पूर्वादि दिशा के प्रदक्षिण क्रम से रक्खें। नाट्येश (नटराज) पश्चिम भद्र में, अंधकेश्वर दक्षिण भद्र में, विकराल मुख वाली और भयंकर दांत वाली चंडिका देवी उत्तर दिशा के भद्र मे रक्खें। प्रतिरथ के भद्र में दिक्पालों की देवियां बनावे। वारिमार्ग मे तपः साधना में लीन ऐसे ऋषियों के रूप बनावे। भद्र के गवाक्ष बाहर निकलता हुआ शोभायमान बनावें। चार प्रकार की जंघा— “नागरी च तथा लाटी वैराटी द्राविडी तथा ॥ शुद्धा तु नागरी ख्याता परिकर्मविवर्जिता । स्त्रीयुग्मसंयुता लाटी वैराटी पत्रसङ्कुला ॥ मञ्जरी बहुला कार्या जङ्घा च द्राविडी सदा । नागरी मध्यदेशेषु लाटी लाटे प्रकीर्त्तिता ॥ द्राविडी दक्षिणे देशे वैराटी सर्वदेशजा ।” नागरी, लाटी, वैराटी और द्राविडी ये चार प्रकार की जंघा हैं। उनमे नागरी जंघा बिना किसी प्रकार के रूप की और शुद्ध सादी है। स्त्री युगल के रूप वाली लाटी जंघा है। कमल पत्रो वाली वैराटी जघा है। बहुत मञ्जरी (शृङ्गो) वाली द्राविडी जंघा है। मध्यप्रदेश

(१) अपराजित पृच्छा सूत्र १२७ श्लोक २४ मे 'वितरागे च शासनदेव्यः ।' अर्थात् वितराग देव के देवालय मे चण्डिका के स्थान पर उनकी शासन देवियो को रखना लीखा है ।

तृतीयोऽध्यायः ५३ में नागरी जंघा, लाटदेश मे लाटी जंघा, दक्षिण देश में द्राविडी जंघा और सारे देश मे वैराटी जंघा प्रसिद्ध है । "उद्गमः पञ्चदशांशैः कपिश्रासैरसङ्कृतः ॥ भरणी वसुभागा तु शिरावटी पञ्चेव च । तदूर्ध्वं पञ्चभिः पट्टं कपोतालिवसुस्मृता ॥ द्विसार्धमन्तःपत्रं च त्रिदशं कूटच्छाद्यकम् । निर्गम वसुभागे तु मेर्वादीनामतः शृणु ॥" पंद्रह भाग का उद्गम बनावे, एवं उसमे वन्दरो के रूप बनावे । आठ भाग की भरणी, पांच भाग की शिरावटी, उसके ऊपर पांच भाग का पाट, आठ भाग का केवाल, ढाई भाग का अंतरपत्र और तेरह भाग का छज्जा का उदय रखना चाहिये । छज्जा का निर्गम आठ भाग रखे । मेरु मंडोवर— मेरुमण्डोवरे मञ्ची भरण्यूर्ध्वेऽष्टभागिका । पञ्चविंशतिका जङ्घा उद्गमश्च त्रयोदश ॥२४॥ अष्टांशा भरणी शेषं पूर्ववत् कल्पयेत् सुधीः । सप्तभागा भवेन्मञ्ची कूटच्छाद्यस्य मस्तके ॥२५॥ षोडशांशा पुनर्जङ्घा भरणी सप्तभागिका । शिरावटी चतुर्भागा पट्टः स्यात् पञ्चभागिकः ॥२६॥ सूर्यांशैः कूटच्छाद्यं च सर्वकामफलप्रदम् । कुम्भकस्य युगांशेन स्थावराणां प्रवेशकः ॥२७॥ इति मेरुमंडोवरः । जिस मंडोवर मे एकसे अधिक जंघा होवे, उसको मेरुमडोवर कहते है । उसमें भरणी के ऊपर खुर, कुम्भ, कलश, अंतराल और केवाल, ये प्रथम के पांच थर नहीं बनाये जाते, किन्तु मञ्ची आदि सब थर बनायं जाते है । इसलिये प्रथम खुरा से लेकर भरणी


रेखाचित्र-विवरण (चित्रान्तर्गत पाठ)

  • मेरुमण्डोवर भाग २४९
  • [अधः से ऊर्ध्व क्रम]:
    • खुरक
    • कुंभ (२० १/२)
    • कलश (४)
    • अन्तराल (२)
    • कपोतली (७)
    • मंचिका (३)
    • जंघा (२५)
    • उद्गम (१३)
    • भरणी (८)
    • मंचिका (७)
    • जंघा (१६)
    • उद्गम
    • भरणी (७)
    • शिरावटी (४)
    • कपोतली (७)
    • पाटन
    • कूटछाद्य (१२)
    • जंघा
    • भरणी (७)
    • शिरावटी
    • पाटन
    • छाद्य

५४ प्रासादमण्डने तक सब थर १४४ भाग के मान से बनाकर के पीछे उसके ऊपर मञ्ची आदि थर बनायें जाते है, उनका मान इस प्रकार है— उपरोक्त १४४ भाग के मण्डोवर के खुरासे लेकर भरणी तक के सब थर बना करके उसके ऊपर मंची आठ भाग की, जंघा पचीस भाग की, उद्गम तेरह भाग का और भरणी आठ भाग की बनानी चाहिये । इसके ऊपर शिरावटी केवल, अंतराल और छज्जा, ये चार थर १४४ भाग के मंडोवर के मान का बनावें । फिरसे इस छज्जा के ऊपर सात भाग की मचो, सोलह भाग की जंघा, सात भाग की भरणी, चार भाग की शिरावटी, पांच भाग का पाट और बारह भाग का कूटछाद्य बनावे । यह मेरुमंडोवर सब इच्छित फल देने वाला है। कुम्भा का एक चतुर्थांश भाग जितना सब थरों का निर्गम रक्खे ॥२२४ से २७॥ क्षीरार्णव में कहा है कि—

  • "अस्योदये च कर्त्तव्यं प्रथमं षट्कच्छाद्यकम् । यावत्समोदयः प्राज्ञ ! तावन्मण्डोवरं कृतम् ॥ तथाद्यच्छाद्यसस्थाने द्वे जङ्घे परिकीर्त्तिते । "भवेयुर्द्वादशजङ्घा यावत्तु शतार्धोदये ॥ षड्विधं कूटच्छाद्यं च द्विभूम्योरन्तरे मुने ! । भरण्यूर्ध्वं भवेन्माञ्ची छाद्योर्ध्वं न च मञ्चिका ॥ पुनर्जङ्घा प्रदातव्या यावद् द्वादशसंख्यया । किञ्चित् किञ्चिद् भवेन्न्यूनं कर्तव्यो भूमिकोच्छ्रयः ॥ शतार्द्धोदये माने च महामेरुः प्रदापयेत् ।" अध्याय १०४॥ जितना प्रासाद का उदय हो, उतना ही ऊंचा मंडोवर रक्खें। इस मंडोवर के उदय मे छह छज्जे बनावे। प्रथम छज्जा दो जंघा वाला बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में बारह जंघा और छह छज्जा बनाया जाता है। दो दो भूमि के फासले पर एक २ छज्जा बनाना चाहिये । भरणी के ऊपर मांची रक्खें, किन्तु छज्जा के ऊपर मांची नहीं रखनी चाहिये। नीचे की भूमि से ऊपर की भूमि की ऊंचाई कम कम रखनी चाहिये । यह [चित्र-शीर्षक: सामान्य मण्डोवर नक्शा] महामेरु मंडोवर पचास हाथ के प्रासाद के लिये बनाना चाहिये ।

तृतीयोऽध्यायः ५५ सामान्य मंडोवर— शिरावट्युद्गमो मञ्ची जङ्घा रूपाणि वर्जयेत् । अल्पद्रव्ये महत्पुण्यं कथितं विश्वकर्मणा ॥२८॥ इति सामान्यमंडोवरः । शिरावटी, उद्गम, मंची और जंघा, इन थरों मे जो जो रूप बनाये जाते हैं, इनसे द्रव्य का अधिक व्यय होता है। इसलिये ये थर बिना रूप का बनावे ताकि खर्च कम हो। विश्वकर्माजी के कथनानुसार इससे पुण्य भी महान् होता है। ॥२८॥ २७ भाग का मंडोवर— पीठतश्छाद्यपर्यन्तं सप्तविंशतिभाजिते । द्वादशानां खुरादीनां भागसंख्या क्रमेण तु ॥२६॥ स्यादेकवेदसार्धार्ध-सार्द्ध¹मार्द्धाष्टभिस्त्रिभिः । सार्द्धसार्द्धार्ध भागैश्च सार्धद्वौ द्वयंशनिर्गमः॥ ३०॥ इति प्रकारान्तरे मण्डोवरः । पीठ के ऊपर से छज्जा के ऊपर तक मंडोवर के उदय का सत्ताईस (२७) भाग करे। उनमें खुरा आदि बारह थरो की भाग संख्या क्रमशः इस प्रकार है-एक भाग का खुरा, चार भाग का कुंभ, डेढ भाग का कलश, आधा भाग का अंतराल, डेढ़ भाग का कंवाल, डेढ भाग की माची, आठ भाग की जंघा, तीन भाग का उद्गम, डेढ भाग की भरणी, डेढ भाग का केवाल,२ आधा भाग का अंतराल और ढाई भाग का छज्जा का उदय रक्खे, छज्जा का निर्गम दो भाग मे करे । ॥२६॥३०॥ मडोवर की मोटाइ— पादांशोनेष्टके पञ्च-षडंशैः शैलदारुजे । सान्धारे चाष्टभिर्भागै³-र्दशांशैर्धातुरत्नजे ॥३१॥ प्रकारान्तरे मंडोवर-भाग २७ (१) द्विसार्धे । (२) भरणी के ऊपर कितनेक प्रासादो मे शिरावटी है और कितनेक प्रासादो में केवाल देखने मे आता है। (३) ऽष्टाशतौ भित्तिः ।

५६ प्रासादमण्डने ईंटों के प्रासाद की दीवार प्रासाद के विस्तार के चौथा भाग जितनी, पाषाण के और लकड़ी के प्रासाद की दीवार पांचवें भाग अथवा छठ्ठे भाग जितनी, सांधार प्रासाद की दीवार आठवें भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवें भाग जितनी मोटी बनावें ॥३१॥ अपराजित सूत्र १२६ में कहा है कि- “मृदिष्टिकाकर्मयुक्तां भित्ति पादां प्रकल्पयेत् । पञ्चमांशेऽथवा सा तु षष्ठांशे शैलजे भवेत् ॥ दारुजे सप्तमांशे च सान्धारे चाष्टमांशके । धातुजे रत्नजे भित्तिः प्रासादे दशमांशतः ॥” मिट्टी और ईंट के प्रसाद की दीवार चौथे भाग, पाषाण के प्रासाद की दीवार पांचवे अथवा छठ्ठे भाग, लकड़ी के प्रासाद की दीवार सातवे भाग, सान्धार जाति के प्रासाद की दीवार आठवे भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवे भाग जितनी मोटी बनावें । अन्य प्रकार से मंडोवर की मोटाई— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशभागैर्विभाजिते । भित्तिर्द्विभागकर्त्तव्या षड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३२॥ समचोरस प्रासाद की भूमि के दस भाग करे । उनमे से दो २ भाग की दीवार की मोटाई रक्खे । बाकी छह भाग का गभारा बनावे ॥३२॥ शुभाशुभगर्भगृह— मध्ये युगास्रं भद्राढ्यं सुभद्रं प्रतिभद्रकम् । फालनीयं गर्भगेहं दोषंदं गर्भमायतम् ॥३३॥ गर्भगृह चार कोने वाला समचोरस बनावे । उसमे भद्र, सुभद्र और प्रतिभद्र आदि फालना (खाचा) बताना शुभ है। परन्तु लंबचोरस गभारा बनाने पर दोष होता है ॥३३॥ अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ में कहा है कि— “एकद्वित्रिकमात्राभि-र्गर्भगेहं यदायतम् । यमचुल्ली तदा नाम भर्तृगृहविनाशिका ॥” यदि गर्भगृह एक, दो, तीन अंगुल भी सम्मुख लंबा हो तो यह यमचुल्ली नाम का गर्भगृह कहा जाता है । यह स्वामी के गृह का विनाश कारक है ।

तृतीयोऽध्यायः ५७ लंबचोरस शुभ गर्भगृह— “दारुजे वलभीना तु आयतं च न दुष्येत् । प्रशस्त सर्वकृत्येषु चतुरस्रं शुभप्रदम् ॥” अप० सू० १२६ दारुजादि (लकड़ी के बने हुए) और वलभी (स्त्रीलिंग) जाति के प्रासाद में गर्भगृह लंबा हो तो दोष नही लगता है । बाकी समस्त जाति के प्रासादों मे समचोरस गर्भगृह बनाना, सब कार्यों में प्रशंसनीय और शुभ है । स्तम्भ और मंडोवर का समन्वय— कुम्भकेन समा कुम्भी स्तम्भप्रान्तेन तूद्गमः । भरण्या भरणीं शीर्षं कपोताल्या समं भवेत् ॥३४॥ पेटके¹ कूटच्छाद्यस्य कुर्यात् पटस्य पेटकम् । मंडोवर का कुम्भ और स्तंभ की कुम्भी, स्तंभ का मथाला और मंडोवर का उद्गम, स्तभ की भरणी और मडोवर की भरणी, मंडोवर की कपोताली और स्तंभ की शिरावटी, ये सब समसूत्र मे रखने चाहिये और पाट के पेटा भाग तक छज्जा की नमन (छज्जा नमता) रखनी चाहिये । गर्भगृह के उदय का मान और गुम्बज— सषडंशः सपादः स्यात् सार्धो गर्भस्य विस्तरात् ॥३५॥ वृहद्देवालये पट्ट-पेटान्तं हि त्रिधोदयः । भजेदष्टभिरेकांशा कुम्भी स्तम्भोऽद्ध्र्पञ्चभिः ॥३६॥ अर्द्धेन भरणी शीर्ष-मेकं पट्टस्तु सार्धकः । व्यासार्धेन करोटः स्याद् दर्दरी त्रिषमा शुभा ॥३७॥ इति गुर्भगृहोदयप्रमाणम् । गर्भगृह (गभारे) के विस्तार मे विस्तार का षष्ठांश युक्त सवाया अथवा डेढा गर्भगृह का उदय रखे । यह गभारे के तल से पाट के पेटा भाग तक गर्भगृह के उदय का तीन प्रकार का मान हुआ । (अपराजित पृच्छा सू० १२६ श्लो० ५ मे गभारे का उदय पौने दुगुणा तक रखने (१) 'अधस्तात्' प्रा० ८

५८ प्रासादमण्डने को कहा है ) जो उदयमान आया हो, उसका आठ भाग करें, उनमें से एक भाग की कुम्भी, साढ़े पांच भाग का स्तंभ, आधे भाग की भरणी और एक भाग की शिरावटी बनावें। इसके ऊपर डेढ भाग का केवाल ( पाट ) रखें। गर्भगृह के विस्तार से आधा करोट ( गूम्बज ) का उदय रखना चाहिये, उसमें दर्दरी का थर विषम संख्या में रखें ।।३५ से ३७॥ उदुम्बर (देहली) की ऊँचाई— मूलकर्णस्य सूत्रेण कुम्भेनोदुम्बरः समः । तदधः पञ्चरत्नानि स्थापयेच्छिल्पिपूजया ॥३८॥ प्रासाद के कोने के समसूत्र में उदुम्बर ( देहली ) बनावें । यह कुम्भा के उदय के बराबर ऊंचाई मे रखें। इसको स्थापना करते समय नीचे पचरत्न रखे और शिल्पियों का सम्मान करे ॥३८॥ उदुम्बर की रचना— द्वारव्यासत्रिभागेन मध्ये मन्दारको भवेत् । वृत्तं मन्दारकं कुर्याद् मृणालं पद्मसंयुतम् ॥३६॥ जाड्यकुम्भः कणाली च कीर्तिवक्त्रद्वयं तथा । उदुम्बरस्य पार्श्वे च शाखायास्तलरूपकम् ॥४०॥ द्वार के विस्तार का अर्थात् देहली का तीन भाग करें। उनमे से एक भाग का मध्य मे मंदारक बनाये। यह अर्धचंद्र के आकार वाला गोल और पद्मपत्र युक्त बनाना चाहिये। बदुम्बर की ऊंचाई के अर्धभाग में जाड्यकुम्भ और कणी, ये दो थर वाली कणपीठ बनावें। मंदारक के दोनों तरफ एक २ भाग का कीर्तिमुख ( ग्रासमुख ) बनावें और उसके बगल में शाखा के तलका रूपक बनावें ॥३६-४०॥ कुभा से हीन उदुम्बर और तल— कुम्भस्यार्द्धे त्रिभागे वा पादे हीन उदुम्बरः । तदर्धे कर्णकं मध्ये पीठान्ते बाह्यभूमिका ॥४१॥ इति उदुम्बर । उदुंबर का उदय कुम्भ के उदय के बराबर रखना चाहिये। परन्तु कम करना चाहे तो कुम्भ के उदय का आधा एक तृतीयांश अथवा चौथा भाग जितना कम कर सकते है। उदय के आधे भाग तक कणपीठ करना और गर्भगृह का तल रखना चाहिये और बाहर के मंडपों के तल पीठ के उदयान्त बराबर रक्खे ॥४१॥

तृतीयोऽध्यायः ५६ अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ में कहा है कि— "उदुम्बरं तथा वक्ष्ये कुम्भिकान्तं तदुच्छ्रयम् । तस्यार्धेन त्रिभागेन, पादोनरहितं तथा ॥ उक्तं चतुर्विधं शस्तं कुर्याच्चैवमुदुम्बरम् । अत्युत्तमाश्च चत्वारो न्यूना द्व्यास्तथाधिका ॥ खुरकोर्ध्वेद्वं चन्द्रः स्यात् तदूर्ध्वं स्यादुदुम्बरः । उदुम्बराद्धे त्र्यंशे वा पादे वा गर्भभूमिका ॥ मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका ।।" उमाशंकर ओ० शिल्पीशास्त्री हस्तिनी सधैशाख्या विस्तार भाग ८ | उदुम्बर भाग ३ | हस्तिनी सधैशाख्या विस्तार भाग ८ ग्रास १ | मंदारक २ | ग्रास १ सिंहशाखा | रूपशाखा | पेद्यशाखा २ भाग ओळख | गंधर्वशाखा | पेद्यशाखा | पेद्यशाखा | गंधर्वशाखा | पेद्यशाखा २ भाग ओळख | रूपशाखा | पेद्यशाखा | सिंहशाखा मंदिर के द्वार की देहजो का उद्भव आर तल भाग तथा अर्द्ध चंद्र ओर गगारक.

६० प्रासादमण्डने अब मै उदुम्बर ( देहली ) का स्वरूप कहता हूं। यह स्तंभों की कुम्भियों की ऊंचाई के बराबर ऊंचाई का रक्खे। यदि किसी कारण वश नीचा करने की आवश्यकता हो तो कुम्भी के अर्धभाग, तीसरा भाग अथवा चौथा भाग जितना नीचा कर सकते है। ऐसे चार प्रकार के उदुम्बर का उदय प्रशस्त माना है। इससे हीन अथवा अधिक उदय का बनावें तो दुषित होता है * खुरथर के उदय बराबर अर्द्ध चन्द्रका उदय रक्खे, और इसके ऊपर उदुम्बर रक्खे। गर्भगृह के भूमितलका उदय उदुम्बर के आधे, तीसरे अथवा चौथे भाग मे रक्खें। बाहर के मंडपों का भूमितल पीठ के उदयान्त तक रक्खें और रंगमंडप का भूमितल पीठ के नीचे के अंत्य भाग मे रक्खे। क्षीरार्णव में भी कहा है कि— “उदुम्बरे क्षते¹ कुम्भी स्तम्भकं चावपूर्वकम् । सान्धारे च निरन्धारे कुम्भिकान्तमुदुम्बरम् ॥” अध्याय १०६ यदि किसी कारण वश उदुम्बर का उदय कम किया जाय तो भी कुम्भी और स्तंभ का मान पहले जितना ही रखना चाहिये, अर्थात् स्तम्भकी कुम्भी कम नही करनी चाहिये ऐसा विशेष नियम है। बाकी सांधार और निरंधार प्रसादो मे कुम्भी के उदय बराबर उदुम्बर का उदय रखना चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है। अर्द्धचन्द्र (शंखावर्त्त) -- खुरकेन समं कुर्या-दर्ध चन्द्रस्य चोच्छ्रतिः । द्वाख्याससमं दैर्घ्यं निर्गमं स्यात् तदर्धतः ॥४२॥ द्विभागमर्धचन्द्रं च भागेन द्वौ गगाऽकौ । शङ्खत्रसमायुक्तं पद्माकारैरलङ्कृतम् ॥४३॥ इति अर्द्धचन्द्रः ।

  • कितने ही आधुनिक शिल्पियो की मान्यता है कि—“उदुम्बर (देहलो) कुम्भा से निचा उतारने की आवश्यकता हो तब उसके बराबर स्तंभ की कुम्भिया भी नीची उतारनी चाहिये ।” उनकी यह मान्यता प्रामाणिक मालूम नही होती. क्योकि क्षीराणव अ० १०६ मे स्पष्ट लिखा है कि—'उदुम्बरे क्षते (हते) कुम्भी स्तम्भं तु पूर्ववत् भवेत् ।' कभी उदुम्बर उदय मे कम करने की आवश्यकता हो तब स्तम्भ और उनकी कुम्भिया प्रथम के मान के अनुसार रखनी चाहिये । एवं अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे तो कुम्भियो से ही उदुम्बर नीचा उतारने को कहा है. तो कुम्भिया नीचे कैसे की जाय ? इससे साफ मालूम होता हैं कि जब उदुम्बर नीचा करने की आवश्यकता हो, तब कुम्भियां नीचे नही करनी चाहिये, किन्तु कुम्भा के उदय बराबर ऊंचाई में रखनी चाहिये । (१) 'हृते'

तृतीयोऽध्यायः ६१ उदुम्बर के आगे जो अर्द्धचन्द्र के जैसी आकृति की जाती है, उसका उदय खुर थर के उदय के बराबर रक्खे। द्वार के विस्तार के बराबर अर्द्धचन्द्र लंबा बनावे और लम्बाई से आधा निर्गम रक्खे। लम्बाई के तीन भाग करके उनमे से दो भाग का अर्द्धचंद्र और इसके दोनो तरफ आधे २ भाग का दो गगारक बनावे। अर्द्धचन्द्र और गगारक के बीच मे पत्तेवाली वेलयुक्त शंख और पद्मपत्र जैसी आकृति से सुशोभित बनावे ॥४२-४३॥ उत्तरंग— "उदुम्बरसपादेन उत्तरङ्गं विनिर्दिशेत् । तदुच्छ्रयं विभजेत भागा अथैकविंशतिः ॥ पत्रशाखा त्रिशाखा च द्विसार्धा तु कारयेत् । मालाधरं च त्रिभागं कर्तव्यं वामदक्षिणे ॥ ऊर्ध्वे छाद्यकः पादोनः पादोना फालना तथा । रथिका सप्तभागाश्च भागैकं कण्ठं भवेत् ॥ षड्भागमुत्सेधं कार्य-मुद्गमं च प्रशस्यते । ईदृशं कारयेत् प्राज्ञः सर्वयज्ञफलं भवेत् ॥" वास्तुविद्या अ० ६ द्वार के उदुम्बर के उदय से उत्तरंग का उदय सवाया रक्खे। जो उदय आवे उसके इक्कीस भाग करे। उनमे से ढाई भाग को पत्रशाखा और त्रिशाखा बनावे । उसके ऊपर तीन भाग का मालाधर, पौन भाग की छज्जी, पौन भाग का फालना, सात भाग की रथिका ( गवाक्ष ), एक भाग का कंठ और छह भाग का उद्गम बनावे । इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष उत्तरंग बनावेगे तो सब यज्ञो के बराबर फलदायक होता है । उत्तरंग उद्गम ६ रथिका ७ कण्ठ १ फालना ३/४ छाद्यक ३/४ मालाधर ३ २।। १/२ —उत्तरंग रेखा २१ भाग—

६२ प्रासादमण्डने नागरप्रासाद का द्वारमान— एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं स्यात् षोडशाङ्गुलम् । षोडशाङ्गुलिका वृद्धि-र्यावद्धस्तचतुष्टयम् ॥४४॥ अष्टहस्तान्तकं यावद् दीर्घे वृद्धिर्गुणाङ्गुला । द्व्यङ्गुला प्रतिहस्तं च यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥४५॥ यानवाहनपल्यङ्कं द्वारं प्रासादसद्मनाम् । दैर्ध्यार्द्धेन पृथुत्वं स्याच्छोभनं तत्कलाधिकम् ॥४६॥ इति नागरप्रासादद्वारमानम् । नागर जाति के प्रासाद के द्वार का उदय एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय सोलह अंगुल रखना चाहिये । पीछे चार हाथ तक सोलह २ अंगुल, पांच से आठ हाथ तक तीन २ अंगुल और नौ से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल बढ़ा करके द्वार का उदय रखना चाहिये । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय १६० अंगुल¹ होता है । पालखी, वाहन, शय्या और पलंग तथा प्रासाद और घर का द्वार, ये सब विस्तार में लंबाई से आधा रखना चाहिये । उसमे भी लंबाई का सोलहवां भाग विस्तार में बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४४ से ४६॥ क्षीरार्णवमें कहा है कि— “एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं च षोडशाङ्गुलम् । इयं वृद्धि. प्रकर्त्तव्या यावच्च चतुर्हस्तकम् ॥ वेदाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावच्च दशहस्तकम् । हस्तविंशतिमाने च हस्ते हस्ते त्रयाङ्गुला ॥ द्वयाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रासादे त्रिंशद्धस्तके । अङ्गुलेका ततो वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ नागराख्यमिदं द्वार-मुक्तं क्षीरार्णवे मुने ।। दशमाशो यदा हीनं द्वारं स्वर्गे मनोहरम् ॥ अधिकं दशमांशेन प्रासादे पर्वताश्रये । तावत्क्षेत्रान्तरे ज्ञातु-मर्हहेवमुनीश्वर ! ॥ (१) समरांगण सूत्रधार अध्याय ५५ श्लोक १२६ मे चार से अधिक मान के प्रासादो मे तीन तीन अंगुल बढाना लीखा हैं । जिसे पचास हाथ के प्रासाद का द्वारमान २०२ अंगुल का होता है ।

तृतीयोऽध्यायः ६३ शिवे द्वारं भवेज्ज्येष्ठं कनिष्ठं च जनालये । मध्यमं सर्वदेवानां सर्वकल्याणकारकम् ॥ उत्तममुदयार्धेन पादोनं मध्यमानकम् । तस्य हीनं कनिष्ठं च विस्तारे द्वारमेव च ॥ एवं ज्ञानं यदा ज्ञात्वा यदा द्वारं प्रतिष्ठितम् । नागरं सर्वदेवानां सर्वदेवेषु दुर्लभम् ॥” इति विश्वकर्मकृते क्षीरार्णवे नारदपृच्छिते शताग्रे पञ्चमोऽध्यायः । एक से चार हाथ तक प्रत्येक हाथ सोलह २ अंगुल की, पांच से दश हाथ तक चार २ अंगुल की, ग्यारह से बीस हाथ तक तीन २ अगुल की, इक्कीस से तीस हाथ तक दो २ अगुल की और इकतीस से पचास हाथ तक एक अंगुल की वृद्धि करके द्वार बनाना चाहिये । हे मुनि ! यह क्षीरार्णव मे नागर जाति के द्वार का मान कहा। उसमे से दसवां भाग कम करें तो स्वर्ग के और अधिक करे तो पर्वत के आश्रित प्रासाद के द्वारका मान होता है। शिवालय मे ज्येष्ठ द्वार, मनुष्यालय मे कनिष्ठ द्वार और सब देवो के प्रासादो मे मध्यम द्वार बनाना चाहिये । यह सब कल्याण करने वाला है। उदय से आधा विस्तार रक्खे तो यह उत्तम मान का द्वार माना जाता है। इसमे उत्तम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रक्खे तो मध्यम मान का और इसमे भी मध्यम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रखें तो कनिष्ठ मान का द्वार माना जाता है। ऐसा समझ करके ही सब देवों के लिये यह नागर जाति का द्वार बनाना चाहिये । भूमिजादिप्रासादका द्वारमान— एकहस्ते सुरागारे द्वारं सूर्याङ्गुलोदयम् । सूर्याङ्गुला प्रतिकरं वृद्धिः पञ्चकरावधि ॥४७॥ पञ्चाङ्गुला च सप्तान्तं नवान्तं सा युगाङ्गुला । द्व्यङ्गुला तु शतार्द्धान्तं वृद्धिः कार्या करं प्रति ॥४८॥ इति भूमिजप्रासादद्वारमानम् । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय बारह अंगुल, पीछे पांच हाथ तक प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल, छह और सात हाथ तक पाच २ अंगुल, आठ और नव हाथ तक चार २ अंगुल, दस से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय दो २ अंगुल बढ़ा करके रक्खे । (उदय मे आधा विस्तार रखना चाहिये । विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढाने से अधिक शोभायमान होता है) ॥४७-४८॥

६४ प्रसादमण्डने द्राविडप्रासाद का द्वारमान— प्रासादे एकहस्ते तु द्वारं कुर्याद् दशाङ्गुलम् । रसहस्तान्तकं यावत् तावती वृद्धिरिष्यते ॥४९॥ पञ्चाङ्गुला दशान्तं च द्वयङ्गुला च शताद्र्द्धकम् । पृथुत्वं च तदर्धेन शुभं स्यात्तु कलाधिकम् ॥५०॥ इति द्राविडद्वारमानम् । एक हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय दस अंगुल, पीछे छह हाथ तक प्रत्येक हाथ दस २ अंगुल, सात से दस हाथ तक पांच २ अंगुल और ग्यारह से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा करके रक्खे। उदय से आधा विस्तार रक्खें। विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४९-५०॥ अन्य जाति के प्रासादों का द्वारमान— विमाने भूमिजं मानं वैराटेपु तथैव च । मिश्रके लतिने चैव प्रशस्तं नागरोद्भवम् ॥५१॥ विमाननागरच्छन्दे कुर्याद् विमानपुष्पके । सिंहावलोकने द्वारं नागरं शोभनं मतम् ॥५२॥ वलभ्यां भूमिजं मानं फांसाकारेषु द्राविडम् । धातुजे रत्नजे चैव दारुजे च रथारुहे ॥५३॥ इति द्वारमानम् । विमान और वैराट जाति के प्रासाद का द्वार भूमिज जाति के मान का, मिश्र और लतिन जाति के प्रासाद का द्वार नागर जाति के मान का, विमाननागर, विमानपुष्पक और सिंहावलोकन जाति के प्रासाद का द्वारमान नागर जाति के मान का, वलभी प्रासाद का द्वारमान भूमिज जाति के मान का, फांसनाकार, धातु, रत्न, दारुज और रथारुह जाति के प्रासाद का द्वार द्राविड जाति के मान का रखना चाहिये ॥५१-५३॥ द्वारशाखा— नवशाखं महेशस्य देवानां सप्तशाखिकम् । पञ्चशाखं सार्वभौमे त्रिशाखं मण्डलेश्वरे ॥५४॥

तृतीयोऽध्यायः ६५ एकशाखं भवेद् द्वारं शूद्रे वैश्ये द्विजे सदा । समशाखं च धूमाये श्वाने रासभवायसे' ॥५५॥ महादेव के प्रासाद का द्वार नवशाखा वाला, दूसरे देवों के प्रासाद का द्वार सात शाखा वाला, चक्रवर्ती राजाओं के प्रासाद का द्वार पांच शाखावाला, सामान्य राजाओं के प्रासाद का द्वार तीन शाखावाला, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जाति के गृहों के द्वार एक शाखावाला बनावे । दो, चार, छह और आठ, ये सम शाखावाले द्वार धूम, श्वान, खर और ध्वांक्ष आय वाले घरों मे बनाने चाहिये ॥५४-५५॥ शाखा के आय— “नवशाखे ध्वजश्चैको वृषभः पञ्चशाखिके । त्रिशाखे च तथा सिंहः सप्तशाखे गजः स्मृतः ॥” अप० सू० १३१ नवशाख मे ध्वज आय, पंचशाख मे वृषभाय, त्रिशाख में सिंह आय और सप्तशाख में गज आय देनी चाहिये । प्रासाद के अंग तुल्य शाखा— त्रिपञ्चसप्तनन्दाङ्गे शाखाः स्युरङ्गतुल्यकाः । हीनशाखं न कर्त्तव्य-मधिकालय' सुखावहम् ॥५६॥ प्रासाद के भद्र आदि तीन, पांच, सात अथवा नव अंग है। उनमे से जितने अंग का प्रासाद हो, उतनी शाखाये बनानी चाहिये । अंग से कम शाखा नहीं बनाना चाहिये, लेकिन यदि अधिक बनावे तो वह सुखदायक है । शाखा से द्वारका नाम और परिचय— “पद्मिनी नवशाखं च सप्तशाखं तु हस्तिनी । नन्दिनी पञ्चशाखं च त्रिविधं चोत्तमं भवेत् ॥ मुकुली मालिनी ज्येष्ठा गान्धारी सुभगा तथा । मध्यमेति द्विधा प्रोक्ता कनिष्ठा सुप्रभा स्मृता ॥ मुकुली चाष्टशाखं च षट्शाखं च मालिनी । (१) श्वाने ध्वाङ्क्षे च रासभे । प्रा० ६

६६ प्रासादमण्डने गान्धारी च चतुः शाखं त्रिशाखं सुभगा स्मृता ॥ सुप्रभा तु द्विशाखं चैकशाखं स्मरकीत्तितम् ॥" अप० सू० १३१ नवशाखा वाला द्वारका नाम पद्मिनी, सात शाखा वाला द्वारका नाम हस्तिनी और पंचशाखा वाला द्वारका नाम नन्दिनी है। ये तीनों द्वार उत्तम हैं। मुकुली और मालिनी ये त्रिशाखा द्वार

तृतीयोऽध्यायः ६७ दोनों द्वार ज्येष्ठ हैं। गांधारी और सुभगा ये दोनों द्वार मध्यम हे और सुप्रभा द्वार कनिष्ठ है। आठ शाखावाला द्वार मुकुली, छह शाखावाला मालिनी, चार शाखावाला गांधारी, तीन शाखावाला सुभगा, दो शाखावाला सुप्रभा और एक शाखावाला स्मरकीर्त्ति नाम का द्वार है। न्यूनाधिक शाखामान— अङ्गुलं सार्धमर्द्धं१ वा कुर्याद्धीनं तथाधिकम् । आयदोषविशुद्ध्यर्थं १ ह्रस्ववृद्धी न दूषिते ॥५७॥ द्वार शाखा के मान से शुभ आय न आती हो तो एक, डेढ़ अथवा आधा अंगुल न्यूनाधिक करके श्रेष्ठ आय लानी चाहिये । आय दोष की शुद्धि के लिये शास्त्रीय मान मे इतना न्यूनाधिक परिवर्तन किया जाय तो दोष नही है ॥५७॥ त्रिशाखा— चतुर्भागङ्कितं कुर्याच्छाखाविस्तारमानकम् । मध्ये द्विभागिकं कुर्यात् स्तम्भं पुरुषसंज्ञकम् ॥५८॥ स्त्रीसञ्ज्ञका भवेच्छाखा पार्श्वतो भागभागिका । निर्गमे चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥५६॥ शाखा के विस्तार का चार भाग करे । उनमे से दो भाग का रूप स्तंभ बनावैं। यह स्तंभ पुरुष संज्ञक है। इसके दोनो तरफ एक २ भाग की शाखा रक्खे। यह शाखा स्त्री संज्ञक है। रूप स्तंभ का निर्गम एक भाग का रखना श्रेष्ठ है ॥५६॥ शाखा स्तंभ का निर्गम— एकांशं सार्धभागं च पादोनद्वयमेव च । द्विभागं निर्गमे कुर्यात् स्तम्भं द्रव्यानुसारतः ॥६०॥ द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार शाखा के स्तंभ का निर्गम एक, डेढ़, पोना दो अथवा दो भाग तक रख सकते है ॥६०॥ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश— पेटके विस्तरं कार्यं प्रवेशस्तु युगांशकः । कोशिका स्तम्भमध्ये तु भूषणार्थं हि पार्श्वयोः ॥६१॥ (१) 'ह्रासो वृद्धिर्न दुष्यति ।'

६८ प्रसादमण्डने शाखा के विस्तार का चौथा भाग शाखा का प्रवेश ( निर्गम ) रक्खे । रूपस्तंभ के दोनों तरफ शोभा के लिये एक २ कोणिका बनावें, इसमे चंपा के फूलों की अथवा जलवट की आकृति करें ॥६१॥ सूत्रधार राजसिंह कृत वास्तुराज में कहा है कि— “सर्वेषां पेटके व्यासः प्रवेशस्तु युगांशकः । सार्धवेदांशतो वापि पञ्चांशोऽथवा मतः ॥” अध्याय ६ सब शाखाओं का प्रवेश शाखा के विस्तार के चौथे भाग, साढे चार भाग अथवा पांचवें भाग तक रक्खें । अपराजित पृच्छा सूत्र १३२ श्लो० २४ वें में भी यही लिखा है । शाखा के द्वारपाल का नाम— द्वारदैर्घ्ये चतुर्थांशे द्वारपालो विधीयते । स्तम्भं शाखादिकं शेषं त्रिशाखा च विभाजयेत् ॥६२॥ इति त्रिशाखमानम् । द्वार के उदय का चार भाग करके एक भाग के उदय में द्वारपाल बनावें और बाकी तीन भाग के उदय में स्तंभ और शाखा आदि बनावें ॥६२॥

तृतीयोऽध्यायः ६६ शाखा के रूप— “कालिन्दी वामशाखाया दक्षिणे चैव जाह्नवी । गङ्गाऽर्कतनयायुग्म-मुभयोर्वामदक्षिणे ॥ गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः । तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ नन्दी च वामशाखायां कालो दक्षलताश्रितः । यक्षाः स्युरन्तशाखाया निधिहस्ताः शुभोदयाः ॥” अप० सू० १३२ बांयी द्वार शाखा के द्वारपाल की बांयी और यमुना और दाहिनी ओर गंगा, तथा दाहिनी द्वार शाखा के द्वारपाल की बायी ओर गंगा और दाहिनी ओर यमुना देवी का रूप बनाना चाहिये । गंधर्व शाखा के समसूत्र मे खल्वशाखा रक्खे, इन दोनों का निर्गम भी एक भाग रक्खें। सिंहशाखा का निर्गम भी एक भाग रक्खें। हाथ में निधि को धारण किये हुए बांयो शाखा मे नंदी और दाहिनी शाखा में काल नाम के यक्षो के रूप बनावे । पञ्चशाखा— पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपस्तम्भस्तृतीयकः । चतुर्थी खल्वशाखा च सिंहशाखा च पञ्चमी ॥६३॥ इति पञ्चशाखाः । पहली पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरा रूपस्तंभ, चौथी खल्वशाखा और पांचवी सिंहशाखा है। पञ्चशाखा का मान— “शाखाविस्तारमानं च षड्भिर्भागैर्विभाजयेत् । एकभागा भवेच्छाखा रूपस्तम्भो द्विभागिकः ॥ निर्गमश्चैकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते । कोणिका स्तम्भमध्ये च उभयोर्वामदक्षिणे ॥ गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणैः । तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ सपादः सार्धभागो वा रूपस्तम्भः प्रशस्यते । उत्सेधस्याष्टमांशेन शस्तं शाखोदरं मतम् ॥” अप० सू० १३२ पंचशाखा के विस्तार का छह भाग करें। उनमें से एक २ भाग की चार शाखा और दो भाग का रूपस्तम्भ बनावे । रूपस्तम्भ का निर्गम एक भाग रक्खे, इसके दोनों तरफ एक २

७० प्रासादमण्डने कोणी बनावें । गान्धर्व शाखा का निर्गम एक भाग रक्खें। उसके समसूत्र में खल्वशाखा और सिंहशाखा एक २ भाग निकलती रक्खें। स्तंभ का निर्गम सवा अथवा डेढ़ भाग का भी रख सकते हैं। द्वार के उदय का अष्टमांश शाखा के पेटाभाग का विस्तार रक्खें। सप्तशाखा के मान-- प्रथमा पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपशाखिका । चतुर्थी स्तम्भशाखा च रूपशाखा च पञ्चमी ॥६४॥ षष्ठी तु खल्वशाखा च सिंहशाखा च सप्तमी । स्तम्भशाखा भवेन्मध्ये रूपशाखाग्रसूत्रतः ॥६५॥ इति सप्तशाखाः। प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरी रूपशाखा, चौथी स्तंभशाखा, पांचवीं रूपशाखा, छठी खल्वशाखा और सातवीं सिंहशाखा है। मध्य में स्तंभशाखा रक्खें। यह रूपशाखा से आगे निकलती हुयी रक्खें ॥६४-६५॥ सप्तशाखा का मान— "शाखाविस्तारमानं तु वसुभागविभाजितम् । भागभागाश्च शाखाः स्यु-र्मध्यस्तम्भो द्विभागिकः ॥ कोणिका भागपादेन विस्तारे निर्गमे तथा । निर्गमः सार्धभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥ गन्धर्वा सिंहशाखा च निर्गमो भागमेव च । निर्गमश्च तदर्धेन शेषाः शाखाः प्रशस्यते ॥" अप० सू० १३२ सप्तशाखा के विस्तार का आठ भाग कर उनमे से प्रत्येक शाखा का विस्तार एक २ भाग और मध्य में स्तंभ का विस्तार दो भाग रक्खें। स्तंभ में दोनो तरफ विस्तार में और निर्गम मे पाव २ भाग की कोणिका बनावें। डेढ़ भाग निकलता रूपस्तंभ रखना अच्छा है। गंधर्व और सिंहशाखा का निर्गम एक २ भाग और बाकी शाखाओं का निर्गम आधा २ भाग रखना अच्छा है। नवशाखा के नाम-- पत्रगान्धर्वसञ्ज्ञा च रूपस्तम्भस्तृतीयकः । चतुर्थी खल्वशाखा च गन्धर्वा त्वथ पञ्चमी ॥६६॥

तृतीयोऽध्यायः ७१ रूपस्तम्भस्तथा षष्ठी रूपशाखा ततः परम् । खल्वशाखा च सिंहाख्या मूलकर्णेन सम्मिता ॥६७॥ इति नवशाखाः । प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गात्रर्वशाखा, तीसरी स्तंभशाखा, चौथी खल्वशाखा, पांचवी गांधर्वशाखा, छठा रूपस्तंभ, सातवी रूपशाखा, आठवीं खल्वशाखा और नवमी सिंहशाखा है । ये नवशाखा का विस्तार प्रासाद के कोने तक किया जाता है ॥६६-६७॥ नवशाखा का मान— “शाखाविस्तारमानं तु रुद्रभागविभाजितम् । द्विभागः स्तम्भ इत्युक्त उभयोः कोणिकाद्वयम् ॥ निर्गमः सार्धभागेन पादोनद्वयमेव च । रूपस्तंभद्वयं कार्यं गन्धर्वाद्द्यमेव च ॥” अप० सूत्र १३२ नवशाखा के विस्तार का ग्यारह भाग करके, उनमे से दोनों स्तंभ दो २ भाग रखना चाहिये । उनके दोनो तरफ पाव २ भाग की कोणिकाये बनावे । स्तंभका निर्गम डेढा अथवा पौने दुगुना रक्खें । इन नवशाखाओं मे दो स्तंभ और दो गांधर्व शाखा है । दोनो स्तंभ का विस्तार दो २ भाग और ऽत्येक शाखा का विस्तार एक २ भाग रखना चाहिये । उत्तरंग के देव— यस्य देवस्य या मूर्त्तिः सैव कार्योत्तरङ्गके । शाखायां च परिवारो गणेशश्चोत्तरङ्गके ॥६८॥ इति श्री सूत्रधारमंडनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने भिट्ट- पीठमण्डोवरगर्भगृहोदुम्बरद्वारप्रमाणनामस्तृतीयोऽध्यायः । प्रासाद के गर्भगृह मे जिस देव की मूर्त्ति प्रतिष्ठित हो, उस देव की मूर्त्ति द्वार के उत्तरंग में रखनी चाहिये । तथा शाखाओं में उस देव के परिवार का रूप बनाना चाहिये । उत्तरंग मे गणेश को भी स्थापित कर सकते है ॥६८॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन का अनुवादित प्रासादमंडन के तीसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥३॥